#pradepsinghप्रदीप सिंह।
प्रकृति हमें सिखाती है कि धैर्य का दामन कभी मत छोड़ो। 26 मई को नरेंद्र मोदी की सरकार को 12 साल हो गए। इन 12 सालों में इस सरकार की उपलब्धि क्या रही तो मैं कहूंगा धैर्य। कबीर दास का एक दोहा है- धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होए। माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होए। यानी समय से पहले कुछ नहीं होता है। अधीरता दिखाने से काम बिगड़ता है,बनता नहीं है।
2014 में जब पहली बार नरेंद्र मोदी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी तो सभी लोग आस लगाए हुए थे कि अब उन्हें ताबड़तोड़ सब कुछ बदल देना चाहिए, लेकिन नरेंद्र मोदी ने ऐसा कुछ नहीं किया। वह पहले 5 साल एक तरह से खेत तैयार करते रहे। उसमें बीज डाला,खाद डाली,पानी डाला और फसल का इंतजार करते रहे और 2019 के बाद काम शुरू किया। अनुच्छेद 370 हटाना, अयोध्या में राम मंदिर, तीन तलाक पर रोक जैसे सभी काम तभी हुए। नरेंद्र मोदी की आर्थिक उपलब्धि का सबसे बड़ा कारण जो जैम (जनधन, आधार और मोबाइल) ट्रिनिटी बनी,उस पर भी काम 2014 में शुरू हुआ था। आप कल्पना कीजिए कि अगर यह ट्रिनिटी न होती तो 2020 में कोरोना के दौरान देश की अर्थव्यवस्था और इस देश के गरीब आदमी का क्या हाल होता? गरीब परिवारों तक पैसा और अनाज पहुंच सका तो उसमें सबसे बड़ा योगदान इस योजना का था, जिसका पहले मजाक उड़ाया गया था। नरेंद्र मोदी ने आम जनता के लिए बैंकों के दरवाजे खोल दिए। फाइनेंशियल इंक्लूजन का मुझे लगता है कि दुनिया में इससे बड़ा कार्यक्रम कोई चला ही नहीं। इस तरह से आप गिनना शुरू करें तो उपलब्धियां बहुत सारी हैं।
1998 में जब एनडीए (नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस) बना तो उससे पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई थी। लालकृष्ण आडवाणी उस समय भाजपा के अध्यक्ष थे। उन्होंने कहा कि विचारधारा पर आधारित संगठन के बढ़ने की एक सीमा होती है। हम उस सीमा तक पहुंच गए हैं। अब अगर हमें आगे बढ़ना है तो हमें अपनी विचारधारा से समझौता करना पड़ेगा। एनडीए का जो नेशनल एजेंडा फॉर गवर्नेंस बना, उसमें भारतीय जनता पार्टी ने कहा कि हमारे जो तीन कोर इश्यूज हैं- अयोध्या में राम जन्मभूमि पर मंदिर,अनुच्छेद 370 और यूनिफार्म सिविल कोड इन्हें हम फिलहाल बैक बर्नर पर रखते हैं। अब उससे लगता है कि आडवाणी और उनकी पीढ़ी लड़ते-लड़ते थकने लगी थी। उस समय का नेतृत्व उस स्थिति में पहुंच गया था कि अब और संघर्ष का कोई मतलब नहीं है। 2014 में केंद्र की सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले इस अवधारणा को गलत साबित किया कि विचारधारा पर आधारित पार्टी के विकास की कोई सीमा होती है। उन्होंने दिखाया कि आपकी शक्ति और परिश्रम जहां तक है,वहां तक बढ़ सकते हैं। 2024 में भाजपा की सीटें घटकर 240 पर आ गईं, लेकिन फिर भी उन्होंने अपना रास्ता नहीं बदला। उस समय बड़ा दबाव था कि भाजपा अपना कोर्स करेक्शन करें,हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का रास्ता छोड़े,लेकिन प्रधानमंत्री ने ऐसा कुछ नहीं किया। मेरा मानना है कि 2024 में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के बयान कि हमें आरएसएस की जरूरत नहीं है, ने काफी नुकसान कराया। उससे पूरा चुनाव बदल गया। उसको ठीक करने के लिए भाजपा ने पूरी तन्मयता से प्रयास किया और उसका पहला परिणाम महाराष्ट्र में मिला। जिस महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव में पार्टी की भारी दुर्गति हुई थी,वहां प्रचंड बहुमत के साथ पार्टी और गठबंधन सत्ता में आया। विरोधियों को छोड़िए भाजपा के लोग तक सकते में थे कि यह नतीजा कैसे आ गया। सिर्फ छह महीने में भाजपा ने पूरी तस्वीर बदल दी। उसके बाद हरियाणा, दिल्ली, बिहार , असम और पश्चिम बंगाल में भी उसे प्रचंड जीत मिली। और यह सब इसी वजह से हुआ कि भाजपा ने सिस्टम को बदल डाला। पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत केवल एक राज्य में उसकी जीत नहीं है। पश्चिम बंगाल आप मानकर चलिए कि दक्षिण भारत में भाजपा का दरवाजा खोलेगा, लेकिन आज मैं इसकी बात नहीं कर रहा हूं। मैं बात कर रहा हूं कि वामपंथियों और कांग्रेस का जो इको सिस्टम था,वह जिस तरह के सदमे में है। 2014,2019 और 2024 में तीन बार भाजपा की सरकार बनने के बाद भी वह इस तरह के सदमे में नहीं आया था। उनको लगता था कि समय है, निकल जाएगा, लेकिन पश्चिम बंगाल ने सब बदल दिया है। पश्चिम बंगाल के बाद यह पूरा इको सिस्टम बेहोश पड़ा है। उनको समझ में नहीं आ रहा है करें क्या? पूरे विपक्ष को समझ में नहीं आ रहा है कि कैसी राजनीति करें। लेख लिखे जा रहे हैं,भाषण दिए जा रहे हैं, टेलीविजन चैनल्स पर बहस हो रही है। कहा जा रहा है कि विपक्ष को सेकुलरिज्म के बारे में नए सिरे से सोचना पड़ेगा। उनको अभी तक यह बात समझ में नहीं आई है कि सेकुलरिज्म इस देश में पराई चीज है, जिसको कभी इस देश का मानस स्वीकार नहीं करेगा। मजबूरी और कमजोरी के कारण इस देश में सेकुलरिज्म पनपा और आगे बढ़ा। जैसे ही सनातन संस्कृति का पुनर्जागरण हुआ,सेकुलरिज्म हवा में उड़ गया।
1993 का नारा याद है आपको? यह नारा उत्तर प्रदेश असेंबली में लगा था। मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम। आज पूरा देश जय श्री राम बोल रहा है। किसी की हैसियत नहीं है कि जय श्री राम को हवा में उड़ा दे। लेकिन गलतफहमी की कोई दवा भी नहीं है। पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजे के बाद विपक्ष को समझ में नहीं आ रहा है कि वह कौन सी राजनीति करें, जिससे उसको आगे बढ़ने का मौका मिले। अभी तक जो मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति सेकुलरिज्म के सैद्धांतिक लबादे में लपेट कर चल रही थी, उसके दिन चले गए। फलता विधानसभा उपचुनाव का नतीजा बताता है कि हिंदू अब राजनीतिक सोच के साथ वोट देने को तैयार है। वह एकजुट होकर वोट देने के लिए तैयार है। वह जाति में बंटकर वोट देने के लिए तैयार नहीं है। इसलिए अब भाजपा के लिए चुनावी जीत की संभावनाएं अपार हैं।
पश्चिम बंगाल के चुनाव के नतीजे से लुटियंस दिल्ली, खान मार्केट गैंग इन सब पर सबसे बड़ा हमला हुआ है। इनको कुछ समझ में नहीं आ रहा है। जो आज रोते हैं कि हिंदू मुसलमान की राजनीति की जा रही है। वह भूल रहे हैं कि इस देश का विभाजन ही हिंदू मुसलमान के नाम पर हुआ। लाखों लाखों लोग मारे गए और बेघर हुए। और ये उम्मीद कर रहे थे कि जिन्होंने ये भुगता है, वह सब कुछ भूल जाएंगे। जिन्होंने हत्या की, जिन्होंने बलात्कार किया,जिन्होंने उजाड़ा उनको गले लगा लेंगे। अब इस गलतफहमी का आप क्या कहेंगे? तो सवाल यह है कि 47 में यह सब क्यों नहीं हुआ? इसका जवाब है परिस्थितियां,समय,शक्ति। धैर्य के साथ हिंदुओं ने अपनी ताकत को एकजुट करने का इंतजार किया। डेमोक्रेसी में संख्या बल तय करता है कि कौन ताकतवर है। अभी तक हो ये रहा था कि जो संख्या में कम थे, वे जीत रहे थे। वह अपनी ताकत का स्ट्रेटेजिक तौर पर इस्तेमाल कर रहे थे। दूसरी तरफ हिंदुओं को इंतजार था एक ऐसे व्यक्ति का जो उन्हें जोड़े। तो एक नहीं, कई-कई आ गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, असम में हिमंत बिस्वा सरमा और अब शुभेंदु अधिकारी, ये सब हिंदुओं को जोड़ने वाले नेता हैं। इनको सनातनी होने पर गर्व है। तभी प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से बोल पाते हैं कि विकास भी और विरासत भी। तभी भाजपा यह बोल पाती है कि जो हमारा है, वह सब लेंगे। तो अयोध्या लिया। दुनिया के इतिहास में आपको ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलेगा कि किसी ने अपने इष्ट देव के धर्मस्थल के लिए 500 साल तक संघर्ष किया हो। अब काशी भी मिलेगा,मथुरा भी मिलेगा और भी मिलेंगे। आज बांग्लादेशी घुसपैठिए लाइन लगाकर वापस लौट रहे हैं। अब असम, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल और बिहार में भाजपा की सरकारें होने से घुसपैठियों के सारे रास्ते बंद हो गए हैं। बांग्लादेश के जरिए अमेरिका और पाकिस्तान के भारत में अराजकता पैदा करने के सारे सपने चकनाचूर हो गए हैं। जिस तेजी से सीमा सुरक्षा का काम हो रहा है, वह आज से पहले अकल्पनीय था। इसलिए मैं कह रहा हूं कि पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव ने इस देश की पूरी राजनीति को बदल दिया है। इस देश की सोच को बदल दिया है। अब जो लोग सनातन विरोधी हैं उनको सोचना पड़ रहा है कि कहां जाएं और किस रास्ते पर चलें। पश्चिम बंगाल ने पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया है कि आप 100% मुस्लिम वोट भी ले जाइए, तब भी सत्ता में नहीं आ सकते। 60-65% भी हिंदू एक हो गया तो आपको सत्ता में नहीं आने देगा। इसीलिए अखिलेश यादव भी इटावा में मंदिर बनवा रहे हैं। उनको लग रहा है कि उसकी वजह से सारे हिंदू उनको वोट दे देंगे। बड़ी गलतफहमी में हैं। वह गाना गाएंगे मुसलमानों का और चाहेंगे कि खाना खिलाए हिंदू। यह तो होने वाला नहीं। पूरे देश में जो हिंदू विरोधी राजनीति करने वाले थे, उन सबका यही हाल होने वाला है। और इन सबके बीच पूर्ण बहुमत की सरकार केंद्र और राज्यों में होने के बाद भी नरेंद्र मोदी ने धैर्य का साथ नहीं छोड़ा। वह मंथर गति से आगे बढ़ते रहे। अब लोगों को समझ में आ गया है कि इस आदमी का लक्ष्य क्या है? यह हमें हमारा खोया हुआ वैभव लौटाना चाहता है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)