पाकिस्तान को हिमायती बताकर अलगाववााद के लिए फिर रास्ता बना रहे।
जम्मू-कश्मीर में एक नए खेल की तैयारी हो रही है और इसकी शुरुआत पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने की है। उन्होंने हाल ही में बयान दिया है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर के लोगों की आवाज पाकिस्तान उठा रहा है। अब यह बात याद रखिए कि फारूक अब्दुल्ला के पिता शेख अब्दुल्ला,जो हमेशा से भारत विरोधी रहे, ने भी कभी इस तरह का बयान नहीं दिया तो फिर फारूक अब्दुल्ला ने क्यों दिया? उसके कई कारण हैं।
पहला कारण है कि अनुच्छेद 370 हटने को लेकर घाटी के मुसलमानों में एक बेचैनी है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस का प्रभाव घट रहा है। उनसे उम्मीद थी कि सरकार में आने पर ये अनुच्छेद 370 वापस लाएंगे। ऐसा हुआ नहीं। अनुच्छेद 370 के न होने का मतलब है कि अब अलगाववाद की राजनीति के लिए कोई रास्ता नहीं है। तो फारूक अब्दुल्ला ने जो कहा है वह अलगाववाद की राजनीति को फिर से शुरू करने के लिए है। इस समय पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में जो कुछ हो रहा है, उसे देखते हुए कोशिश हो रही है कि भारत खासतौर से जम्मू कश्मीर में भी संकट पैदा किया जाए। ऐसा नहीं है कि फारूक अब्दुल्ला की नजर देश के बाकी हिस्से पर नहीं है। देश के अन्य हिस्सों में जिस तरह से अराजकता पैदा करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है उससे फारूक अब्दुल्ला को लग रहा है कि कश्मीर में अलगाववाद की राजनीति के लिए रास्ता खुलेगा। इसीलिए फारूक अब्दुल्ला पाकिस्तान के ज्यादा करीब दिखने की कोशिश कर रहे हैं। उमर अब्दुल्ला पर दूसरे तरह का दबाव है। अभी कुछ दिन पहले उन्होंने दूसरी शादी की है। वह महिला भी हिंदू है और उसका उन्होंने धर्म परिवर्तन नहीं कराया है। तो इस्लाम की नजर में यह शादी अवैध है। अब उमर अब्दुल्ला को अपने इस्लामिक क्रेडेंशियल साबित करने की जरूरत है कि वे इस्लाम के रास्ते पर चल रहे हैं।
कश्मीर में आतंकवाद के लिए जो रेडिकलाइजेशन था, अब उसका स्वरूप बदला जा रहा है। अब कैलिफेट यानी दुनिया में इस्लाम व शरिया का राज हो, इसके लिए रेडिकलाइजेशन की कोशिश हो रही है। भारत सरकार अलगाववादियों से संबंध बनाने की गलती हमेशा से करती रही है। उसे लगता था कि उनको अपनी तरफ रखने से हम आतंकवाद पर नियंत्रण रख पाएंगे,लेकिन वह सफल नहीं हुआ क्योंकि अलगाववाद की राजनीति करने वाल वाले कभी भारत का हित नहीं चाहते। वे केवल इस्लाम के नजरिए से सोचते हैं। कश्मीर के शिया बहुल इलाकों जैसे कारगिल में हमेशा से ईरान का बड़ा प्रभाव रहा है। वहां से पैसा और अन्य मदद मिलती रही है। लेकिन पिछले कुछ सालों में कश्मीर के सुन्नी मुसलमानों पर भी ईरान का प्रभाव बढ़ रहा है और यह भारत के लिए सबसे खतरनाक संकेत है। इस बीच जो ये खबरें चल रही हैं कि नेशनल कॉन्फ्रेंस में टूट हो जाएगी या 25 विधायक बगावत कर रहे हैं, आप इस सबके भुलावे में मत आइए। नेशनल कॉन्फ्रेंस एक रहे या टूट जाए, दोनों स्थितियों में वह अलगाववाद और कैलिफेट का समर्थन करते रहेंगे। इन लोगों की कोशिश अब ऐसी परिस्थितियां पैदा करने की हैं जिससे पाकिस्तान और चीन दोनों जम्मू कश्मीर में हस्तक्षेप करें। तो कश्मीर में फिर से अनुच्छेद 370 हटने से पहले की जो अलगाववाद की राजनीति थी, उसको और ज्यादा खतरनाक रूप में पुनर्जीवित करने की कोशिश हो रही है। एक पैन इस्लामिक एकता के नजरिए से यह काम हो रहा है। इन लोगों का मानना है कि एक समय आएगा जब इस्लाम से क्रिश्चियनिटी और दूसरों की लड़ाई होगी, उसके लिए अभी से तैयारी करने की जरूरत है। कश्मीर के सुन्नी मुसलमानों का ईरान के प्रभाव में आना कोई यूं ही नहीं हुआ है। आपको मालूम है कि ईरान शिया मुसलमानों का देश है। शिया—सुन्नी में बनती नहीं है, लेकिन इस्लाम का नाम आता है तो सब भेद मिट जाते हैं। इस समय आप कानून व्यवस्था, विकास, उद्योग धंधों की दृष्टि से देखें तो कश्मीर की स्थिति बहुत अच्छी लगेगी, लेकिन अंदर ही अंदर एक लावा दहक रहा है, वह कब और किस रूप में फटेगा यह किसी को नहीं मालूम। इसकी पूरी तैयारी चल रही है। फारूक अब्दुल्ला ने अपने पत्ते खोल दिए हैं। वह कह रहे हैं कि पाकिस्तान हमारा प्रोटेक्टर है। हमारे ऊपर हो रहे अत्याचार की बात विश्व मंच पर उठा रहा है, लेकिन पीओजेके में पाकिस्तान क्या कर रहा है, इसकी बात करते आप फारूक अब्दुल्ला को नहीं सुनेंगे। दरअसल कश्मीर घाटी में अगस्त 2019 के बाद से जो अमन चैन है, वह फारूक अब्दुल्ला को परेशान कर रहा है। शांति भी डरा सकती है, फारूक अब्दुल्ला इसका उदाहरण हैं। उनको इस शांति से डर इसलिए लग रहा है क्योंकि उनको पता है कि इससे उनकी राजनीति हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। तो अपनी राजनीति को रिवाइव करने का एक ही तरीका है पाकिस्तान का समर्थन करना। इसको और विस्तार दें तो भारत विरोधी जितनी शक्तियां हैं,उनके साथ खड़े हो जाना।
अब आप इस षड्यंत्र की व्यापकता को समझिए। फारूक अब्दुल्ला बयान देते हैं कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जम्मू कश्मीर के लोगों की आवाज उठाता है। उस बयान के बाद वह 1 नवंबर को दिल्ली आकर कांग्रेस पार्टी और इंडी अलायंस की रैली में मंच पर विराजमान रहते हैं, लेकिन किसी पार्टी ने उनसे नहीं पूछा कि यह बयान क्यों दिया? किसी ने कोई आपत्ति नहीं जताई। जो व्यक्ति अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए पाकिस्तान के साथ जाने को तैयार है, उससे आप समझिए कि उसकी मानसिकता क्या है? उनके इस बयान को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यह बयान एक तरह से खतरे की घंटी है। कश्मीर को फिर से पुराने दिनों की ओर लौटाने की कोशिश है। वह इंतजार कर रहे हैं कि कब भारत में अराजकता फैलेगी, उस समय हम खुलकर सामने आएंगे। उसी के लिए वह कश्मीर घाटी में जमीन तैयार कर रहे हैं। फारूक अब्दुल्ला को समझ में आ रहा है कि कश्मीर के मुद्दे को और बड़ा बनाना होगा। केवल घाटी तक सीमित रखेंगे तो अब उनके लिए गुंजाइश खत्म हो गई है। अनुच्छेद 370 से पहले की स्थिति लौट कर नहीं आने वाली है। तो स्थिति उससे भी खराब कैसे बने, इसकी कोशिश में फारूक अब्दुल्ला लगे हैं। फारूक अब्दुल्ला का यह प्रयास स्पष्ट रूप से भारत विरोधी है, लेकिन आश्चर्य की बात है कि विपक्ष का कोई नेता इसका विरोध नहीं कर रहा है। इससे आप समझिए कि भारत को तोड़ने की साजिश का पैमाना क्या है? यह अलग बात है कि भारत की आम जनता का इन तत्वों को समर्थन नहीं है, लेकिन इन्होंने अपनी कोशिश छोड़ी नहीं है। देश के संविधान और कानून के तहत अगर फारूक अब्दुल्ला जैसों की लगाम नहीं कसी गई तो आने वाला समय बड़ा संकट पूर्ण होने वाला है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)












