संसद में शक्ति बढ़ाने में जुटी भाजपा, टूट सकते हैं कई दलों के सांसद।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
तृणमूल कांग्रेस विधायक दल में टूट हो चुकी है जबकि संसदीय दल में उसकी औपचारिक घोषणा होना बाकी है। बागियों की नेता काकोली घोष दस्तीदार का दावा है कि उनके साथ 21 सांसद हैं। दूसरी ओर ममता बनर्जी ग्रुप दावा कर रहा है कि भूपेंद्र यादव के यहां जो सांसद गए थे उनकी संख्या 13-14 से ज्यादा नहीं थी। काकोली घोष दस्तीदार 1996 से ममता बनर्जी के साथ थीं। जब सीपीएम के गुंडों ने ममता पर हमला किया और पश्चिम बंगाल में कोई अस्पताल उनको भर्ती करने को तैयार नहीं था तब काकोली घोष दस्तीदार के पति ने अपने अस्पताल में उनका इलाज किया। आज वह ममता बनर्जी के खिलाफ खड़ी हैं। उनका कहना है कि दीदी बदल गई थीं। अब देखिए ममता बनर्जी के समर्थन में सबसे मुखर कौन है? कीर्ति आजाद। पार्टी में आए उन्हें अभी जुमा जुमा चार दिन हुए हैं। उनकी समस्या यह भी है कि अगर न बोले तो क्या करें? उनकी राजनीतिक यात्रा भाजपा से शुरू हुई थी। बाद में वह कांग्रेस में चले गए। वहां भी टिक नहीं पाए तो तृणमूल कांग्रेस के साथ हो लिए। अब उनके लिए भाजपा और कांग्रेस के दरवाजे बंद हैं। तो जो ममता के पुराने साथी रहे,वे साथ छोड़ रहे हैं और जिनके पास कहीं ठिकाना नहीं,सिर्फ वे ही साथ खड़े हैं। हालांकि कीर्ति आजाद इस पूरे घटनाक्रम में न तो कोई बड़े प्लेयर हैं और न महत्वपूर्ण हैं। बात यह है कि बीजेपी ने कबूतरों के बाड़े में बिल्ली छोड़ दी है। तो आप देख रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस कैसे टूट रही है।
जब ऐसी घटना होती है तो डर दूसरे लोगों को लगता है। पश्चिम बंगाल में भाजपा को विधायकों की जरूरत नहीं है। इसलिए टीएमसी के यह 59 बागी विधायक भाजपा में नहीं आने वाले। टूटने वाले सांसदों को भी भाजपा पार्टी में शामिल करेगी,इसकी उम्मीद कम है। वे अलग गुट के रूप में रहेंगे और एनडीए का सहयोग करेंगे। लेकिन टीएमसी के जो राज्यसभा सदस्य हैं, उनमें से कई लोग इस्तीफा देकर भाजपा में आ सकते हैं। उसकी शुरुआत सुखेंदु शेखर रॉय ने कर भी दी है। संसद में अपनी शक्ति बढ़ाना भाजपा का लक्ष्य है। वह इस अभियान में लगी हुई है। टीएमसी संसदीय दल में टूट उसका पहला कदम है। उससे पहले आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्य भाजपा में शामिल हो चुके हैं। उड़ीसा से भी बीजेडी के एक राज्यसभा सदस्य इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए। इस तरह के सदस्यों की संख्या आने वाले दिनों में बढ़ने वाली है। भाजपा ने मध्य प्रदेश और झारखंड में अतिरिक्त उम्मीदवार खड़ा करके कांग्रेस के लिए संकट पैदा कर दिया है। मध्य प्रदेश में राज्यसभा की एक सीट जीतने लायक कांग्रेस के पास पर्याप्त सदस्य हैं फिर भी वह डरी हुई है। पार्टी ने अपने विधायकों को दूसरे प्रदेश में, जहां उसकी सरकार है, भेजने का फैसला किया है। तो कांग्रेस और दूसरे दलों के अंदर भगदड़ मची हुई है। अब उद्धव ठाकरे की पार्टी पर भी खतरा मंडरा रहा है। उनकी पार्टी के नौ लोकसभा सदस्य हैं। ये नौ सांसद कब तक उनके साथ रहेंगे,कहा नहीं जा सकता। इनमें से अगर छह भी टूटते हैं तो दो तिहाई हो जाते हैं। वे भाजपा ज्वाइन कर सकते हैं। इसी तरह शरद पवार की पार्टी के आठ लोकसभा सदस्य हैं। वहां भी पूरा परिवार और पार्टी दोनों बिखर चुके हैं। शरद पवार के बस में अब कुछ नहीं है। वे भी अपने आठ सांसदों को रोक पाएंगे, इसमें भारी शंका है। उसकी वजह यह नहीं है कि उनकी पार्टी कमजोर हो गई है या विधानसभा चुनाव हार गई है। उसकी वजह सिर्फ यह है कि इन सांसदों को लग रहा है कि 2029 का लोकसभा चुनाव शरद पवार या उद्धव ठाकरे की पार्टी के चुनाव चिह्न पर नहीं जीत सकते। अगर हमें भविष्य की राजनीति करनी है तो दूसरा ठिकाना तलाशना होगा और महाराष्ट्र में उसके लिए भाजपा के अलावा कोई घर नहीं है। तो भाजपा और इन सांसदों दोनों के हित मिलते हैं। भाजपा के इस समय लोकसभा में 240 सदस्य हैं। अब अगर टीएमसी के 20 सदस्य अलग होकर नया गुट बनाते हैं और सपोर्ट करते हैं तो एनडीए के सदस्यों की संख्या 20 बढ़ जाएगी। साथ ही उद्धव और शरद पवार की पार्टी के 17 सदस्यों में से दो तिहाई साथ आ जाते हैं तो भाजपा बहुमत के करीब पहुंच जाएगी।
तृणमूल कांग्रेस के सांसदों को यह बात समझ में आ गई है कि ममता बनर्जी के साथ उनका कोई राजनीतिक भविष्य नहीं है। जिस तरह से पश्चिम बंगाल की जनता ममता और उनके भतीजे के खिलाफ है और जिस तरह के घोटाले सामने आ रहे हैं, उसके बाद पश्चिम बंगाल में जिसको राजनीति करनी है उसके लिए एक ही रास्ता है कि भाजपा में शामिल हो जाए या उसका सहयोगी बन जाए। तो यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है। मानसून सत्र और उसके बाद शीतकालीन सत्र का इंतजार कीजिए, संसद की पूरी तस्वीर आपको बदली हुई नजर आएगी। ढाई साल में भाजपा 240 से 272 तक पहुंच जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। और उस सरकार के बारे में राहुल गांधी का कहना है कि एक साल में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे। इससे आप समझ सकते हैं कि राहुल गांधी किस दुनिया में रह रहे हैं। उनको सोचना चाहिए कि एक राज्यसभा सीट जिताने के लिए मध्य प्रदेश में उनके पास पर्याप्त विधायक हैं फिर भी क्यों डरे हुए हैं। आरोप लगाए जाते हैं कि बीजेपी खरीद-फरोख्त करती है, सवाल यह है कि कांग्रेस के लोग ही क्यों बिकते हैं? किसी और पार्टी सीपीएम या डीएमके का कोई विधायक या सांसद क्यों नहीं बिका? भाजपा जब सत्ता से बाहर थी तब उसका विधायक या सांसद क्यों नहीं बिका? कांग्रेस को यह सवाल अपने आप से पूछना चाहिए कि राज्यसभा के हर द्विवार्षिक चुनाव में खतरा उसी पर ही क्यों आता है? अगर वह इन सवालों का गंभीरता से जवाब नहीं ढूंढेगी तो उसकी समस्या आने वाले दिनों में बढ़ने वाली है।
तो एक तरफ कमजोर होता हुआ विपक्ष है और दूसरी तरफ आक्रामक होती हुई भारतीय जनता पार्टी है। कांग्रेस और पूरे विपक्ष को बहुत उम्मीद थी कि खाड़ी में युद्ध के कारण तेल और गैस समेत जो दूसरे संकट है, उनकी वजह से भाजपा बहुत ज्यादा अलोकप्रिय हो जाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ लोग सड़कों पर उतर आएंगे। पता चला कि सड़क पर जो लोग उतर रहे हैं और जो घर से निकल रहे हैं वे वोट भाजपा को ही दे रहे हैं। इसीलिए लोकसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार, जम्मू, दिल्ली, पश्चिम बंगाल और असम के विधानसभा चुनावों में भाजपा की प्रचंड जीत हुई। तमिलनाडु और केरल की बात मैं इसलिए नहीं कर रहा हूं क्योंकि वहां भाजपा का कोई जनाधार नहीं था। कांग्रेस तमिलनाडु में जिस गठबंधन के साथ थी, वह चुनाव हार गया। एक नई पार्टी जीती है। तो जो जीत गया कांग्रेस उधर कूद गई। केरल एकमात्र राज्य है, जहां कांग्रेस पार्टी को जीत मिली है। तो ऐसे भाजपा विरोधी दलों को सावधान होने की जरूरत है क्योंकि उनकी स्थिति उस कबूतर की तरह हो गई है, जिसके बाड़े में बिल्ली घुस आई है। भाजपा लोकसभा और राज्यसभा दोनों में अपनी शक्ति बढ़ाने के अभियान में जुटी हुई है। कौन-कौन इसका शिकार होगा,कौन-कौन भाजपा या एनडीए के खेमे में आ जाएगा, आज यह कहना मुश्किल है। मुझे लगता है कि इस सारी प्रक्रिया में चार से छह महीने का समय लगेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)