निकाय चुनाव के नतीजों से 2027 के लिए जगी उम्मीद।
प्रदीप सिंह।राजनीतिक परिवर्तन की हवा बहुत धीरे-धीरे शुरू होती है और बढ़ते-बढ़ते एक समय आंधी में बदल जाती है। यह हमने पश्चिम बंगाल में देखा। तो कुछ सालों तक आने वाले सभी चुनावों को अगर समझना हो तो पश्चिम बंगाल के चुनाव के नतीजे के संदर्भ में ही देखकर समझना पड़ेगा।
हाल ही में पंजाब में स्थानीय निकाय के चुनाव हुए हैं। इन चुनावों के नतीजे स्पष्ट कह रहे हैं कि आम आदमी पार्टी अब भी बहुत आगे है। नंबर दो पर कांग्रेस है, जो आम आदमी पार्टी से अब भी बहुत पीछे है। तीसरे नंबर पर शिरोमणि अकाली दल और चौथे नंबर पर भारतीय जनता पार्टी है। अब यह क्रम देखकर लगता है कि पंजाब में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव में कुछ बदलेगा नहीं। लेकिन कई बार मोटे तौर पर जो आंकड़े होते हैं वह सही तस्वीर नहीं दिखाते। सही तस्वीर जानने के लिए आंकड़ों की तह में जाना पड़ता है। तो निकाय चुनावों में आम आदमी पार्टी को 950, कांग्रेस को 390, शिरोमणि अकाली दल को 191 और भारतीय जनता पार्टी को 170 सीटें मिली हैं। अब इसमें तो कहीं कोई कंफ्यूजन नहीं है कि किस पार्टी की क्या हैसियत है। लेकिन अगर आप 2021 के स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों से इन नतीजों की तुलना करेंगे तो आपको माइक्रो पिक्चर दिखेगी। इस बार आठ में से दो नगर निगम भाजपा के वर्चस्व वाले बने हैं। 2021 में नगर निकाय की 2225 सीटों में भाजपा 49 सीटों पर सिमट गई थी। अंदाजा लगाइए कि उस समय भाजपा की क्या हालत थी। इस बार भाजपा केवल 1316 सीटों पर लड़ी है और 170 सीटें जीती है। 2021 में कांग्रेस पार्टी 1432 सीटों पर जीती थी,लेकिन इस बार वह सिमटकर 390 पर आ गई है। तो आप इन 5 सालों में कांग्रेस पार्टी की गिरावट देख लीजिए। शिरोमणि अकाली दल 2021 में 248 सीटों पर जीता था,लेकिन इस बार सिर्फ 191 सीटों पर जीता है। आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल तीनों इस बार 2021 की अपनी परफॉर्मेंस से नीचे आए हैं और केवल भाजपा ने 2021 की परफॉर्मेंस से बेहतर प्रदर्शन किया है। अब ऐसा नहीं है कि इसके आधार पर यह कहा जा सके कि 2027 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सरकार बनने वाली है, लेकिन अगर आप 4 मई से पहले मुझसे पूछते कि क्या भाजपा की पंजाब में सरकार बन सकती है तो मैं कहता असंभव है। लेकिन आज अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मैं कहूंगा कि कम से कम अभी इसकी संभावना दिखाई नहीं देती है। तो वह असंभव शब्द निकल गया है।
पंजाब की राजनीति में जिस तरह का परिवर्तन हो रहा है। आम आदमी पार्टी के खिलाफ जैसी एंटी इनकंबेंसी है और कांग्रेस पार्टी जो स्वाभाविक रूप से सत्ता की दावेदार होनी चाहिए थी, वह उठ नहीं रही है। शिरोमणि अकाली दल तो दिन पर दिन नीचे ही जा रहा है और उसके उठने की कोई संभावना नहीं है तो 2027 के चुनाव में मुझे लगता है कि मुख्य प्लेयर आम आदमी पार्टी नंबर एक, कांग्रेस पार्टी नंबर दो और भाजपा नंबर तीन पर होगी। यह ट्रायंगुलर फाइट होगी। कहीं-कहीं शिरोमणि अकाली दल इस लड़ाई को चतुष्कोणीय बना देगा। एक तो यह परिवर्तन दिखाई दे रहा है। दूसरा भाजपा जिस तरह से काम कर रही है। उसने एक जट सिख को अपना प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। हालांकि भाजपा को जट सिख का वोट मिलना नहीं है, लेकिन फिर भी उसने उनको प्रदेश अध्यक्ष बनाकर एक संदेश दिया है। भाजपा का वोट की दृष्टि से जो कैचमेंट एरिया होगा, वह शहरी हिंदू, शहरी सिख, उसके अलावा दलित सिख होगा। पंजाब में दलितों की आबादी लगभग 33 फीसदी है। इनका और जट सिख का हमेशा 36 का आंकड़ा रहता है। जो दलित या मजहबी सिख हैं उनको जट सिख अपने गुरुद्वारों में नहीं आने देते। इसलिए उन्होंने अपने अलग गुरुद्वारे बनाने शुरू किए और जट सिखों से नाराजगी की हालत यह है कि दलित सिखों का एक बड़ा वर्ग धीरे-धीरे धर्म परिवर्तन की ओर जा रहा है। पूरे देश में इस समय पंजाब में ईसाई मिशनरीज धर्म परिवर्तन कराने में सबसे तेजी से लगी हुई हैं। भाजपा के लिए कैचमेंट एरिया राज्य की 70% आबादी है। इसीलिए इन नगर निकाय चुनावों के नतीजे भाजपा के लिए उम्मीद जगाते हैं क्योंकि वह एकमात्र पार्टी है, जो बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। हालांकि अब भी संख्या इतनी कम है कि उससे यह उम्मीद करना कि एकदम सारी बाजी पलट जाएगी, ऐसा संभव नहीं है। लेकिन इससे एक नैरेटिव बनेगा। चुनाव में अक्सर होता है कि रियलिटी से ज्यादा नैरेटिव मैटर करता है। तो नैरेटिव यह बनेगा कि कांग्रेस पार्टी अभी आम आदमी पार्टी को सत्ता से हटाने की स्थिति में नहीं है। शिरोमणि अकाली दल का किस्सा खत्म हो चुका है। भाजपा एक नए खिलाड़ी के रूप में इस मैदान में आई है। तो क्या इसको आजमाना चाहिए?
मुझे अगस्त 2015 का एक किस्सा याद आता है। मैं उन दिनों अमृतसर गया हुआ था। उस समय प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री थे। उनका काफिला जा रहा था तो सारा ट्रैफिक रोक दिया गया था। मेरी टैक्सी का ड्राइवर भी सिख था। वह इतने अपशब्द प्रकाश सिंह बादल के लिए बोल रहा था कि मैंने कभी किसी नेता के लिए नहीं सुने हैं। उसका कहना था कि बादल का हारना जरूरी है। तो मैंने पूछा, अगर अकाली दल हारेगा तो कांग्रेस आएगी। इस पर उसने कहा कि कांग्रेस को तो नहीं चुनेंगे। तो मैंने कहा, फिर कौन बचता है? उसने जवाब दिया कि दिल्ली वाले को देख रहे हैं। उस समय दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार थी और केजरीवाल मुख्यमंत्री थे। यानी जिस पार्टी का 2015 में पंजाब में कोई विशेष वजूद नहीं था,उसके बारे में पंजाब का मतदाता विकल्प के रूप में सोच रहा था और 2017 का जो विधानसभा चुनाव हुआ,उसमें आम आदमी पार्टी राज्य में नंबर दो की पार्टी बन गई। वह उसी चुनाव में सत्ता में आ जाती अगर आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा होता कि पंजाब में हमारी पार्टी की सरकार बनी तो अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री होंगे। दूसरा केजरीवाल पंजाब में एक ऐसे नेता के घर जाकर रुक गए, जिसका संबंध खालिस्तानियों से था। कांग्रेस और अकाली दल ने इसका फायदा उठाया और पूरे प्रदेश में यह बात फैलाई कि ये खालिस्तानियों से मिले हुए हैं। उसका भी आम आदमी पार्टी को नुकसान हुआ। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस सत्ता में आ गई। लेकिन कांग्रेस अपना घर संभाल नहीं पाई। गांधी परिवार ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को बेइज्जत करके मुख्यमंत्री पद से हटाया। वह नवजोत सिंह सिद्धू को मुख्यमंत्री बनाना चाहता था लेकिन राज्य के कांग्रेसियों ने सिद्धू को बनने नहीं दिया। इस लड़ाई में चरणजीत सिंह चन्नी मुख्यमंत्री बने और कांग्रेस ने उस समय बड़ा शोर मचाया कि हमने पहला दलित मुख्यमंत्री बनाया है। लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। तो मैं 2015 की घटना का जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि लोगों की नजर लंबे समय से विकल्प पर रहती है। इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि नंबर दो कौन है? नंबर तीन कौन है? नंबर चार कौन है? 2015 में विधानसभा चुनाव की राजनीति के नजरिए से देखें तो आम आदमी पार्टी नॉन एग्जिस्टेंट थी। 2027 में भी यह स्थिति आ सकती है। लेकिन अगर पंजाब के मतदाताओं को लगा कि भाजपा विकल्प बनने की स्थिति में नहीं है तो वह लौटकर कांग्रेस की ओर भी जा सकता है।
तो निकाय चुनाव के नतीजों में सबसे आगे होने के बावजूद आम आदमी पार्टी की पंजाब में स्थिति खराब लग रही है। लेकिन अभी पंजाब का मतदाता कांग्रेस की ओर विकल्प के रूप में नहीं देख रहा है। वह विकल्प तलाश रहा है। जिस भाजपा का पूरे प्रदेश में कभी संगठन तक नहीं रहा है उसे अगर पंजाब का मतदाता बढ़ा रहा है, भले ही बहुत छोटी मात्रा में, तो इससे एक संकेत मिलता है कि कहीं न कहीं परिवर्तन के बारे में लोगों की सोच बन रही है। अब वह 2027 में होगा या 2032 में, मुझे नहीं मालूम। लेकिन इतना निश्चित है कि पंजाब का मतदाता कांग्रेस,अकाली दल और आम आदमी पार्टी तीनों से ऊब रहा है। तीनों का विकल्प चाहता है। सवाल है कि क्या बीजेपी वह विकल्प बन पाएगी?
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)
पंजाब की राजनीति में जिस तरह का परिवर्तन हो रहा है। आम आदमी पार्टी के खिलाफ जैसी एंटी इनकंबेंसी है और कांग्रेस पार्टी जो स्वाभाविक रूप से सत्ता की दावेदार होनी चाहिए थी, वह उठ नहीं रही है। शिरोमणि अकाली दल तो दिन पर दिन नीचे ही जा रहा है और उसके उठने की कोई संभावना नहीं है तो 2027 के चुनाव में मुझे लगता है कि मुख्य प्लेयर आम आदमी पार्टी नंबर एक, कांग्रेस पार्टी नंबर दो और भाजपा नंबर तीन पर होगी। यह ट्रायंगुलर फाइट होगी। कहीं-कहीं शिरोमणि अकाली दल इस लड़ाई को चतुष्कोणीय बना देगा। एक तो यह परिवर्तन दिखाई दे रहा है। दूसरा भाजपा जिस तरह से काम कर रही है। उसने एक जट सिख को अपना प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। हालांकि भाजपा को जट सिख का वोट मिलना नहीं है, लेकिन फिर भी उसने उनको प्रदेश अध्यक्ष बनाकर एक संदेश दिया है। भाजपा का वोट की दृष्टि से जो कैचमेंट एरिया होगा, वह शहरी हिंदू, शहरी सिख, उसके अलावा दलित सिख होगा। पंजाब में दलितों की आबादी लगभग 33 फीसदी है। इनका और जट सिख का हमेशा 36 का आंकड़ा रहता है। जो दलित या मजहबी सिख हैं उनको जट सिख अपने गुरुद्वारों में नहीं आने देते। इसलिए उन्होंने अपने अलग गुरुद्वारे बनाने शुरू किए और जट सिखों से नाराजगी की हालत यह है कि दलित सिखों का एक बड़ा वर्ग धीरे-धीरे धर्म परिवर्तन की ओर जा रहा है। पूरे देश में इस समय पंजाब में ईसाई मिशनरीज धर्म परिवर्तन कराने में सबसे तेजी से लगी हुई हैं। भाजपा के लिए कैचमेंट एरिया राज्य की 70% आबादी है। इसीलिए इन नगर निकाय चुनावों के नतीजे भाजपा के लिए उम्मीद जगाते हैं क्योंकि वह एकमात्र पार्टी है, जो बढ़ती हुई दिखाई दे रही है। हालांकि अब भी संख्या इतनी कम है कि उससे यह उम्मीद करना कि एकदम सारी बाजी पलट जाएगी, ऐसा संभव नहीं है। लेकिन इससे एक नैरेटिव बनेगा। चुनाव में अक्सर होता है कि रियलिटी से ज्यादा नैरेटिव मैटर करता है। तो नैरेटिव यह बनेगा कि कांग्रेस पार्टी अभी आम आदमी पार्टी को सत्ता से हटाने की स्थिति में नहीं है। शिरोमणि अकाली दल का किस्सा खत्म हो चुका है। भाजपा एक नए खिलाड़ी के रूप में इस मैदान में आई है। तो क्या इसको आजमाना चाहिए?
मुझे अगस्त 2015 का एक किस्सा याद आता है। मैं उन दिनों अमृतसर गया हुआ था। उस समय प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री थे। उनका काफिला जा रहा था तो सारा ट्रैफिक रोक दिया गया था। मेरी टैक्सी का ड्राइवर भी सिख था। वह इतने अपशब्द प्रकाश सिंह बादल के लिए बोल रहा था कि मैंने कभी किसी नेता के लिए नहीं सुने हैं। उसका कहना था कि बादल का हारना जरूरी है। तो मैंने पूछा, अगर अकाली दल हारेगा तो कांग्रेस आएगी। इस पर उसने कहा कि कांग्रेस को तो नहीं चुनेंगे। तो मैंने कहा, फिर कौन बचता है? उसने जवाब दिया कि दिल्ली वाले को देख रहे हैं। उस समय दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार थी और केजरीवाल मुख्यमंत्री थे। यानी जिस पार्टी का 2015 में पंजाब में कोई विशेष वजूद नहीं था,उसके बारे में पंजाब का मतदाता विकल्प के रूप में सोच रहा था और 2017 का जो विधानसभा चुनाव हुआ,उसमें आम आदमी पार्टी राज्य में नंबर दो की पार्टी बन गई। वह उसी चुनाव में सत्ता में आ जाती अगर आम आदमी पार्टी के कुछ नेताओं ने सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा होता कि पंजाब में हमारी पार्टी की सरकार बनी तो अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री होंगे। दूसरा केजरीवाल पंजाब में एक ऐसे नेता के घर जाकर रुक गए, जिसका संबंध खालिस्तानियों से था। कांग्रेस और अकाली दल ने इसका फायदा उठाया और पूरे प्रदेश में यह बात फैलाई कि ये खालिस्तानियों से मिले हुए हैं। उसका भी आम आदमी पार्टी को नुकसान हुआ। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस सत्ता में आ गई। लेकिन कांग्रेस अपना घर संभाल नहीं पाई। गांधी परिवार ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को बेइज्जत करके मुख्यमंत्री पद से हटाया। वह नवजोत सिंह सिद्धू को मुख्यमंत्री बनाना चाहता था लेकिन राज्य के कांग्रेसियों ने सिद्धू को बनने नहीं दिया। इस लड़ाई में चरणजीत सिंह चन्नी मुख्यमंत्री बने और कांग्रेस ने उस समय बड़ा शोर मचाया कि हमने पहला दलित मुख्यमंत्री बनाया है। लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। तो मैं 2015 की घटना का जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि लोगों की नजर लंबे समय से विकल्प पर रहती है। इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि नंबर दो कौन है? नंबर तीन कौन है? नंबर चार कौन है? 2015 में विधानसभा चुनाव की राजनीति के नजरिए से देखें तो आम आदमी पार्टी नॉन एग्जिस्टेंट थी। 2027 में भी यह स्थिति आ सकती है। लेकिन अगर पंजाब के मतदाताओं को लगा कि भाजपा विकल्प बनने की स्थिति में नहीं है तो वह लौटकर कांग्रेस की ओर भी जा सकता है।
तो निकाय चुनाव के नतीजों में सबसे आगे होने के बावजूद आम आदमी पार्टी की पंजाब में स्थिति खराब लग रही है। लेकिन अभी पंजाब का मतदाता कांग्रेस की ओर विकल्प के रूप में नहीं देख रहा है। वह विकल्प तलाश रहा है। जिस भाजपा का पूरे प्रदेश में कभी संगठन तक नहीं रहा है उसे अगर पंजाब का मतदाता बढ़ा रहा है, भले ही बहुत छोटी मात्रा में, तो इससे एक संकेत मिलता है कि कहीं न कहीं परिवर्तन के बारे में लोगों की सोच बन रही है। अब वह 2027 में होगा या 2032 में, मुझे नहीं मालूम। लेकिन इतना निश्चित है कि पंजाब का मतदाता कांग्रेस,अकाली दल और आम आदमी पार्टी तीनों से ऊब रहा है। तीनों का विकल्प चाहता है। सवाल है कि क्या बीजेपी वह विकल्प बन पाएगी?
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)











