देश में धर्मनिरपेक्षता और मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति के दिन लदे।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
4 मई को आया देश के चार राज्यों और एक केंद्र शासित क्षेत्र का जनादेश हिंदू मतदाता का जयघोष था। यह बात मैं सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील महेश जेठमलानी, जो भाजपा के राज्यसभा सदस्य भी रह चुके हैं, की एक लंबी पोस्ट के आधार पर कह रहा हूं। उनकी पोस्ट का शीर्षक है-सिविलाइजेशनल पॉलिटिक्स कैन नॉट बी मैन्युफैक्चर्ड ओवरनाइट। उनकी यह पोस्ट हिंदू विरोध की राजनीति करने वालों के लिए एक तरह की चेतावनी है।
जेठमलानी अपनी पोस्ट में कहते हैं कि देश में हिंदुत्व की राजनीति की जगह खाली नहीं है और यह बात भाजपा के अलावा सभी राजनीतिक दलों पर लागू होती है। साथ ही उन्होंने एक खबर भी दी। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी का इन दिनों इंडी गठबंधन का कोई नेता फोन नहीं उठा रहा है। यह आने वाली घटनाओं की आहट है कि भविष्य में क्या होने वाला है। उनके मुताबिक पश्चिम बंगाल के चुनाव का नतीजा राजनीतिक भूकंप है, जिसके झटके अगले एक दशक तक महसूस किए जाएंगे। जब तक हिंदुत्व की राजनीति रहेगी और उसको काटने की कोशिश में मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति चलाई जाएगी तब तक इसके झटके महसूस होते रहेंगे। महेश जेठलानी कहते हैं कि पश्चिम बंगाल का जनादेश हिंदू चेतना को मुख्यधारा में ले आया है। दशकों से भारत के लोगों खासतौर से सनातन धर्म के मानने वालों को यह बताया जाता रहा कि हिंदुत्व का बढ़ना देश के लिए खतरनाक है और सनातन पर गर्व करना सांप्रदायिकता है। इसको रोका जाना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता और मुस्लिम तुष्टीकरण के रास्ते पर चलने वाली राजनीति देश के लिए अनिवार्य है और हिंदू बोध अगर किसी में है तो वह अपराध है। तो पश्चिम बंगाल के मतदाता ने पूरे देश को और पूरी दुनिया को बताया कि भारतीय मतदाता अपनी सांस्कृतिक पहचान को अपराध बोध की तरह नहीं देखता और घोषणा की कि हिंदू स्वाभिमान को सेकुलरिज्म के नाम पर दबाया नहीं जा सकता।
कांग्रेस और उसके बाद वामपंथियों ने देश में सनातन विरोध का सबसे बड़ा बौद्धिक केंद्र पश्चिम बंगाल को बना दिया था। लोगों ने आज उसे ध्वस्त कर दिया है। यह बात मैं सिर्फ इसलिए नहीं कह रहा हूं कि पश्चिम बंगाल में भाजपा चुनाव जीत गई है और ममता बनर्जी की पार्टी चुनाव हार गई है। आप देखिए पश्चिम बंगाल में चुनाव का नतीजा आए करीब एक महीना होने जा रहा है लेकिन जिस तरह से अब भी जश्न मनाया जा रहा है और खुशी जाहिर की जा रही है, वह बताता है कि कितने लंबे समय से लोगों की भावनाओं को दबाकर रखा गया था। महेश जेठमलानी ने अपनी पोस्ट में इसके साथ ही तमिलनाडु को भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि सनातन विरोध का सबसे बड़ा बौद्धिक केंद्र पश्चिम बंगाल और सनातन विरोधी राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र तमिलनाडु था। दोनों किले ढह गए। तमिलनाडु में द्रमुक का सत्ता से बाहर होना और अन्ना द्रमुक का और घट जाना इस बात का प्रमाण है। वह कहते हैं कि इंडी गठबंधन किसी विचार के आधार पर नहीं बना था। वह एक डर पर आधारित था और वह डर था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का। और सबसे बड़ा डर था और है जो पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजे से सामने आया है, उस हिंदू वोटर का जिसने यह घोषणा कर दी है कि अब वह चुप नहीं बैठेगा। वह सनातन विरोध को चुपचाप स्वीकार नहीं करेगा बल्कि वह असहमति में खड़ा होने को तैयार हो गया है। वह वंशवादियों, द्रविड़ विचारधारा पर चलने वालों और वामपंथी बुद्धिजीवियों के अनर्गल प्रलाप को सुनने के लिए तैयार नहीं है। महेश जेठवालानी कहते हैं कि डर कोई नेशनल विज़न नहीं बन सकता है क्योंकि वह नकारात्मकता पर आधारित है। ममता बनर्जी और लेफ्ट के बीच में क्या कॉमन था? भाजपा, हिंदुत्व और सनातन धर्म से घृणा, यही दोनों में कॉमन था। डीएमके और कांग्रेस में क्या कॉमन था? डीएमके और कांग्रेस में अवसरवाद का जो व्यवहार होता है,वह कॉमन था। इस सोच का ही नतीजा है कि चुनाव परिणाम आते ही कांग्रेस ने डीएमके को छोड़ दिया। कांग्रेस को अब टीवीके के साथ अवसर नजर आ रहा है। इसी तरह क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस में जहां-जहां गठबंधन है, उसका आधार क्या है? उसका आधार सिर्फ राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहने की कोशिश है। अब यह पूरा तंत्र चरमरा रहा है। बल्कि मैं तो कहता हूं कि चरमरा कर टूट चुका है। भारत में सनातन धर्म को गाली देकर कोई राजनीतिक ढांचा खड़ा नहीं किया जा सकता, यह इस जनादेश का संदेश है। हिंदू प्रतीकों, मंदिरों, देवी देवताओं का आप मजाक उड़ाएं, उनको अपमानित करें और चुनाव के समय जनेऊ पहन कर आ जाएं, यह अब नहीं चलने वाला है। आपकी इस नीति के पीछे जो नीयत छिपी है, उसको लोग अच्छी तरह से पहचानते हैं। भारतीय राजनीति की अगली शताब्दी इस बात से तय होगी कि कौन जमीन से जुड़ा हुआ है, कौन अपनी संस्कृति पर गर्व करता है और किसमें हिंदुत्व का बोध है। यह जो उपनिवेशवादी सोच है,उसको यह देश नहीं स्वीकार करने वाला। अब जो बदलाव आ रहा है,उसको देखकर हर पार्टी हिंदुत्व की राजनीति करने की कोशिश करेगी,लेकिन वहां कोई जगह खाली नहीं है। उस जगह को पूरी तरह से संघ परिवार,भाजपा और उसके नेता, उसके समर्थक भर चुके हैं। वहां आपके खड़े होने की भी गुंजाइश नहीं है क्योंकि संघ और भाजपा ने हिंदुत्व की लड़ाई लड़ी है। जब भी मौका आया है,सच बोलने की हिम्मत दिखाई है, बलिदान दिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने तीन-तीन प्रतिबंध सहे हैं। एक शताब्दी के संघर्ष का यह नतीजा है यह जनादेश। इसीलिए पश्चिम बंगाल के चुनाव के पहले भाजपा के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने कहा था कि हमारे लिए यह चुनाव नहीं, सिविलाइजेशनल बैटल है और उस बैटल को भाजपा ने जीत लिया है।
महेश जेठमलानी अपनी पोस्ट में शिवसेना का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि बाल ठाकरे ने हिंदुत्व के विचार पर आधारित एक दल बनाया,लेकिन सेकुलरिज्म की राजनीति पर खड़े होने के लिए उद्धव ठाकरे ने उसको त्याग दिया। आज उद्धव ठाकरे कहां हैं? तो भारत की नई राजनीति हिंदुत्व और भारतीय संस्कृति से जुड़ी हुई होगी। जिन लोगों ने इस संस्कृति और सनातन धर्म का मजाक उड़ाया, अब आने वाले समय में आप देखेंगे वह इसकी नकल करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने अपनी राजनीति सनातन विरोध की जमीन पर तैयार की। आज वह उसकी फसल काट रहे हैं। अब उन्हें पता चलेगा कि भारत के लोग कुछ भी भूल सकते हैं, लेकिन अपनी संस्कृति का अपमान नहीं भूल सकते। भारत के मतदाता को समझ में आ गया है कि इनको कितना भी मौका दो, ये सुधरने वाले नहीं हैं। तो यह भारत देश के हिंदू मतदाता का जयघोष है कि अब आने वाले समय में राजनीति हिंदुत्व की जमीन पर होगी। राजनीतिक दलों में जो प्रतियोगिता होगी,वह हिंदुत्व की विचारधारा के आधार पर होगी। मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति की विदाई हो गई है। महेश जेठभलानी ने केवल पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु का उदाहरण दिया। मैं इसमें असम को भी जोड़ता हूं। असम मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति की सबसे बड़ी प्रयोगशाला था। देश में जहां भी मुस्लिम पापुलेशन 10-12% या उससे ज्यादा है, वहां राजनीति इस तरह से चलाई गई कि मुस्लिम तय करेंगे कि इस प्रदेश या इस देश में किसका शासन होगा। इस मुस्लिम वोट का वीटो तो नरेंद्र मोदी ने 2014 में खत्म कर दिया था, लेकिन 2026 में उन्होंने हिंदू वोट का जो वीटो तैयार किया है, उसे कोई खत्म नहीं कर सकता क्योंकि यह देश सनातनियों का है।
तमिलनाडु में एमके स्टालिन के बेटे उदयनिधि स्टालिन ने कहा था कि सनातन का समूल नाश कर देना चाहिए। अब उनकी पार्टी का समूल नाश होने का समय आ गया है। बिहार में आरजेडी के एक पूर्व मंत्री के रामचरितमानस और हिंदू देवी देवताओं के बारे में दिए गए बयाान को याद कीजिए। आज बिहार की राजनीति में आरजेडी अप्रासंगिक हो गई है। तो जो वैचारिक अधिष्ठान लेफ्ट इकोसिस्टम ने खड़ा किया था, उसके खात्मे की शुरुआत हो गई है और उसमें सबसे बड़ी भूमिका पश्चिम बंगाल के लोगों की है। पश्चिम बंगाल से ही लेफ्ट इकोसिस्टम का नैरेटिव पूरे देश में चलता था, वह पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है। एकमात्र राज्य केरलम तक से लेफ्ट के पांव उखड़ चुके हैं। अब वे जहां भी हैं, परजीवी की तरह हैं। पश्चिम बंगाल और असम ने मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति पर भी बड़ा कुठाराघात किया है। राहुल गांधी आजकल जो कह रहे हैं कि अल्पसंख्यक मत बोलो, मुसलमान बोलो, वह ऐसे समय बोल रहे हैं जब मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति का सफाया हो रहा है। लेकिन यह सब समझने के लिए राजनीति की समझ होनी चाहिए। मुस्लिम तुष्टीकरण और धर्मनिरपेक्षता की राजनीति करने वालों का अब कोई नाम लेवा नहीं बचने वाला है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)