भाजपा से नाराजगी के बावजूद लोग कांग्रेस के साथ जाने को तैयार नहीं ।
पिछले दिनों एक खबर आई कि पंजाब विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव में एबीवीपी जीत गई। वहां सत्ता में आम आदमी पार्टी है और सत्ता की दावेदार यानी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस है। दोनों को मुंह की खानी पड़ी। वहां भाजपा का कोई जनाधार नहीं तब भी एबीवीपी जीत गई। उसके बाद राजस्थान में स्थानीय निकाय चुनाव हुए। वहां सीधा मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच था। इस चुनाव में भाजपा विरोध के 27% वोट निर्दलीयों को मिले। उसके बाद हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव हुआ। जिस शहर में जेन—जी का इतना बड़ा आंदोलन हुआ और राहुल गांधी तक पीएम आवास के बाहर धरने पर बैठे,वहां माना जा रहा था कि एबीवीपी की बड़ी हार होगी, लेकिन नतीजा आया तो छात्रसंघ अध्यक्ष समेत तीन पदों पर एबीवीपी को जीत हासिल हुई। इन तीनों चुनावों के नतीजे बताते हैं कि लोग बीजेपी से नाराज जरूर हैं, फिर भी वे कांग्रेस के साथ जाने को तैयार नहीं और राहुल गांधी कांग्रेस के लिए भस्मासुर साबित हो रहे हैं।
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में तो जेन—जी का सबसे बड़ा झंडाबरदार बनने वाले आईसा और एआईएसएफ दोनों मिलकर लड़े थे। खबर है कि दोनों को मिलाकर नोटा से भी कम वोट मिले। इन सब खबरों पर नजर डालने के बाद आ जाइए मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में, जहां बीते शनिवार को राहुल गांधी ने छात्रों की गूंज कार्यक्रम किया। मेरा मानना है कि भारत के राजनीतिक इतिहास का यह सबसे घटिया, बेहूदा और शर्मनाक कार्यक्रम था। राहुल गांधी इसमें एक स्टैंड अप कॉमेडियन को लेकर आए,जिसकी बेहद घटिया हरकतों पर वह ठहाके लगा रहे थे। वैसे भी सेंसिबल बात करने वाले राहुल गांधी को पसंद नहीं हैं क्योंकि उनका वही स्टैंडर्ड है। इंदौर के इस कार्यक्रम को राहुल गांधी के किसी समर्थक ने भी देखा होगा तो उसको भी शर्म महसूस हो रही होगी। लेकिन राहुल गांधी को लगता है कि गाली देकर वह जो नैरेटिव खड़ा करेंगे, वही उनको प्रधानमंत्री बना देगा। इस देश या दुनिया में कहीं भी गाली देकर कोई प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं बना है। एक तरफ चुनावों में कांग्रेस की हालत देखिए और दूसरी तरफ राहुल गांधी का व्यवहार देखिए। उस सबको मिलाकर अगर आप एक निष्कर्ष निकालना चाहें तो वह यह है कि इस समय भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ माहौल बहुत खराब है। यूजीसी गाइडलाइंस से लेकर एससी—एसटी एट्रोसिटीज एक्ट तक कई मामलो पर लोग उससे नाराज हैं। इस सबके बावजूद लोग संदेश दे रहे हैं कि हम इस नाराजगी के बावजूद कांग्रेस की ओर देखना भी नहीं चाहते। तो कांग्रेस पार्टी को अगर पॉलिटिकली सर्वाइव करना है तो उसे राहुल गांधी से मुक्ति का रास्ता खोजना पड़ेगा, लेकिन उसकी कोई उम्मीद दिखाई नहीं दे रही। इसलिए मुझे कांग्रेस की भी कोई उम्मीद दिखाई नहीं दे रही है। यह बड़ी विचित्र सी स्थिति है कि सत्तारूढ़ दल से नाराजगी के बावजूद जो मुख्य विपक्षी दल है, उसकी तरफ जनता आंख उठाकर देखने को भी तैयार नहीं है।
2024 के लोकसभा चुनाव में भी लोगों ने भाजपा से नाराजगी जाहिर की थी। उम्मीद थी कि कांग्रेस इस स्थिति का फायदा उठाकर अपनी ताकत बढ़ाएगी और बीजेपी को पीछे धकेलने की कोशिश करेगी। हुआ इसका ठीक उल्टा। बीजेपी ने कांग्रेस को पीछे धकेल दिया और इतनी दूर तक धकेल दिया कि उसके लिए लौट कर आना मुश्किल है। उसके बाद जितने विधानसभा चुनाव हुए उनके नतीजे देख लीजिए। हर राज्य में कांग्रेस को बुरी तरह से हार मिली। हरियाणा में सीधी लड़ाई कांग्रेस और बीजेपी के बीच थी,वहां बीजेपी को इतिहास की सबसे बड़ी जीत मिली। जबकि तमाम विश्लेषकों का तर्क था कि कांग्रेस का आना तो तय है। इसी तरह से महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव के बाद लग रहा था कि कांग्रेस का रिवाइवल हो रहा है, लेकिन विधानसभा चुनाव में पता चला कि वह तो जमीन के नीचे जा रही है। बिहार में उसका कुछ था ही नहीं। दिल्ली में वह कभी खड़ी हो पाएगी, ऐसा कुछ दिखाई नहीं दे रहा। वहां तीन लोकसभा और तीन विधानसभा चुनाव हो गए। कांग्रेस जीरो से आगे बढ़ नहीं पाई। यह तब हुआ जब लोकसभा चुनाव में देश के कई राज्यों में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया और भाजपा ने खराब प्रदर्शन किया। तो भाजपा का खराब प्रदर्शन भी कांग्रेस के अच्छे प्रदर्शन पर भारी पड़ रहा है। जम्मू कश्मीर में हुए चुनाव में कश्मीर घाटी में तो बीजेपी का कभी कुछ था ही नहीं तो वहां कुछ मिलने की उम्मीद भी नहीं थी। लेकिन कांग्रेस की वहां भी हालत खराब रही और जम्मू में तो भाजपा ने उसका सफाया ही कर दिया। तमिलनाडु में डीएमके के साथ गठबंधन में कांग्रेस सिर्फ पांच विधानसभा सीटें जीती और नतीजा आते ही डीएमके को छोड़कर टीवीके साथ चली गई। नतीजा यह हुआ कि अब डीएमके कांग्रेस को नीचा दिखाने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस की कुल उपलब्धि केरल में उसकी सरकार बनना है। उसके अलावा कुछ नहीं है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के खिलाफ 15 साल की एंटी इनकंबेंसी का फायदा उस भाजपा ने उठाया जिसकी 2016 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ तीन सीटें थीं। 2021 में वह 75 और 2026 में 208 सीटों पर पहुंच गई और लगातार 30 साल तक पश्चिम बंगाल में राज करने वाली कांग्रेस पार्टी केवल दो सीटों पर सिमट गई। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की हालत यह हो गई है कि जो कांग्रेस पार्टी खुद दिवालिया हो चुकी है,उसका समर्थन ले रही है।
कुल मिलाकर स्थिति यह है कि देश की दूसरी सबसे बड़ी और देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस एवं उसके नेता राहुल गांधी देश के लोगों की नजर में चढ़ने की बजाय गिरते जा रहे हैं। इंदौर का उनका जो कार्यक्रम था, वह कितना घटिया था, यह बताने के लिए शब्द नहीं हैं। जो भी कांग्रेसी थोड़ी सी समझ रखते होंगे और सामाजिक जीवन की मर्यादा का पालन करते होंगे, वह शर्मिंदा होंगे इसका मुझे पक्का यकीन है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर बैठा हुआ व्यक्ति अगर उसका मजा लेता है और हंसता है तो उसके लिए इससे ज्यादा शर्मनाक बात और कोई नहीं हो सकती। तो कांग्रेस पार्टी को अगर सर्वाइव करना है तो उसे पहले कदम के रूप में राहुल गांधी को नेता प्रतिपक्ष के पद से हटा देना चाहिए। जब से वह नेता प्रतिपक्ष बने हैं, कांग्रेस और नीचे जा रही है। कांग्रेस ने अगर इस भस्मासुर से निजात नहीं पाई तो वह पूरी तरह खत्म हो जाएगी।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)












