आपका अखबार ब्यूरो।
भारत की समृद्ध सभ्यतागत विरासत और ज्ञान परंपरा के लिए यह अत्यंत गौरवपूर्ण उपलब्धि है। कश्मीर के इतिहासकार कल्हण की 12वीं शताब्दी की ऐतिहासिक कृति ‘राजतरंगिणी’, भारतीय महाकाव्य परंपरा की अमूल्य धरोहर ‘महाभारत’ और शासन एवं कूटनीति के सिद्धांतों पर आधारित कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ को यूनेस्को के ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रीजनल रजिस्टर फॉर एशिया एंड द पैसिफिक’ (एमओडब्ल्यूसीएपी- MOWCAP) में शामिल किया गया है। इंडोनेशिया के जकार्ता में आयोजित एमओडब्ल्यूसीएपी रजिस्टर के 11वें सत्र में इन तीनों कालजयी ग्रंथों को यह प्रतिष्ठित मान्यता प्रदान की गई। यह जानकारी इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने दी। इन अमूल्य ग्रंथों के ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रीजनल रजिस्टर फॉर एशिया एंड द पैसिफिक’ में नामांकन के लिए डोजियर तैयार करने में आईजीएनसीए की अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।
यह उपलब्धि केवल तीन प्राचीन ग्रंथों का अंतरराष्ट्रीय अभिलेख में दर्ज होना भर नहीं है, बल्कि भारत की उस विलक्षण ज्ञान परंपरा का वैश्विक सम्मान है, जिसने सदियों से मानव सभ्यता को इतिहास-बोध, नैतिक मूल्यों, जीवन-दर्शन, धर्म और सुशासन की दृष्टि प्रदान की है। ये तीनों ग्रंथ भारतीय मनीषा की विविध और गहन बौद्धिक उपलब्धियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ भारतीय इतिहास लेखन की एक विशिष्ट कृति है। 12वीं शताब्दी में रचित यह ग्रंथ कश्मीर के राजाओं, राजनीतिक घटनाक्रमों और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत करता है। इतिहास को साक्ष्यों, परंपराओं और आलोचनात्मक दृष्टि के साथ दर्ज करने की इसकी पद्धति इसे भारतीय इतिहास लेखन की अमूल्य धरोहर बनाती है।
‘महाभारत’ भारतीय सभ्यता का ऐसा महाकाव्य है, जिसकी प्रासंगिकता समय और भूगोल की सीमाओं से परे है। यह केवल एक महायुद्ध की कथा नहीं, बल्कि धर्म, कर्तव्य, न्याय, सत्ता, मानवीय संबंधों और जीवन के गूढ़ प्रश्नों का व्यापक विमर्श है। इसमें निहित शाश्वत जीवन-मूल्य और दार्शनिक चिंतन इसे दक्षिण एशिया की साझा सांस्कृतिक स्मृति और मानवता की अमूल्य बौद्धिक विरासत बनाते हैं।
वहीं, कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’ शासन-व्यवस्था, राज्य संचालन, अर्थनीति, कूटनीति, प्रशासन और सामरिक रणनीति से संबंधित एक असाधारण ग्रंथ है। यह प्राचीन भारत की राजनीतिक एवं प्रशासनिक दूरदर्शिता तथा सुविकसित राज्यचिंतन का परिचायक है। इसकी विचार-समृद्धि आज भी राज्य-व्यवस्था एवं शासन-कौशल के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करती है।
इन तीनों ग्रंथों का यूनेस्को के क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल होना भारत की ऐतिहासिक स्मृति, धर्म की शाश्वत अवधारणा और राज्य संचालन की समृद्ध परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिली मान्यता है। इस नवीन उपलब्धि के साथ इस क्षेत्रीय रजिस्टर में भारत की कुल प्रविष्टियों की संख्या छह हो गई है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत की पांडुलिपि विरासत के संरक्षण, संवर्धन और डिजिटलीकरण की दिशा में ज्ञान भारतम् मिशन एक महत्त्वपूर्ण पहल के रूप में कार्य कर रहा है। इसका उद्देश्य देश की विशाल पांडुलिपि संपदा को पहचानना, संरक्षित करना, उनका डिजिटलीकरण करना और भावी पीढ़ियों के लिए सुलभ बनाना है। यह पहल भारत की ज्ञान परंपरा को आधुनिक तकनीक के माध्यम से नई पीढ़ी और वैश्विक समुदाय तक पहुंचाने के संकल्प को भी सशक्त करती है।
यूनेस्को की यह मान्यता इस तथ्य को पुनः रेखांकित करती है कि भारत की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत किसी एक कालखंड या भूगोल तक सीमित नहीं है। यह मानवता की साझा धरोहर है। ‘राजतरंगिणी’, ‘महाभारत’ और ‘अर्थशास्त्र’ के रूप में इतिहास, धर्म-दर्शन और राज्यचिंतन की तीन महान धाराएं आज वैश्विक स्मृति का हिस्सा बनी हैं। निस्संदेह, यह भारत की सभ्यतागत निरंतरता, ज्ञान-संपदा और विश्व को उसके योगदान पर गर्व करने का अवसर है।














