लियाकत अली से पैक्ट न करते तो पहला ही चुनाव हार जाते नेहरू।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
जवाहरलाल नेहरू ने अंतरिम प्रधानमंत्री बनने के बाद एक आशियाना बनाया। उस आशियाने का आधार था मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति। उनको मालूम था कि सत्ता में लंबे समय तक बने रहना है तो मुस्लिम तुष्टीकरण की जरूरत है। इसी नीति को इंदिरा गांधी,राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने आगे बढ़ाया,लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके इस आशियाने को उजाड़ दिया।
देश का विभाजन हिंदू मुसलमान के नाम पर हुआ। विभाजन के लिए जिन मुसलमानों ने मुस्लिम लीग के पक्ष में वोट दिया,उनमें से ज्यादातर भारत छोड़कर पाकिस्तान नहीं गए। डॉ. अंबेडकर और सरदार पटेल का कहना था कि मजहब के आधार पर देश का बंटवारा हुआ है तो आबादी का भी आदान-प्रदान होना चाहिए,लेकिन नेहरू और गांधी जी ने इसे मानने से इनकार कर दिया। नेहरू को यह सूट करता था, लेकिन देश में माहौल बिगड़ रहा था। गांधी जी की हत्या के बाद नेहरू के प्रति नाराजगी बढ़ रही थी। खासतौर से हिंदुओं की, मुसलमानों की क्यों बढ़ती? तो नेहरू ने उस नाराजगी से बचने के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली के साथ एक पैक्ट किया। इसे नेहरू-लियाकत पैक्ट या दिल्ली माइनॉरिटीज पैक्ट के रूप में जाना जाता है। इस संधि की खास बातें थीं कि दोनों देशों में जो भी शरणार्थी आए हैं, उनको यह सुविधा दी जाएगी कि वे जहां से आए हैं वहां जाकर अपनी संपत्ति बेच सकें। दूसरी बात हिंदुओं की जिस संपत्ति को पाकिस्तान में कब्जा किया गया है,उसे छोड़ना होगा साथ ही जिन महिलाओं को अपहरण किया गया है,उन्हें भी छोड़ना होगा। इतना ही नहीं पाकिस्तान में हिंदुओं का जो जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया है, उसको अमान्य कर दिया जाएगा और दोनों देश इस तरह के कानून बनाएंगे ताकि वहां अल्पसंख्यकों की रक्षा हो सके। अब ये पैक्ट तो हो गया लेकिन यह सिर्फ नेहरू के लिए था क्योंकि पाकिस्तान ने जितनी शर्तें थीं, उनमें से एक भी नहीं मानीं। लेकिन नेहरू को इसके जरिए मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने का मौका मिल गया। अगर 1950 का नेहरू-लियाकत पैक्ट न होता तो 1951-52 का चुनाव जवाहरलाल नेहरू नहीं जीतते। वहां से कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति का जो सिलसिला शुरू किया वह अभी तक चल रहा था। कांग्रेस का सीधा सा गणित था मुसलमान साथ तो सत्ता हमारे पास। इसी नीति को अलग-अलग राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने भी कॉपी किया। इनमें मैं सिर्फ उड़ीसा के मुख्यमंत्री रहे नवीन पटनायक को अपवाद मानता हूं। वरना क्षेत्रीय दलों ने जितने भी सामाजिक समीकरण बनाए उसका मुख्य इंग्रेडिएंट मुस्लिम वोट था और यही कांग्रेस का वोट था। तो जैसे-जैसे क्षेत्रीय दल मजबूत होते गए कांग्रेस कमजोर होती गई। कांग्रेस का संगठन वहीं बचा रह पाया, जहां उसकी भाजपा से सीधे लड़ाई थी और मुसलमानों के पास सिवाय कांग्रेस को वोट देने के कोई विकल्प नहीं था।
यह जो सिलसिला शुरू हुआ था उसको 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने तोड़ दिया। मुस्लिम वोटों पर निर्भरता की राजनीति करने वालों को उन्होंने बता दिया कि वह दिन चले गए। मुसलमान को 90% या 100% जुटा लो, उसके आधार पर सत्ता नहीं मिलेगी। उन्होंने मुस्लिम वोट का वीटो खत्म कर दिया, लेकिन केवल उससे बात नहीं बनने वाली थी। मुस्लिम वोट का वीटो खत्म करने के लिए जरूरी था हिंदू वोट का वीटो तैयार हो। पिछले 12 सालों में नरेंद्र मोदी ने उसे तैयार किया और उसका जीता जागता प्रमाण पश्चिम बंगाल और असम विधानसभा के चुनावों में दिखा। असम में 40% आबादी मुसलमानों की होने के बावजूद भाजपा ने कांग्रेस पर बड़ी जीत हासिल की। पश्चिम बंगाल में 30% से ज्यादा आबादी मुसलमानों की होने पर भी भाजपा ने 15 साल से सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस की सरकार को उखाड़ फेंका जबकि इन दोनों राज्यों में मुसलमानों का पूरा वोट कांग्रेस और टीएमसी को गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि अब हिंदू वोट का वीटो तैयार हो चुका था। दोनों राज्यों में सेकुलर हिंदुओं का जो खेमा बना हुआ था, वह सिकुड़ता चला गया। हिंदू को समझ में आ गया कि पॉलिटिकल वोटिंग क्या होती है? बचना किससे है और बचाना किसको है? दोनों राज्यों में मुसलमानों को यह संदेश चला गया कि कितना भी एकजुट हो जाओ, 100% से ज्यादा तो एकजुट नहीं हो सकते तब भी कुछ नहीं मिलने वाला। बीजेपी को तब भी रोक नहीं पाओगे। नतीजा यह हुआ कि असम में कांग्रेस के जो 19 विधायक जीतकर आए हैं, उनमें से 18 मुसलमान हैं। इसी तरह पश्चिम बंगाल में टीएमसी के जो 80 विधायक जीते, उनमें 24 से ज्यादा मुसलमान हैं। तो पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और असम में कांग्रेस पार्टी मुसलमानों की पार्टी बन गईं। मुसलमानों के वोट के भरोसे राजनीति करने वाली आरजेडी बिहार से खत्म हो गई। अब अगली बारी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की है। उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के वोट के भरोसे ही अखिलेश यादव की राजनीति टिकी हुई है। हालांकि मुसलमान दो बार उनकी पार्टी बल्कि कहें उनके पिता को झटका दे चुका है। पहली बार जब जनता दल बना तो मुसलमान मुलायम सिंह यादव से ज्यादा वीपी सिंह के साथ गया। मुलायम सिंह यादव को मुसलमानों ने दूसरा बड़ा झटका 2009 के लोकसभा चुनाव में दिया। मुस्लिम मतदाताओं का एक बहुत बड़ा वर्ग कांग्रेस के साथ चला गया। कांग्रेस की 22 सीटें आ गईं। वह फिर कभी इतनी सीटें नहीं जीत पाई। और किस लिए? सिर्फ इसलिए कि मुलायम सिंह यादव ने कल्याण सिंह को साथ ले लिया था। तो यह ताकत थी मुस्लिम वोट की कि वह मुलायम सिंह यादव जिन्होंने मुस्लिम वोटों के लिए अयोध्या में निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलवाई, उनको भी छोड़ने में कोई संकोच नहीं हुआ।
मुस्लिम वोट का वीटो तभी तक चल सकता था, जब हिंदू बंटा हुआ था। हिंदू जैसे ही एक हुआ मुस्लिम वोट का वीटो कहां गया किसी को पता नहीं चल रहा है। अब मुस्लिम वोट की राजनीति करने वाली पार्टियों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। मुसलमानों को जुटाते हैं तो काउंटर पोलराइजेशन होता है और नहीं जुटाते हैं तो फिर जो कोर वोट है, उसमें कमी आती है। दोनों हाल में हारना है। पश्चिम बंगाल के चुनाव का नतीजा पूरे देश की राजनीति को बदलने वाला है। अगले साल सात राज्यों में चुनाव है। इन राज्यों में भी मुस्लिम परस्त राजनीति करने वालों को बड़ा झटका लगने वाला है। तो यह जो नेहरू ने सनातन धर्म के विरोध में मुस्लिम तुष्टीकरण का सिलसिला शुरू किया था, इसको इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और उसके बाद सोनिया गांधी व मनमोहन सिंह की सरकार ने और ताकत दी। राहुल गांधी तो उन सबसे आगे निकल गए हैं। बस उन्होंने कलमा नहीं पढ़ा और सब कुछ कर लिया है, लेकिन उनको यह समझ में नहीं आ रहा है कि जनता क्या बोल रही है। जो परिवर्तन जमीन पर हो रहा है वह उनको दिखाई ही नहीं दे रहा है कि भाई देश बदल गया है। यह 1950 या 2004 या 2009 का भारत नहीं है। यह 2026 का भारत है, जिसकी शुरुआत 2014 से हुई। तो जो लोग मुस्लिम परस्त राजनीति कर रहे थे, उनके सामने दो ही विकल्प हैं या तो रास्ता बदल लें या राजनीति छोड़ दें। अब फैसला उनको करना है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)