राजीव गांधी हत्याकांड के दोषियों को हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने रिहा करने के आदेश दिए थे। इस दौरान नलिनी समेत 6 लोगों को रिहा कर दिया गया है। इनमें से 4 लोग श्रीलंका के नागरिक हैं। उनके संबंध में तमिलनाडु के अफसरों का कहना है कि उन्हें वापस श्रीलंका भेजने की तैयारी हो रही है। इन सभी चार श्रीलंकाई लोगों को तिरुचिरापल्ली के एक विशेष शिविर में 12 नवंबर की रात को लाया गया है। इन्हें अभी वहीं रखा गया है।
राजीव गांधी हत्या मामले में चार दोषियों-श्रीहरन उर्फ मुरुगन, संथन, रॉबर्ट पायस और जयकुमार को तमिलनाडु की अलग-अलग जेलों से रिहा किया गया था। तिरुचिरापल्ली के जिलाधिकारी ने कहा कि उन्होंने विदेश मंत्रालय के फॉरेन रिजनल रजिस्ट्रेशन ऑफिसेज से बात की है। उनकी ओर से पहले ही श्रीलंका के दूतावास को इन लोगों के संबंध में सूचना भेज दी गई है। अब वे लोग इनकी नागरिकता की पुष्टि करेंगे। इसके बाद उन्हें वहां भेजा जाएगा।
एक रहना चाहता है चेन्नई में
वहीं मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार संथन ने श्रीलंका जाने की इच्छा जताई है। नलिनी के पति श्रीहरन ने लंदन में अपनी बेटी के पास जाने की इच्छा जताई है। रॉबर्ट नीदरलैंड में अपने परिवार के पास जाना चाहता है। जयकुमार चेन्नई में अपने परिवार के पास रहना चाहता है। जिलाधिकारी का कहना है कि अभी उन्हें इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है। डीएम ने कहा है कि उन्होंने इन लोगों से पूछा है कि अगर उनका कोई रिजर्वेशन है तो वह लिखित तौर पर दें, जिसे वह राज्य सरकार के पास भेजेंगे। वहीं कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इनके मामले जटिल हैं। उनका कहना है कि अगर इन्हें श्रीलंका नहीं भेजा जाता है तो वे रेफ्यूजी के तौर पर भारत में रहने का अधिकार मांग सकते हैं।
विशेष शिविर में रखा गया
वहीं दूसरी ओर जिलाधिकारी ने बताया कि ऐसी सूचना थी कि चारों लोग शिविर में सुविधाओं के लिए भूख हड़ताल कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि हालांकि, ऐसा नहीं था और चार लोगों में से दो- रॉबर्ट पायस और जयकुमार ने टहलने के लिए स्थान मुहैया कराने का अनुरोध किया। यह सुविधा जल्दी ही दी जाएगी और इस प्रकार कोई भी व्यक्ति अनशन पर नहीं जा रहा है।
उन्होंने कहा कि विशेष शिविर के प्रभारी से अनुमति लेने के बाद परिवार के सदस्य या रिश्तेदार के उनसे मुलाकात कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि रिहा किए गए चारों दोषियों के लिए भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। इस शिविर में विदेशी नागरिकों को उनके निर्वासन तक रखा जाता है। शिविर के कैदियों को अपना खाना खुद बनाने की अनुमति है। हालांकि, शिविर के अंदर मोबाइल फोन या अन्य गैजेट की अनुमति नहीं है। शिविर में 100 से अधिक कैदी हैं, जिनमें से ज्यादातर श्रीलंकाई नागरिक हैं। (एएमएपी)
बीजेपी सांसद रमेश बिधूड़ी ने बीते गुरुवार को बहुजन समाज पार्टी के सांसद कुंवर दानिश अली पर संसद के विशेष सत्र के दौरान सांप्रदायिक और आपत्तिजनक बयान दे दिया. इस मामले के बाद से बीजेपी विपक्षी पार्टियों के निशाने पर आ गई है. रमेश बिधूड़ी की भी काफी आलोचना हो रही है. उनके बयानों को संसदीय रिकॉर्ड से हटा दिया गया है, लेकिन मामले में अब तक उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है
क्या बिधूड़ी के खिलाफ नहीं हो सकती कोई कार्रवाई?
ऐसा नहीं है कि बिधूड़ी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकती है. सांसदों को उनके व्यवहार के लिए सदन में दंड दिया जा सकता है या उन्हें फटकार भी लगाई जा सकती है. इस तरह के आचरण के लिए सांसद को निलंबित, निष्कासित या जेल भी भेजा जा सकता है।
लोकसभा में कार्य संचालन नियम 374 के तहत इस तरह के व्यवहार पर लोकसभा अध्यक्ष एक प्रस्ताव रख सांसद को निलंबित करने का प्रस्ताव दे सकते हैं. इस प्रस्ताव पर सदन मतदान करता है. निलंबन बचे हुए सत्र के लिए हो सकता है, लेकिन बिधूड़ी ने ये टिप्पणी विशेष सत्र के दौरान दी है इसलिए उन पर ये नियम लागू नहीं हो सकता है।
संसद में सांसदों के पास विशेषाधिकार हैं इसलिए सदन में “कमेटी ऑफ प्रिविलेज” की व्यवस्था की गई है. नियम 227 के तहत सदन के अध्यक्ष विशेषाधिकार के दुरुपयोग की जांच के लिए विशेषाधिकार समिति को भेज सकते हैं. इस तरह अब ये मामला पूरी तरह लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पर निर्भर है कि वो इस मामले में क्या कार्रवाई करते हैं।
भाजपा सांसदों ने दानिश अली पर लगाए थे आरोप
रमेश बिधूड़ी के बयान के बाद काफी हंगामा हुआ और कई राजनीतिक पार्टियों के सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर बिधूड़ी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। भाजपा सांसदों ने आरोप लगाया कि दानिश अली ने रमेश बिधूड़ी को उकसाया और वह बिधूड़ी के संबोधन के दौरान बार-बार पीएम मोदी के खिलाफ बयानबाजी कर रहे थे। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने भी रमेश बिधूड़ी के बयान की निंदा की लेकिन ये भी कहा कि दानिश अली ने ही उन्हें उकसाया था।
लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने उन्हें मिली शिकायतों को लोकसभा की विशेषाधिकार समिति को भेज दिया था। विशेषाधिकार समिति की अध्यक्षता भाजपा सदस्य सुनील कुमार सिंह कर रहे हैं। हाल ही में रमेश बिधूड़ी ने मीडिया से बात करते हुए कहा था कि हर जनप्रतिनिधि का जनता के प्रति दायित्व बनता है। सदन के किसी खास सदस्य के प्रति लगातार कमेंट करते रहना और पीएम मोदी और लोकसभा स्पीकर पर टिप्पणी करना अच्छी बात नहीं है। रमेश बिधूड़ी ने कहा कि अगर उन्हें (दानिश अली) मेरी बात बुरी लगी तो वो मुझे फोन करते, मामला तुरंत समाप्त हो जाता लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके बदले उन्होंने केजरीवाल जैसी रणनीति अपनाई। उन्होंने मेरे मुद्दे पर राजनीति की। दानिश अली और ओवैसी जैसे लोग मुस्लिम तुष्टीकरण कर रहे हैं।
आपत्तिजनक टिप्पणियों को लेकर भाजपा सदस्य रमेश बिधूड़ी के खिलाफ को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखा और मामले को विशेषाधिकार समिति के पास भेजने का आग्रह किया। अली ने पत्र में कहा है कि वह भाजपा सांसद बिधूड़ी के खिलाफ नियम 222, 226 और 227 के तहत नोटिस देना चाहते हैं। बसपा सांसद मुताबिक, बिधूड़ी ने लोकसभा में उनके खिलाफ ‘आतंकवादी’, ‘उग्रवादी’ और कई आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। उत्तर प्रदेश के अमरोहा से लोकसभा सदस्य ने पत्र में कहा, ”मैं आपसे आग्रह करता हूं कि नियम 227 के तहत इस मामले को विशेषाधिकार समिति के पास भेजा जाए…मेरा आग्रह है कि इस मामले में जांच का आदेश दिया जाए।” दानिश अली का कहना है कि इस मामले में कार्रवाई जरूरी है ताकि देश का माहौल और दूषित न हो।
क्या होता है विशेषाधिकार हनन?
संसदीय विशेषाधिकार सांसदों को दिए गए हैं। भारतीय संसद के किसी भी सदन और उसके सदस्यों और समितियों की शक्तियां और विशेषाधिकार संविधान के अनुच्छेद 105 में निर्धारित हैं। हालांकि, यह तय करने के लिए कोई स्पष्ट, अधिसूचित नियम नहीं हैं कि विशेषाधिकार का हनन क्या है और इसके लिए क्या सजा दी जाएगी। आम तौर पर सदन के दौरान कार्यवाही या सदन के किसी भी सदस्य पर उसके चरित्र या आचरण के संबंध में भाषण देना या मानहानि छापना या प्रकाशित करना सदन के विशेषाधिकार का उल्लंघन और अवमानना है।
कैसे मिलती है सजा?
यदि प्रत्यक्ष तौर पर विशेषाधिकार हनन और अवमानना का मामला पाया जाता है तो अध्यक्ष या सभापति उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए इसे विशेषाधिकार समिति को भेज देंगे। समिति इस बात की जांच करेगी कि क्या उनके द्वारा दिए गए बयानों से सदन और उसके सदस्यों का अपमान हुआ है और क्या जनता के सामने उनकी छवि खराब हुई है। समिति के पास अर्ध-न्यायिक शक्तियां हैं। समिति सभी संबंधित पक्षों से स्पष्टीकरण मांगेगी, जांच करेगी और निष्कर्षों के आधार पर सदन को विचार के लिए अपनी सिफारिश पेश करेगी।
प्रिविलेज कमेटी कर रही मामले की जांच
बता दें कि संसद के विशेष सत्र के दौरान बिधूड़ी ने दानिश अली पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी. इस पर जमकर विवाद हुआ था. लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने बिधूड़ी मामले से जुड़ी सभी शिकायतों को प्रिविलेज कमेटी को भेज दिया था. स्पीकर को बिधूड़ी और दानिश अली दोनों के खिलाफ शिकायतें मिलीं थीं. दोनों के गाली-गलौज का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था।
क्या है पूरा मामला?
पिछले महीने नई संसद में चंद्रयान-3 की सफलता के दौरान दानिश अली और रमेश बिधूरी में वॉक युद्ध छिड़ गया था. इस दौरान बीजेपी के सांसद रमेश बिधूड़ी ने दानिश अली को अपशब्द कह दिया. उनके खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की. रमेश बिधूड़ी की आपत्तिजनक टिप्पणी पर संसद के भीतर जबरदस्त हंगामा हुआ. दानिश अली ने सोकसभा स्पीकर ओम बिरला को बिधूड़ी पर कार्रवाई करने के लिए पत्र लिखा था. कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों ने भी रमेश बिधूड़ी को सस्पेंड करने की मांग की।
दानिश अली ने PM मोदी को लिखी थी चिट्ठी
रमेश बिधूड़ी की आपत्तिजनक टिप्पणी को लेकर बसपा सांसद दानिश अली ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखी थी. इस चिट्ठी में दानिश ने लिखा था कि पीएम मोदी हर छोटी-छोटी घटनाओं पर बात करते हैं, लेकिन इस मामले पर वो शांत हैं. अगर बिधूड़ी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती है तो यह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है. अगर इस घटना पर प्रधानमंत्री चुप्पी साधते हैं तो इससे बाकी लोगों का भी हौसला बढ़ेगा।
इंदिरा गांधी भी जा चुकी हैं जेल
विशेषाधिकार हनन के साथ-साथ कई अन्य मामले में कभी भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को भी जेल जाना पड़ गया था। बात उस वक्त ही है जब इमरजेंसी के खत्म होने के बाद तत्कालीन गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह ने इंदिरा गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाया। चरण सिंह ने इंदिरा के खिलाफ इमरजेंसी के दौरान की गई कई ज्यादतियों को लेकर जस्टिस शाह आयोग की रिपोर्ट को अपना आधार बनाया। चरण सिंह ने इंदिरा गांधी पर काम में बाधा डालने, कुछ अधिकारियों को धमकाने, शोषण करने और झूठे मुकदमे में फंसाने का आरोप लगाया। इसके तहत वह दोषी भी पाई गईं। उनके खिलाफ मुकदमा का दौर चला, जिसका ताल्लुक चुनावों में उनके द्वारा सरकारी जीपों के दुरुपयोग से था। इस सभी मामलों में इंदिरा गांधी को जेल भी जाना पड़ा।(एएमएपी)
जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष डॉक्टर फारूक अब्दुल्ला ने पद छोड़ने का फैसला कर लिया है। इस बात की पुष्टि एनसी के प्रवक्ता तनवीर सादिक ने की है। अब पार्टी के अध्यक्ष पद के लिए चुनाव अगले महीने होंगे। संभावनाएं जताई जा रही हैं कि उनके बेटे और पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को पार्टी की कमान मिल सकती है।मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सादिक ने जानकारी दी है कि इसके संबंध में जल्दी नोटिफिकेशन जारी किया जाएगा। उन्होंने बताया गया जल्दी ही चुनाव के लिए नामांकन भी आमंत्रित किए जाएंगे। फिलहाल, पार्टी में चुनाव होने तक फारूक अध्यक्ष बने रहेंगे। उन्होंने नम आंखों के साथ पार्टी मुख्यालय में पद छोड़ने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य पार्टी की कमान संभालने की अब अनुमति नहीं देता।
मीटिंग के दौरान अब्दुल्ला ने पार्टी नेताओं को दल को मजबूत करने अपने-अपने क्षेत्रों में लोगों तक पहुंच बनाने के लिए कहा। बैठक में घाटी के हालात और पार्टी से जुड़ी मामलों पर चर्चा की गई। इस दौरान पार्टी पदाधिकारियों ने भी अध्यक्ष को क्षेत्रों में जारी गतिविधियों की जानकारी दी।
अब्दुल्ला ने कहा, ‘हमारे कैडर को लोगों और प्रशासन के बीच पुल की तरह काम करना होगा। जब हम हमारे हकों के लिए शांति से लड़ रहे हैं, उस दौरान हमें जन कल्याण पर भी ध्यान देना होगा। आपको लोगों की मुश्किलों को दूर करने के लिए असाधारण सेवा करने की जरूरत है।’ पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने क्षेत्र के प्रभारियों से चुनावों को लेकर तैयार रहने के लिए कहा है।
बीते दिनों लखनऊ में अखिलेश से की थी मुलाकात
फारूक अब्दुल्ला ने बीती 13 नवंबर को लखनऊ में यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव से मुलाकात की थी। इस दौरान उन्होंने अखिलेश के पिता मुलायम सिंह के निधन पर शोक व्यक्त किया था। वहीं इस दौरान मीडिया के सवालों का जवाब देते हुए फारूक अब्दुल्ला ने कहा था कि साल 2024 के चुनाव में यह साफ हो जाएगा कि देश में बीजेपी या कांग्रेस के अलावा कोई और भी बड़ी पार्टी है या नहीं। तीसरे मोर्चे के सवाल पर अब्दुल्ला ने कहा कि यह तो वक्त आने पर मिल बैठकर बात कर ली जाएगी। इसके लिए अभी थोड़ा सा इंतजार करना होगा। (एएमएपी)
इजराइल-हमास जंग को अब पूरे छह दिन हो चुके हैं. दोनों ही ओर से हजारों जानें गई हैं. कई बेगुनाह जानें भी गई हैं. हमास, इजराइल को दुनिया के नक्शे से मिटा देना चाहता है तो इजराइल ने भी हमास के एक-एक आतंकी को मार गिराने का फैसला किया है। इस दौरान हमास के समर्थन में सामने से लेबनान आया है. बाकी कुछ अरब देश उसे पीछे से मदद कर रहे हैं. पर, इजराइल की स्थिति एकदम अलग है. युद्ध घोषित होने के साथ ही पूरा देश एक हो गया. विपक्ष भी अब सरकार के साथ है. पूरी दुनिया में फैले इजराइली मूल के लोग स्वदेश लौट रहे हैं. वे इस जंग में अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित कर रहे हैं।
इस बीच इजराइल के समर्थन में अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली समेत दुनिया के अनेक देश आ गए हैं. फ्रांस ने अपने यहां फिलिस्तीन के समर्थन में प्रदर्शन पर रोक लगा दी है तो अमेरिका ने अपना सबसे ताकतवर और दुनिया का सबसे बड़ा जंगी पोत यूएसएस गेराल्ड फोर्ड ही रवाना कर दिया है. हथियारों का जखीरा लेकर अमेरिका का एक मालवाहक जहाज दो दिन पहले ही इजराइल पहुंचा है।
इजराइल की कितनी मदद कर रहा अमेरिका
अमेरिकी विदेश मंत्री ने इजराइल का दौरा किया और राष्ट्र का समर्थन दिया. उनके पहुंचने के साथ ही हथियारों, गोला-बारूद का जखीरा लेकर पूरा-पूरा मालवाहक इजराइल पहुंचा है. यूएसएस गेराल्ड फोर्ड को तैनात किया है. यूएसएस जार्ज वाशिंगटन भी भूमध्य सागर पहुंच गया है. यह एक और जंगी पोत है. इस तरह दो स्ट्राइकर ग्रुप भी भूमध्य सागर में अमेरिका की ओर से तैनात हैं।
USS गेराल्ड आर फोर्ड अमेरिकी नौसेना का सबसे अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस युद्ध पोत
एक आकलन के मुताबिक 8-10 हजार अमेरिकी सैनिक युद्ध के साजो-सामान के साथ इजराइल के आसपास समुद्र में तैनात हो चुके हैं. अमेरिका ने इंटरसेप्टर मिसाइलें, पैट्रियट मिसाइलों को भी इजराइल पहुंचा दिया है।
इजराइल पहुंचे अमेरिकी बेड़े में पांचवीं पीढ़ी के एफ-35, एफ ए-18 सुपर हार्नेट, ई-2 डीएडवांस्ड हॉक आई, ईए-18 जी ग्रोलर इलेक्ट्रानिक अटैक एयरक्राफ्ट, एमएच-60 आर/एस हेलीकाप्टर शामिल हैं. पेंटागन इस पूरे घटनाक्रम पर नजर रखे हुए है. जरूरत पड़ने पर कुछ ही घंटों में इजराइल को कई तरह की मदद मिल सकेगी।
जर्मनी भेजेगा हाइटेक हथियारों से लैस ड्रोन
जर्मनी ने हेरोन सीरीज के दो ड्रोन इजराइल को देने का फैसला किया है, जिससे सीमाओं की निगरानी हो सके. अत्याधुनिक, हथियारों से लैस इस ड्रोन की कई खासियतें हैं. इसे रडार पकड़ नहीं सकते. काफी ऊंचाई तक उड़ सकता है. यह सिग्नल के जरिए कंट्रोल रूम से कनेक्टेड है. इसमें अत्याधुनिक कैमरे हैं, जो तस्वीरें कंट्रोल रूम को भेजते रहते हैं. जरूरत पड़ने पर जमीन पर बैठे पायलट का इशारा मिलते ही ड्रोन हमला भी करने में सक्षम है. जर्मनी हथियारों का जखीरा भी भेज रहा है।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैन्युअल मैंक्रों ने ब्रिटेन, इटली, अमेरिका, जर्मनी की इजराइल के प्रति प्रतिबद्धता को सार्वजनिक तौर पर दर्शाया है. इन सभी देशों ने इजराइल की इस जंग में हर तरह से मदद का न केवल वायदा किया है, बल्कि मदद पहुंचने भी लगी है. सभी देश आतंकवादी समूह हमास के खात्मे के पक्ष में हैं. इसके लिए वे कोई कसर छोड़ना नहीं चाहते।
इस बात का खुलासा होना बाकी है कि दुनिया का सबसे बड़ा जंगी जहाज में किस तरह के हथियार आए हैं लेकिन अमेरिका का इतिहास बताता है कि वह आतंकियों के खात्मे के लिए अपने सबसे बेहतर हथियारों का इस्तेमाल करता है. 9/11 के बाद तो आतंकवादी कहीं भी हों, अमेरिका उन्हें अपना दुश्मन ही मानता है।
इजराइली पीएम नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से बातचीत में हमास को ISIS से समर्थन की जानकारी दी है. अभी इजराइल ने जमीनी हमले नहीं शुरू किए हैं. केवल हवाई हमलों से गाजपट्टी इलाके में ऑपरेशन चला रहा है, लेकिन जिस तरह से दुनिया गोलबंद हो रही है. यह लड़ाई लंबी खिंच सकती है और स्वाभाविक है, जान-माल का नुकसान भी होगा।
दुनिया के सबसे ताकतवर जहाज की खूबियां
इजराइल को लेकर अमेरिका की पॉलिसी एकदम स्पष्ट है. उसने यूएसएस गेराल्ड फोर्ड को भूमध्य सागर में तैनात कर दिया है. भौगोलिक तौर पर समझना आसान होगा कि गाजा पट्टी एक ऐसा इलाका है जिसके एक ओर भूमध्य सागर तो दूसरी ओर इजराइल है. एक पतला गलियारा मिस्र को कनेक्ट करता है, जहां इजराइली सैनिक तैनात हैं. मतलब तैयारी कुछ ऐसी है कि गाजा पट्टी पर जल-थल-नभ, तीनों से वार हो सके. इसमें यूएसएस गेराल्ड फोर्ड बेहद मददगार है।
इस तरह दुनिया का सबसे बड़ा यह जंगी पोत बेहद ताकतवर है क्योंकि इस पर अत्याधुनिक मिसाइलें हैं, तो फाइटर जेट, हेलिकॉप्टर भी यहां से उड़ान भरेंगे. रडार, सेंसर इतने ताकतवर हैं कि इनकी ओर देखने वाले को आसमान, समुद्र या जमीन पर यूं ही धूल चटा देंगे. गलती से कोई पहुंचने में कामयाब भी हो गया तो अत्याधुनिक हथियारों से लैस सैनिक उनसे निपट लेंगे. इशारा मिलते ही विध्वंशक जहाज निपट लेंगे. मतलब अमेरिका ने अपना सबसे मजबूत बेड़ा इजराइल की सुरक्षा में लगा चुका है, जिसे ऑपरेशनल करने को आदेश का इंतजार है. इस पर सवार लगभग साढ़े चार हजार सैनिक किसी भी स्थिति का सामना करने को तत्पर हैं. एक आदेश मिलने पर ये दुश्मन पर टूट पड़ेंगे। (एएमएपी)
गुजरात में पिछले 24 सालों में 3 गुना बढ़ी महिला विधायकों की संख्या, जाने क्या कहते हैं आंकड़े।
गुजरात में महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए ‘बेटी बचाओ’ और ‘गौरव नारी नीति’ जैसी करीब डेढ़ दर्जन योजनाएं लंबे समय से क्रियान्वित हैं और कई क्षेत्रों में इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। चुनावी राजनीति में भी महिलाओं की संख्या में धीरे-धीरे बढ़ोत्तरी हो रही है। कुछ ऐसा ही गुजरात विधानसभा में देखने को मिल रहा है। चलिए जानते हैं राज्य के पुराने आंकड़े क्या कहते हैं ?गुजरात विधानसभा चुनाव में पिछले पांच चुनावों में महिला विधायकों की संख्या 3 गुना बढ़ी है, हालांकि पुरुषों के मुकाबले यह अभी भी कम है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनावों में 13 महिला विधायक चुनकर आईं थीं। 1998 में 4 महिला विधायक ही जीत पाई थी। महिला उम्मीदवारों की संख्या भी पुरुषों के मुकाबले राज्य में काफी कम है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में 169 पुरुष जीते थे। गुजरात विधानसभा में कुल 182 सीटें हैं।
गुजरात में वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक महिला उम्मीदवार मैदान में उतरीं थी। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार 126 महिलाएं मैदान में थी, हालांकि यह अलग बात है कि इनमें से 104 की जमानत जब्त हो गई। महिला उम्मीदवारों की संख्या भी बढ़ी है। 1998 के चुनाव में सिर्फ 49 महिलाएं ही चुनाव मैदान में थी। 2017 के चुनाव में कुल 1828 उम्मीदवार मैदान में थे, जिसमें 1702 पुरुष थे।
इस साल पहले चरण में 70 महिलाएं
गुजरात चुनाव में पहले चरण के लिए 1 दिसंबर को वोट डाले जाएंगे। चुनाव आयोग के अनुसार पहले चरण के लिए 788 उम्मीदवार मैदान में हैं जिसमें 70 महिलाएं हैं। पहले चरण में 89 सीटों पर मतदान होंगे।
महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत 11 फीसदी बढ़ा
पिछला पांच विधानसभा चुनावों में गुजरात में महिला वोटरों की संख्या काफी बढ़ी है। जबकि महिला वोटरों के वोटिंग प्रतिशत में 11 फीसदी से अधिक की बढ़ोत्तरी हुई है। वर्ष 1998 में 1.39 करोड़ महिला वोटर थी, इनमें 77.02 लाख महिलाओं ने वोट दिया था। यानि 55.03 फीसदी वोटरों ने मतदान किया था। जबकि वर्ष 2017 के चुनाव में 2.08 करोड़ महिला मतदाता थी, इनमें से 1.37 करोड़ ने अपने मतदान का प्रयोग किया था। इस चुनाव में मतदान का प्रतिशत प्रतिशत 66.11 फीसदी था।
पिछले विधानसभा चुनाव में सिर्फ 13 महिलाएं ही जीत पाई थीं, जबकि 169 पुरुष
1998 में चार महिला विधानसभा तक पहुंची थी, गुजरात में कुल 182 सीटें हैं
2017 के विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक महिला उम्मीदवार मैदान में उतरीं थीं
पाकिस्तान का पाप अब उसके सिर पर चढ़कर बोलने लगा है. उसने जिन खालिस्तानी आतंकवादियों को अपने यहां समर्थन दिया था अब वही पाकिस्तान में ही अलग खालिस्तान बनाने की मांग कर रहे हैं. खालिस्तानी आतंकवादियों के समर्थकों ने पाकिस्तान के मुख्य शहर कराची में जगह-जगह अलग खालिस्तान बनाने की मांग को लेकर स्लोगन लिखे हैं।
कराची की सड़कों पर लिखे स्लोगन
कराची की मुख्य सड़कों पर जगह-जगह यह स्लोगन लिखे दिख रहे हैं जिसमें स्पष्ट तौर पर लिखा है, ‘पाकिस्तान बनेगा खालिस्तान’, ‘कराची बनेगा खालिस्तान’, ‘मुल्ला बनेगा खालसा.’ दिलचस्प है कि खालिस्तानी आतंकवादी संगठनों के लोगों ने यह वीडियो भी वायरल कर दिया है जिसमें कराची की सड़कों पर जगह-जगह यह स्लोगन लिखे दिख रहे हैं. कराची में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी और पाकिस्तानी फौज के बड़े अधिकारी बड़े पैमाने पर रहते हैं, लिहाजा माना जाता कि वहां पर कड़ी सुरक्षा और सतर्क खुफिया निगाहें होंगी. इन सबके बावजूद वहां पर अलग खालिस्तान बनाने की मांग को लेकर जगह-जगह नारे लिख दिए गए।
पाकिस्तानी हुक्मरानों ने तुरंत संभालने की कोशिश की
पाकिस्तानी हुक्मरानों को खालिस्तानी आतंकवादियों की इस हरकत का जैसे ही पता चला उन्होंने तत्काल इस पर एक्शन लिया. सूत्रों के मुताबिक इस बाबत खालिस्तानी आतंकवादियों के आकाओं को बुलाकर बाकायदा पाकिस्तानी फौज और खुफिया एजेंसी के लोगों ने बैठक की. उन्हें स्पष्ट तौर पर निर्देश दिए गए कि वह पाकिस्तान में ऐसी कोई डिमांड सार्वजनिक तौर पर ना लिखें जिससे यह साबित हो कि पाकिस्तान खुले तौर पर खालिस्तान का समर्थन कर रहा है।
खालिस्तानी आतंकवादियों में दो गुट
सूत्रों का कहना है कि खालिस्तानी आतंकवादियों में दो गुट बन गए हैं, जिनमें से एक गुट चाहता है कि पाकिस्तान की बड़ी आबादी जहां मौजूद है उस इलाके को खालिस्तान घोषित कर दिया जाए. इसके साथ ही बताया जा रहा है कि यह गुट कनाडा में भी ऐसी मांग उठाने जा रहा है. खालिस्तानी आतंकवादियों के इस अलग गुट का मानना है कि दूसरे देशों की खुफिया एजेंसियों ने उन्हें अभी तक केवल यूज किया है, लेकिन उनके मतलब की कोई चीज आज तक सामने नहीं आई है. जबकि उनके सैकड़ों लोग इस दौरान मारे जा चुके हैं. लिहाजा जो देश उन्हें समर्थन दे रहे हैं वह वहां अपने यहां पर छोटा हिस्सा ही दें, लेकिन खालिस्तान के नाम पर दे दें. हो सकता है जल्दी ही यह मांग कनाडा में भी देखने को मिले।
अकाल तख़्त के जत्थेदारों की स्थिति
अमृतसर में स्वर्ण मंदिर परिसर में स्थित अकाल तख़्त सिख धर्म का सर्वोच्च स्थान है. इसके प्रमुख को जत्थेदार कहा जाता है और चार अन्य तख्तों के प्रमुखों के साथ वे सामूहिक रूप से सिख समुदाय से संबंधित महत्वपूर्ण मामलों पर फ़ैसले लेते हैं. साल 2020 में ऑपरेशन ब्लू स्टार की बरसी के मौके़ पर अकाल तख़्त के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने कहा कि खालिस्तान की मांग जायज़ है. उन्होंने पत्रकारों से बातचीत के दौरान कहा था, “सिखों को यह संघर्ष याद है. दुनिया में ऐसा कोई सिख नहीं है जो खालिस्तान न चाहता हो. भारत सरकार खालिस्तान देगी तो हम लेंगे।
खालिस्तान शब्द पहली बार 1940 में सामने आया था. मुस्लिम लीग के लाहौर घोषणापत्र के जवाब में डॉक्टर वीर सिंह भट्टी ने एक पैम्फ़लेट में इसका इस्तेमाल किया था. इसके बाद 1966 में भाषाई आधार पर पंजाब के ‘पुनर्गठन’ से पहले अकाली नेताओं ने पहली बार 60 के दशक के बीच में सिखों के लिए स्वायत्तता का मुद्दा उठाया था. 70 के दशक की शुरुआत में चरण सिंह पंछी और डॉक्टर जगजीत सिंह चौहान ने पहली बार खालिस्तान की मांग की थी. डॉक्टर जगजीत सिंह चौहान ने 70 के दशक में ब्रिटेन को बेस बनाया और अमेरिका और पाकिस्तान भी गए. 1978 में चंडीगढ़ के कुछ नौजवान सिखों ने खालिस्तान की मांग करते हुए दल खालसा का गठन किया।
क्या भिंडरावाले ने कभी खालिस्तान की मांग की थी?
सिख सशस्त्र आंदोलन का पहला चरण स्वर्ण मंदिर या श्री दरबार साहिब परिसर पर हमले के साथ समाप्त हुआ, जो परिसर के भीतर मौजूद उग्रवादियों को बाहर निकालने के लिए किया गया था. इसे 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के नाम से जाना जाता है. सशस्त्र संघर्ष के दौरान ज़्यादातर उग्रवादियों ने जरनैल सिंह भिंडरावाले को नेता के तौर पर स्वीकार किया था. हालाँकि इस ऑपरेशन के दौरान जरनैल सिंह भिंडरावाले मारे गए थे.उन्होंने कभी साफ़तौर से खालिस्तान की मांग या एक अलग सिख राष्ट्र की बात नहीं कही थी. हालांकि उन्होंने ये ज़रूर कहा था कि, ‘अगर श्री दरबार साहिब पर सैन्य हमला होता है तो यह खालिस्तान की नींव रखेगा.’ उन्होंने 1973 के श्री आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को अमल में लाने के लिए ज़ोर दिया था जिसे अकाली दल की वर्किंग कमिटी द्वारा अपनाया गया था।
क्या है आनंदपुर साहिब रिज़ॉल्यूशन
1973 का आनंदपुर साहिब रिज़ॉल्यूशन में अपने राजनीतिक लक्ष्य के बारे में इस प्रकार कहा गया है, “हमारे पंथ (सिख धर्म) का राजनीतिक लक्ष्य, बेशक सिख इतिहास के पन्नों, खालसा पंथ के हृदय और दसवें गुरु की आज्ञाओं में निहित है. जिसका एकमात्र उद्देश्य खालसा की श्रेष्ठता है. शिरोमणि अकाली दल की मौलिक नीति एक भू-राजनीतिक वातावरण और एक राजनीतिक व्यवस्था के निर्माण के माध्यम से खालसा की श्रेष्ठता स्थापित करना है। अकाली दल भारतीय संविधान और भारत के राजनीतिक ढांचे के तहत काम करता है। आनंदपुर साहिब रिज़ॉल्यूशन का उद्देश्य सिखों के लिए भारत के भीतर एक स्वायत्त राज्य का निर्माण करना है. ये रिज़ॉल्यूशन अलग देश की मांग नहीं करता है। 1977 में अकाली दल ने इस रिज़ॉल्यूशन को आम सभा की बैठक में एक नीति निर्देशक कार्यक्रम के हिस्से के रूप में अपनाया था। अगले ही साल 1978 के अक्टूबर में अकाली दल लुधियाना सम्मेलन में इस प्रस्ताव को लेकर नरम पड़ गया। इस सम्मेलन के वक़्त अकाली दल सत्ता में था. स्वायत्तता को लेकर रिज़ॉल्यूशन संख्या एक को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष गुरचरण सिंह तोहड़ा ने पेश किया गया था और तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने इसका समर्थन किया था. रिज़ॉल्यूशन संख्या एक को आनंदपुर साहिब रिज़ॉल्यूशन के 1978 संस्करण के तौर पर जाना जाता है।
आनंदपुर साहिब रिज़ॉल्यूशन 1978
इस रिज़ॉल्यूशन में कहा गया है , “शिरोमणि अकाली दल को लगता है कि भारत विभिन्न भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों की एक संघीय और भौगोलिक इकाई है. धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए, लोकतांत्रिक परंपराओं की मांगों को पूरा करने के लिए और आर्थिक प्रगति की राह को आसान करने के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि पहले से तय सिद्धांतों और उद्देश्यों के तर्ज पर केंद्र और राज्य के संबंधों और अधिकारों को फिर से परिभाषित करते हुए संवैधानिक ढांचे को संघीय आकार दिया जाए।
औपचारिक तरीके से खालिस्तान की मांग कब उठाई गई?
खालिस्तान की पहली औपचारिक मांग 29 अप्रैल 1986 को उग्रवादी संगठनों की संयुक्त मोर्चा पंथक समिति द्वारा की गई थी। इसका राजनीतिक उद्देश्य इस प्रकार बताया गया था -इस विशेष दिन पर पवित्र अकाल तख़्त साहिब से हम सभी देशों और सरकारों के सामने यह घोषणा कर रहे हैं कि आज से ‘खालिस्तान’ खालसा पंथ का अलग घर होगा. खालसा सिद्धांतों के मुताबिक़ सभी लोग खु़श और सुख पूर्वक रहेंगे। “ऐसे सिखों को शासन चलाने के लिए उच्च पदों की ज़िम्मेदारी दी जाएगी जो सबकी भलाई के लिए काम करेंगे और पवित्रता से अपना जीवन बिताएंगे। भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व आईपीएस अधिकारी सिमरनजीत सिंह मान ने 1989 में जेल से रिहा होने के बाद इस मुद्दे को उठाया. लेकिन उनके रुख़ में कई विसंगतियां देखी जा सकती थीं। वह अब संगरूर से सांसद हैं और उन्होंने भारत की एकता और अखंडता को बनाए रखने की शपथ ली है. हालाँकि संसद के बाहर इंटरव्यूज़ में उन्होंने खालिस्तान की वकालत की थी। (एएमएपी)
चीन में एक बार फिर कोरोना का कहर मुसीबत बन गया है। बीते बुधवार को एक दिन में कोरोना संक्रमण के 31,454 नए मामले सामने आए हैं। एक दिन में 31 हजार से ज्यादा नए मामले आने के बाद बीजिंग सहित 49 शहर बंद कर दिये गए हैं।दुनिया में कोरोना की शुरुआत करने वाले चीन में कोरोना एक बार फिर उछाल मार रहा है। चीन के राष्ट्रीय स्वास्थ्य ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक बुधवार को एक दिन में कोरोना संक्रमण के 31,454 नए मामले सामने आए हैं। ये महामारी की शुरुआत के बाद सर्वाधिक मामलों वाला दिन है। एक दिन में इतने ज्यादा मामले एक साथ सामने आने के बाद चीन सरकार ने लॉकडाउन और यात्रा पाबंदियां लगाना तेज कर दिया है। साथ ही कोरोना परीक्षण व टीकाकरण पर भी जोर दिया जा रहा है, जिससे कोरोना को और फैलने से रोका जा सके। बीते एक नवंबर के बाद से देश भर में कुल 2,80,000 से ज्यादा कोरोना संक्रमित मिलने की सूचना है। पिछले सप्ताह औसतन 22,200 मामले रोज सामने आए हैं।
कोरोना संक्रमण बढ़ने के साथ ही राजधानी बीजिंग सहित देश के 49 शहर बंद कर दिए गए हैं। जेंगझू में एप्पल के आईफोन बनाने वाले प्लांट में श्रमिकों व सुरक्षा कर्मियों के बीच झड़प का मामला सामने आने के बाद वहां भी सख्ती से लॉकडाउन लागू कर दिया गया है। राजधानी बीजिंग में लॉकडाउन के तहत कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं। पार्क, कार्यालय भवनों और शॉपिंग मॉल को बंद कर दिया गया है। लोगों से घरों में ही रहने को कहा गया है। इन लॉकडाउन उपायों से 41.2 करोड़ लोग प्रभावित हैं।
कुछ प्रांतों में तीन साल की सबसे गंभीर स्थिति
चीन के कुछ क्षेत्रों में महामारी का प्रसार तेजी से हो रहा है और रोकथाम और नियंत्रण में कठिनाई बढ़ रही है। कुछ प्रांत तीन साल में सबसे गंभीर और जटिल स्थिति का सामना कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि नए संक्रमितों की संख्या पूरे चीन में लगातार बढ़ रही है। एक नवंबर के बाद से देश भर में कुल 2,80,000 से ज्यादा संक्रमित मिलने की सूचना है। पिछले सप्ताह औसतन 22,200 मामले रोज मिले।
49 शहरों में विभिन्न स्तर का लॉकडाउन, 41 करोड़ लोग प्रभावित
ब्रोकरेज फर्म नोमुरा ने नोमुरा चाइना कोविड लॉकडाउन इंडेक्स (सीएलआई) के आधार पर एक रिपोर्ट में कहा कि चीन में कुल कोविड मामलों की संख्या में वृद्धि के साथ, पिछले एक हफ्ते में देश भर में लॉकडाउन से स्थिति बिगड़ती जा रही है। सरकारी आंकड़ों और हमारे सर्वेक्षण के अनुसार, 21 नवंबर तक 49 शहरों में वर्तमान लॉकडाउन के कई स्तर लागू हैं या किसी प्रकार के जिला-आधारित नियंत्रण उपाय किए गए हैं। हमारा अनुमान है कि वर्तमान में इन लॉकडाउन उपायों से 41.2 करोड़ लोग प्रभावित हैं। ये पिछले सप्ताह के 34 करोड़ से अधिक हैं।
आईएमएफ ने चीन को दी यह सलाह
इस बीच, अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (IMF) ने चीन को सलाह दी है कि वह देश में कोरोना रोधी टीकाकरण तेज करे। कोविड नीति को नए सिरे से बनाए, ताकि प्रॉपर्टी सेक्टर में पैदा हुई चुनौतियों और वैश्विक मांग में कमी से उत्पन्न चुनौतियों से निपटा जा सके। (एएमएपी)
बाइडन ने राष्ट्र के नाम संबोधन में यूक्रेन और इजराइल को समर्थन जारी रखने की प्रतिबद्धिता दोहराई
अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने गुरुवार को फिलिस्तीन के कुख्यात आतंकवादी संगठन हमास और रूस को लोकतंत्र का दुश्मन बताया। ओवल ऑफिस से राष्ट्र के नाम टेलीविजन संबोधन में उन्होंने कहा कि हमास और रूस दोनों लोकतंत्र को नष्ट करने पर तुले हैं। बाइडन ने यूक्रेन और इजराइल को अमेरिका के हितों के लिए महत्वपूर्ण बताया और दोनों देशों को सहायता देने पर बात की। यह जानकारी मीडिया रिपोर्ट्स में दी गई है।
हमास और रूस की मंशा एक
बाइडन ने कहा कि हमास और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन अलग-अलग खतरों का प्रतिनिधित्व करते हैं। मगर दोनों की मंशा एक है। दोनों अपने पड़ोसी लोकतंत्र को पूरी तरह से नष्ट करना चाहते हैं। बाइडन ने कहा कि अमेरिका महान राष्ट्र के रूप में अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रहा है।अमेरिका हमास जैसे आतंकवादियों और पुतिन जैसे तानाशाहों को जीतने नहीं दे सकता।
अमेरिका फलस्तीनी लोगों के सम्मान और आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए प्रतिबद्ध
इस्राइल-हमास युद्ध को लेकर बाइडन ने कहा कि राष्ट्रपति के रूप में उनके लिए आतंकियों द्वारा बंधक बनाए गए अमेरिकियों की सुरक्षा से बढ़कर कोई प्राथमिकता नहीं है। इस्राइल में उन्होंने ऐसे लोगों को देखा, जो सदमे और गहरे दर्द के साथ-साथ गुस्से में भी हैं। उन्होंने कहा, मैंने फलस्तीनी प्राधिकरण के राष्ट्रपति अब्बास से भी बात की और दोहराया कि अमेरिका फलस्तीनी लोगों के सम्मान और आत्मनिर्णय के अधिकार के लिए प्रतिबद्ध है। राष्ट्रपति बाइडन ने कहा कि अन्य लोगों की तरह वह फलस्तीनी नागरिकों की मौत से दुखी हैं। खासकर गाजा के अस्पताल में विस्फोट से हुई दुखद मौतों से, जिसमें इस्राइल का हाथ नहीं है। हमें हर निर्दोष की मौत पर दुख होता है।
मध्य पूर्व के लिए बेहतर भविष्य बनाने के लिए काम कर रहे
अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि ईरान यूक्रेन में रूस का समर्थन कर रहा है। साथ ही मध्य पूर्व क्षेत्र में हमास और अन्य आतंकवादी समूहों को ईरान का समर्थन हासिल है। इसलिए उसे जवाबदेह ठहराना जरूरी है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और क्षेत्र में हमारे साझेदार देश मध्य पूर्व के लिए बेहतर भविष्य बनाने के लिए काम कर रहे हैं। ताकि मध्य पूर्व अधिक स्थिर हो सके और अपने पड़ोसियों से बेहतर तरीके से जुड़े। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप रेल कॉरिडोर जैसी नवीन परियोजनाओं के माध्यम से इस दिशा में काम कर रहा हो।
बाइडन का कहना है कि इस्राइल पर हुआ हमला हमें यूक्रेन के लोगों की याद दिलाता है, जो 20 माह से युद्ध, क्रूरता और पुतिन का आक्रमण झेल रहे हैं। हमास-रूस दोनों पड़ोसी देश के लोकतंत्र को पूरी तरह से नष्ट करना चाहते हैं। हमास फलस्तीनी नागरिकों को ढाल बना रहा है। हालांकि, पुतिन का कहना है कि यूक्रेन कभी असल देश था ही नहीं। सोवियत संघ ने यूक्रेन बनाया है। इसके अलावा, बाइडन ने आगे कहा कि अमेरिका में धर्म विरोधी भावना और इस्लामिकफोबिया बढ़ गया है। मैं कई अमेरिकी मुस्लिम समुदाय, अरब अमेरिकी समुदाय, फलस्तीनी अमेरिकी समुदाय के लोगों को जानता हूं। मुझे ऐसा लगता है कि वे नाराज हैं। उन्हें लगता है कि हमें इस्लामोफोबिया है। (एएमएपी)
प्रलय, कयामत, या सामूहिक विनाश- जब एक साथ पूरी की पूरी प्रजाति धरती से गायब हो जाती है, इसे समझने की शुरुआत हम पहले विनाश से करते हैं। लगभग 443 मिलियन साल पहले पहला प्रलय आया था। इसे एंड-ऑर्डोविसियन कहा गया। इस दौरान धरती पर जितना पानी था, सब बर्फ में बदलने लगा। समुद्र और उससे बाहर ठंड से जीव मरने लगे। इस दौरान लगभग 86 प्रजातियां खत्म हो गईं। जो बाकी रहीं, उन्होंने नए क्लाइमेट के अनुसार खुद को ढाल लिया था। साल 2017 के करंट बायलॉजी जर्नल में इस बारे में विस्तार से बताया गया है।दूसरी बार प्रलय लगभग 359 से 380 मिलियन साल पहले आई। एकदम पक्का अंदाजा वैज्ञानिकों को भी नहीं है। इसे एंड डेवोनियन कहा गया। धरती पर ज्वालामुखियों के अचानक एक्टिव होने से ऑक्सीजन का स्तर कम होने लगा, और स्पीशीज खत्म होने लगीं। ये इतना भयानक था कि तब मौजूद 75 प्रतिशत से ज्यादा प्रजातियां खत्म हो गईं। इस दौरान कई मछलियां और कोरल खत्म हुए। दिलचस्प ये रहा कि छोटे कद और वजन वाली स्पीशीज जैसे टेट्रापॉड बच गईं। यहीं से एंफिबियन, रेप्टाइल और मैमल का बंटवारा शुरू हुआ।
अब बात करते हैं तीसरी प्रलय की, जिसे एंड पर्मिअन कहते हैं। लगभग 251 मिलियन साल पहले हुए इस सामूहिक विनाश के जिम्मेदार साइबेरिया के ज्वालामुखी थे। वे फटने लगे। समुद्र और हवा में जहर और एसिड फैलने लगा। यहां तक कि ओजोन की परत भी फट गई। इससे खतरनाक यूवी किरणें निकलीं। इसी दौरान निकले रेडिएशन से जंगल से जंगल जलकर खत्म हो गए। इस दौर को चारकोल गैप भी कहा जाता है। तब फंगस के अलावा ज्यादातर प्रजातियां खत्म हो गईं।
लगभग 210 मिलियन साल पहले चौथी बार धरती पर तांडव मचा, जिसे एंड ट्रिएसिक दौर कहा गया। इस बार भी ज्वालामुखी फटे, लेकिन साइबेरिया में नहीं, बल्कि धरती की बाकी जगहों पर। इस विनाश में भी तब मौजूद लगभग 80 प्रजातियां खत्म हो गईं। बचे तो डायनासोर और क्रोकोडाइल के पूर्वज, जिन्हें क्रोकोडिलोमार्फ्स नाम दिया गया।
आखिरी और पांचवा सामूहिक विनाश एंड क्रिटेशिअस कहलाया। ये वही समय है, जब डायनासोर धरती से गायब हो गए। लगभग 65।5 मिलियन साल पहले आए इस प्रलय के थ्योरी पर लंबे समय से बहस चल रही है कि आखिर इसकी वजह क्या थी। इस दौरान एक एस्टेरॉयड धरती से टकराया, ये बात सभी मानते हैं, लेकिन क्या उसके टकराने-भर से ऑक्सीजन खत्म हो गई? क्या उसकी वजह से डायनासोर जैसी मजबूत प्रजाति खत्म हो गई?
वजहों पर बहस के बीच ये बात भी सबने मानी कि वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ा और ऑक्सीजन का स्तर एकदम नीचे चला गया। इस दौरान 76 प्रजातियां मर गईं।
अब बारी आती है छठवें विनाश की, जिसकी बात साइंटिस्ट करने लगे हैं। ये कैसे होगा? क्यों और कब होगा? नब्बे की शुरुआत में मशहूर जीवाश्म वैज्ञानिक रिचर्ड लीके ने चेताया था कि इंसान ही छठवें विनाश के जिम्मेदार होंगे। यहां याद दिला दें कि इससे पहले आ चुकी पांचों ही आपदाएं प्राकृतिक थीं। किसी जीव-जंतु की वजह से नहीं। लेकिन इस बार खतरा ज्यादा है क्योंकि इंसानी एक्टिविटी धरती पर ऑक्सीजन कम कर रही है।
इसकी शुरुआत हो भी चुकी है। दरअसल प्रलय के बिना भी धरती से लगातार कई स्पीशीज खत्म होती रहती हैं। इसे बैकग्राउंड रेट कहते हैं। फॉसिल रिकॉर्ड्स अक्सर ही इस बारे में बात करते हैं। ये तो हुई सामान्य बात, लेकिन इंसानों की वजह से धरती पर स्पीशीज के गायब होने की रफ्तार लगभग 100 गुना तेज हो चुकी है। यानी हमारी वजह से 100 गुनी स्पीड से जीव-जंतुओं का विनाश हो रहा है।
प्रोसिडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) में वैज्ञानिकों का समूह लगातार इस बारे में स्टडीज दे रहा है। वैसे बता दें कि छठवें सामूहिक विनाश को होलोसीन या एंथ्रोपोसीन एक्सटिंक्शन कहा जा रहा है। डर है कि इसमें बैक्टीरिया, फंगी और पेड़-पौधे ही नहीं, इंसान, रेप्टाइल्स, पंक्षी, मछलियां सब खत्म हो जाएंगी। और इसकी वजह बनेगा क्लाइमेट चेंज।
जिस तेजी से धरती गर्म हो रही है, और महासागरों की बर्फ पिघल रही है, वैज्ञानिक इसकी तुलना ज्वालामुखियों के अचानक फटने से कर रहे हैं। इससे पानी इतना गर्म हो जाएगा कि उसमें ऑक्सीजन का स्तर घटने लगेगा। नतीजा, समुद्री जीव-जंतु मरने लगेंगे। शुरुआत पानी से होगी, फिर इसका असर हवा में पहुंचेगा और धीरे-धीरे बहुत सारी प्रजातियां एक साथ खत्म हो जाएंगी। हम-आपको मिलाकर।
ये दावा हवा-हवाई नहीं, बल्कि बैकग्राउंट रेट के 100 गुना होने से ये शुरू हो चुका। वातावरण में गर्मी और जहरीली हवा की बात हो ही रही है। बढ़ते तापमान से लगातार कई देशों में जंगल आग पकड़ रहे हैं। बीते साल गर्मियों में ठंडे यूरोपियन देश भी गर्मी से त्राहि-त्राहि कर उठे थे। यहां तक कि दफ्तर बंद करने पड़े। मिट्टी उतनी उपजाऊ नहीं रही।
दुनिया के बहुतेरे देश बेमौसम ही कभी तूफान, कभी सूखा तो कभी भूकंप देख रहे हैं। इसपर सबसे खराब बात कि अब भी संभलने की बजाए जंगल काटे जा रहे हैं। यूएन फूड एंड एग्रीक्लचर ऑर्गेनाइजेशन के हिसाब से साल 2015 के बाद से हर साल लगभग 24 मिलियन एकड़ जंगल काटे जा रहे हैं।
अब तक ये पता नहीं लग सका कि अगली प्रलय कब आएगी लेकिन कई वैज्ञानिक अलग-अलग दावे कर रहे हैं। साइंस एडवांसेज में मेसाचुसेट्स प्रौद्योगिक संस्थान के प्लानेटरी साइंसेज विभाग ने अपने शोध के आधार पर कहा कि साल 2100 के करीब ऐसा होगा। साथ में ये भी माना कि जिस हिसाब से धरती गर्म हो रही है, विनाश इसके पहले भी आ सकता है। (एएमएपी)
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की अगुवाई वाली पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ (पीटीआई) की सरकारों के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी चल रही है। इस बात के संकेत पूर्व राष्ट्रपति और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के उपाध्यक्ष असिफ अली जरदारी ने दिए हैं। उन्होंने बताया कि पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट गठबंधन पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा में अविश्वास प्रस्ताव लाएगा।जानकारी के अनुसार, एक इंटरव्यू में जरदारी ने जल्दी चुनाव की बात से इनकार किया है। उन्होंने कहा, ‘चुनाव के बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। मुझे नहीं लगता कि जल्दी चुनाव कराना संभव है।’ जरदारी का कहना है कि उनके पास पंजाब में मुख्यमंत्री चौधरी परवेज इलाही की सरकार गिराने के लिए पर्याप्त आंकड़े हैं। उन्होंने इस बात को भी स्वीकारा की सीएम इलाही और उनके बीच दूरियां बढ़ गई हैं।
उन्होंने PML-Q नेता के साथ दोबारा कभी बातचीत की संभावनाओं से भी इनकार कर दिया है। जरदारी ने कहा, ‘उन्हें 17 मंत्रालय दिए और उन्हें (इलाही) को उप प्रधानमंत्री बनाया, लेकिन इस बार उन्होंने खुद ही बाहर होना चुना।’
खास बात है कि जरदारी की तरफ से अविश्वास प्रस्ताव की बात ऐसे समय पर सामने आई है, जब इमरान सभी सभाओं से इस्तीफे की बात कर रहे हैं। पूर्व पीएम का कहना है कि उनकी पार्टी मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में नहीं रहना चाहती। पीटीआई की पंजाब, खैबर पख्तूनख्वा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और गिलगित बाल्टिस्तान में है। हालांकि, पार्टी की तरफ से पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा सभाओं को भंग करने की तारीखों का ऐलान नहीं किया गया है।
रहमानाबाद पार्टी के शक्ति प्रदर्शन के दौरान खान ने कहा था, ‘हम इस व्यवस्था का हिस्सा नहीं रहेंगे। हम ने सभी सभाएं और विधानसभाएं छोड़ने का फैसला किया है।’ (एएमएपी)