सुरों में हमेशा महकती रहेंगी सुमन कल्याणपुर । 

राजीव रंजन । 
अपने शहर सासाराम में क़रीब 35 साल पहले रेडियो पर एक गाना सुना – “रहे न रहे हम महका करेंगे बनके कली बनके सबा बाग़े वफ़ा में”। ओह, क्या संगीत था! क्या बोल थे! क्या गायकी थी! अद्भुत! गाने ने ऐसा असर डाला कि हर वक़्त इसे सुनने को जी चाहता। अब रेडियो पर तो गाने आपकी मर्ज़ी से आते नहीं। इसे अपनी मर्ज़ी से सुनने का एक ही उपाय था कि आपके पास इसका कैसेट हो। पिताजी ने बताया कि यह फिल्म ‘ममता’ का गाना है और लता मंगेशकर ने गाया है। संगीतकार रोशन हैं।
मैंने सासाराम में बहुत ढूंढ़ा, लेकिन ‘ममता’ कैसेट नहीं मिला। डेहरी ऑन सोन, आरा, पटना में भी नहीं मिला, यहां तक कि मैं इसे बनारस में भी नहीं ढूंढ़ पाया। मैं जहां भी जाता, एक बार पता करने की कोशिश ज़रूर करता कि ‘ममता’ का कैसेट उपलब्ध है या नहीं। मैं निराश हो गया, लेकिन भूला नहीं। गाना कभी-कभार रेडियो पर सुनने को मिल जाता था, लेकिन इससे प्यास बुझती नहीं थी। दो-तीन साल बाद लखनऊ जाने का मौका मिला। टिकैत राय तालाब के पास एक कैसेट की दुकान दिखी। गया और पूछा ‘ममता’ का कैसेट होगा आपके पास? जवाब ‘नहीं’ में मिला। तभी नज़र एक कैसेट पर गई- ‘ए ट्रिब्यूट टू रोशन’। पिताजी की बात ज़ेहन में थी कि ‘ममता’ में संगीत रोशन का है। उसे उठा लिया और उसका कवर पढ़ने लगा। आंखें चमक उठीं, मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई। “रहे न रहे हम महका करेंगे” भी उसमें था।
कुछ समय बाद ‘ममता’ फिल्म देखने का मौका मिला, उसमें पता चला कि गाने के दो वर्जन हैं- एक फीमेल वर्जन और दूसरा डुएट। एक वर्जन ‘मां’ सुचित्रा सेन पर फिल्माया गया था, जिसे लता मंगेशकर ने गाया था। दूसरा वर्जन ‘बेटी’ सुचित्रा सेन और धर्मेंद्र पर फिल्माया गया था, मैं मानकर चल रहा था कि इसे मोहम्मद रफी के साथ लता मंगेशकर ने गाया होगा। बहुत बाद में पता चला कि इसे सुमन कल्याणपुर (28 जनवरी 1937 – 31 मई 2026) ने गाया है।
मुझे लगता है, मुझे ही नहीं, बहुत सारे लोग इस भ्रम में रहे होंगे। और “रहे न रहे हम महका करेंगे” ही क्यों, बहुत सारे ऐसे बेहद लोकप्रिय गाने हैं, जो सुमन कल्याणपुर ने गाए हैं और उन्हें हम लता मंगेशकर का समझते आए। उदाहरण के लिए –
तुमने पुकारा और हम चले आए (राजकुमार, 1964), 
ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे (जब जब फूल खिले, 1965), 
आजकल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हर ज़बान पर (ब्रह्मचारी, 1968), 
मेरा प्यार भी तू है, ये बहार भी तू है (साथी, 1968), 
ना तुम हमें जानो, न हम तुम्हें जाने (बात एक रात की, 1962), 
आया न हमको प्यार जताना, प्यार तुम्हीं से करते हैं (पहचान, 1970), 
जान चली जाए, जिया नहीं जाए, जिया जाए तो फिर जीया नहीं जाए (अनजाना, 1969), 
तुझे प्यार करते हैं करते रहेंगे के दिल बनके दिल में धड़कते रहेंगे (अप्रैल फूल, 1964), 
दिल ने फिर याद किया बर्फ़ सी लहराई है (दिल ने फिर याद किया, 1966) और 
राखी का ये कालजयी गाना – बहना ने भाई की कलाई से प्यार बांधा है (रेशम की डोरी – 1974)। 
दरअसल इन गीतों को लता मंगेशकर का समझने के पीछे भाव यह नहीं है कि सुमन कल्याणपुर उनकी कॉपी करती थीं। इसका भाव यह है कि सुमन कल्याणपुर की संगीत साधना, उनकी गायकी, उनकी प्रस्तुति उस स्तर की थी कि लोग भ्रम में पड़ जाते थे। हिंदी फिल्म संगीत का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, यह बात जरूर याद रखी जाएगी कि सुमन कल्याणपुर ने अपने समय में अनेक ऐसे अमर गीत गाए, जिन्हें लोगों ने बरसों तक लता मंगेशकर का गीत समझा। यह भ्रम केवल आवाज़ की समानता का नहीं था, बल्कि उस स्तर की साधना का प्रमाण भी था। वे गीत को जीती थीं। यही वजह है कि उनके गीत सुनते समय सुनने वाला केवल संगीत नहीं सुनता, बल्कि भावनाओं के एक शांत और सुकूनभरी दुनिया में प्रवेश कर जाता है। उनकी गायकी इतनी मधुर, इतनी त्रुटिरहित और इतनी भावपूर्ण होती थी कि श्रोताओं को विश्वास ही नहीं होता था कि लता मंगेशकर के अलावा कोई दूसरी गायिका भी इतनी सुंदरता और दक्षता के साथ गा सकती है।
लेकिन यह कहना उनके साथ अन्याय होगा कि वे केवल ‘लता जैसी’ सुनाई देती थीं। वास्तव में, सुमन कल्याणपुर की अपनी एक अलग पहचान थी। एक ऐसी पहचान जिसमें सादगी थी, आत्मसंयम था और सुरों की शुचिता थी। उन्होंने कभी प्रचार या प्रतिस्पर्धा का सहारा नहीं लिया; उनकी सबसे बड़ी शक्ति उनका संगीत था। सबसे बड़ी बात है कि सुमन कल्याणपुर ने उस दौर में अपनी अलग पहचान बनाई, जब हिन्दी फिल्म संगीत पर लता मंगेशकर, आशा भोसले और गीता दत्त जैसी महान गायिकाओं का प्रभुत्व था। इतने विराट और प्रभावशाली नामों के बीच अपनी जगह बनाना किसी साधारण प्रतिभा के वश की बात नहीं थी। उस दौर में भी सुमन कल्याणपुर से अपने समय के महान संगीतकारों – सचिन देव बर्मन, नौशाद, शंकर-जयकिशन, रोशन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल आदि ने ढेरों गीत गवाए। अविस्मरणीय गायकी के लिए सुमन कल्याणपुर को भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ (2023) से सम्मानित किया गया।
भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम संगीत युग की एक अत्यंत मधुर, सधी हुई और गरिमामयी आवाज़ अब मौन हो गई है। सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका सुमन कल्याणपुर का निधन केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि उस युग की एक ऐसी सुरलहरी का थम जाना है जिसने दशकों तक श्रोताओं के मन को स्पंदित किया। सुमन कल्याणपुर उन विरल गायिकाओं में थीं, जिनकी आवाज़ में मेलोडी भी थी, शास्त्रीय अनुशासन भी और भावनाओं की अद्भुत अभिव्यक्ति भी। उन्होंने जिस सहजता और शुद्धता से गीतों को गाया, वह उन्हें अपने समय की सबसे विशिष्ट गायिकाओं की पंक्ति में खड़ा करता है।
भारतीय संगीत जगत उन्हें हमेशा उस गायिका के रूप में याद रखेगा, जिसकी आवाज़ में भावना थी, आत्मा थी और सुरों की दिव्यता थी। उनकी स्मृति को विनम्र श्रद्धांजलि।