टीएमसी में टूट और डीएमके की तल्खी का फायदा मानसून सत्र में सरकार उठाएगी।
कहते हैं कि राजनीति में कोई स्थाई दोस्त और दुश्मन नहीं होता। स्थाई सिर्फ हित होते हैं। यही बात जिओपॉलिटिक्स के बारे में भी कही जाती है। भारतीय राजनीति में इस समय यह कहावत पूरी तरह से चरितार्थ होती दिखाई दे रही है।
आप याद कीजिए महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पास कराने के लिए अभी अप्रैल में ही संसद का दो दिन का विशेष सत्र बुलाया गया था। उसमें यह विधेयक पास नहीं हो पाया क्योंकि सरकार के पास दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत नहीं था। उसके साथ ही डीलिमिटेशन का एक और विधेयक था। डीलिमिटेशन लेटेस्ट सेंसस से जुड़ा हुआ होता है। जो भी सेंसस का डाटा उपलब्ध हो उसके आधार पर डीलिमिटेशन हो जाएगा। इसका सीधा सा मतलब यह है कि 2026-27 में जो सेंसस हो रहा है,उसके आंकड़ों का इंतजार किए बिना 2011 के सेंसस के आधार पर सरकार डीलिमिटेशन करा सकती है। कांग्रेस समेत संपूर्ण विपक्ष ने उसका विरोध किया। सबसे बढ़-चढ़कर विरोध तो डीएमके और दक्षिण के राज्यों ने किया। अब आप देखिए कि जुलाई में संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है और उस सत्र में आपको संसद के दोनों सदनों की तस्वीर बदली हुई नजर आएगी। राज्यसभा में भाजपा अकेले बहुमत के करीब पहुंचती और एनडीए दो तिहाई बहुमत के करीब पहुंचता दिखाई देगा। हाल ही में आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्य भाजपा में शामिल हो चुके हैं। एक बीजेडी सदस्य भाजपा में आया है। उसके अलावा 10 राज्यों में द्विवार्षिक चुनाव हो रहे हैं। उससे भी भाजपा की ताकत बढ़ने वाली है। तो एक परिवर्तन यह दिखेगा। लेकिन असली बदलाव आपको लोकसभा में दिखाई देगा। लोकसभा में अभी तक डीएमके विपक्ष में बैठता था। वह कांग्रेस पार्टी के साथ था। अब डीएमके की सदन में नेता कनिमोझी ने लोकसभा अध्यक्ष को चिट्ठी लिखी है कि हम इंडी गठबंधन में शामिल नहीं हैं। हमारा कांग्रेस के साथ अलायंस टूट गया है। इसलिए हमारे बैठने की अलग व्यवस्था की जाए। इसके अलावा 29 सांसदों वाली तृणमूल कांग्रेस के कितने सांसद मानसून सत्र तक ममता बनर्जी के साथ रहेंगे,यह कहना मुश्किल है। टीएमसी के संसदीय दल में दो फाड़ होना तय है। लेकिन इससे बड़ी जो राजनीतिक खबर है,वह यह कि अब डीएमके सदन में सत्तारूढ़ दल भाजपा का साथ दे सकती है। वह साथ में वोट भी कर सकती है या उनकी मदद के लिए एब्सेंट भी रह सकती है। इतना तय है कि कांग्रेस पार्टी जिस मुद्दे का समर्थन करेगी, डीएमके उसका विरोध करेगी। कांग्रेस अब जोसेफ विजय की पार्टी टीवीके के साथ गठबंधन में है लेकिन टीवीके का लोकसभा और राज्यसभा में कोई सदस्य नहीं है। तो लोकसभा में अब सत्ता पक्ष और विपक्ष का समीकरण बदला हुआ नजर आएगा। अब दो पार्टियां डीएमके और टीएमसी का बागी धड़ा सरकार के साथ नहीं हैं पर सरकार के खिलाफ भी नहीं हैं। लेकिन ये दोनों विपक्ष के साथ बिल्कुल नहीं हैं। यह समीकरण भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के लिए शुभ संकेत है। अब उनको अपने विधेयक पास कराने और संसदीय कार्यों में आसानी हो जाएगी।
संसद के मानसून सत्र में भाजपा फिर से डीलिमिटेशन वाला विधेयक ला सकती है। इसे पास कराने के लिए दो तिहाई बहुमत की भी जरूरत नहीं क्योंकि यह संविधान संशोधन विधेयक नहीं है। अगर इन पार्टियों का रवैया न बदला होता तो भी यह विधेयक पास हो जाता। अब और आसानी होगी। अब जो नया विधेयक आएगा, उसमें डीएमके की जो चिंताएं हैं, उसका ख्याल रखा जाएगा। सरकार पहले ही यह मौखिक आश्वासन दे रही थी कि डीलिमिटेशन के बाद दक्षिणी राज्यों की 50% सीटें बढ़ेंगी,अब यह मौखिक की बजाय लिखित में हो जाएगा। हालांकि पहले भी गृहमंत्री अमित शाह कह रहे थे कि हमको कुछ घंटे का समय दीजिए। हम नया बिल लेकर आते हैं, जिसमें यह लिखित में शामिल होगा, लेकिन उस समय कांग्रेस के बहकावे में आकर डीएमके और कुछ दूसरी पार्टियां तैयार नहीं हुईं। अब उनको समझ में आ रहा है कि डीलिमिटेशन का विधेयक तो बीजेपी पास करा ही लेगी। अगर वह साथ नहीं देते हैं तो बीजेपी के लिए लिखित आश्वासन देने की कोई मजबूरी नहीं होगी। ऐसे में दक्षिण के कई राज्यों की सीटें कम भी हो सकती हैं या जितनी उम्मीद है उससे कम बढ़ सकती हैं। तो इसलिए बीजेपी के साथ आने में डीएमके और दूसरे दक्षिणी राज्यों को फायदा है। मुश्किल अब कांग्रेस के लिए होगी। कांग्रेस अब दक्षिण के तीन राज्यों कर्नाटक,तेलंगाना और केरल में सत्ता में है। अब वह इस विधेयक का समर्थन करेगी तो मुश्किल है। विरोध करेगी तो और ज्यादा मुश्किल है। वह इन तीन राज्यों के लोगों को यह संदेश तो नहीं दे सकती कि हम आपकी लोकसभा सीटें कम करवा रहे हैं। तो इसलिए संसद के अंदर का यह जो बदला हुआ परिदृश्य है,वह पूरी राजनीति पर असर डालने वाला है। इंडी गठबंधन की पूरी राजनीति पर असर पड़ने वाला है। भाजपा बिना लोकसभा चुनाव कराए या बिना मध्यावधि चुनाव के सदन के अंदर पहले की तुलना में ज्यादा मजबूत हो गई है। मानसून सत्र में भाजपा के लिए अब कोई विधेयक पास कराना कठिन नहीं होगा, बल्कि बहुत आसान हो जाएगा और कांग्रेस के लिए भाजपा के विधेयकों या विधाई कार्य को रोकना लगभग असंभव जैसा हो जाएगा।
तो कुछ ही दिनों के अंतराल में संसद की तस्वीर बदल गई है। और कांग्रेस की किसी हार के कारण ऐसा हुआ हो, ऐसा भी नहीं है। अगर दक्षिण के राज्यों की बात करें तो तमिलनाडु में कांग्रेस को पांच सीटें मिली हैं। छह दशक के बाद वह पहली बार सत्ता में आई है , लेकिन वह उसकी कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है। केरल में 10 साल बाद उसकी सरकार बनी है। लेकिन उसके बावजूद उसको खतरा है कि अगर डीलिमिटेशन के नए विधेयक का विरोध किया तो केरल में उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसके अलावा तेलंगाना और तमिलनाडु में भी उसे कीमत चुकानी पड़ेगी। तमिलनाडु में सत्तारूढ़ दल टीवीके कभी नहीं चाहेगा कि तमिलनाडु की लोकसभा सीटों की संख्या कम हो। तो न चाहते हुए भी कांग्रेस को सरकार का साथ देना पड़ेगा। अब यह राजनीति की बड़ी विचित्र सी स्थिति हो गई है। जो विरोध में थे, उनको समर्थन करना पड़ रहा है। भाजपा के लिए दोनों तरफ से विन-विन सिचुएशन है। टीएमसी की टूट और तमिलनाडु में डीएमके व कांग्रेस के गठबंधन का बिखरना भाजपा के लिए बेहद फायदेमंद है। संसद में बनने वाली इस स्थिति के लिए कांग्रेस पार्टी के साथ ही ममता बनर्जी के अहंकार और तानाशाही को भी श्रेय जाता है। वह बीजेपी के विरोध में थी,यहां तक तो ठीक था। वह अब देश के भी विरोध में चली गईं हैं। हाल ही में उन्होंने दावा किया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बांग्लादेश के छात्र नेता हादी की हत्या के बाद उनको फोन किया था कि उसके हत्यारे मेघालय के जरिए पश्चिम बंगाल में घुसने की कोशिश कर रहे हैं। आप अपनी पुलिस को सजग कर दीजिए, लेकिन यह बात बाहर नहीं जानी चाहिए क्योंकि यह देश का मामला है। सवाल है कि अगर केंद्रीय गृह मंत्री ने देश का वास्ता देकर ये सूचना उनको दी तो उसको सार्वजनिक करके वह किसका हित साध रही हैं। अब उनका यह बयान बांग्लादेश के टेलीविजन चैनल्स पर चल रहा है कि हादी की हत्या में भारत की भूमिका थी। ममता बनर्जी के खिलाफ इस बयान के बाद एफआईआर दर्ज हो गई है।
तो संसद के मानसून सत्र का इंतजार कीजिए। उसमें दोनों सदनों की तस्वीर बदली-बदली नजर आएगी। देखना यह होगा कि इंडी अलायंस के कितने दल साथ रहते हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)












