राहुल को नेता मानने को विपक्षी दल तैयार नहीं ।
प्रदीप सिंह।देश का मतदाता वंशवाद की राजनीति पर लगातार प्रहार कर रहा है। ऐसे में वंशवादी राजनीति के जो भी नेता हैं, उनकी नई कोशिश है कि सारे वंशवादी एक हो जाएं। उन्हें लगता है कि मिलकर शायद वे अपना अस्तित्व बचा सकें।
हाल ही में वंशवाद की राजनीति को सबसे गहरी चोट पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में लगी है। इस राजनीति का सबसे पहले सफाया हरियाणा और पंजाब में शुरू हुआ। पंजाब में अकाली दल का अब राजनीतिक रूप से कोई प्रभाव नहीं रह गया है। इसी तरह से हरियाणा में तीन लाल बंसीलाल, देवीलाल और भजनलाल के परिवारों का राजनीति से सफाया हो चुका है। बिहार में लालू प्रसाद यादव का परिवार राजनीतिक हाशिए पर जा चुका है। तेजस्वी यादव किसी तरह से 25 सीटें लेकर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बन पाए हैं, अगले चुनाव में वह भी रह पाएंगे यह कहना मुश्किल है। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की पार्टी में क्रमिक गिरावट आ रही है। हालांकि समाजवादी पार्टी अभी लोकसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी और उत्तर प्रदेश में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन अखिलेश यादव के नेतृत्व में लड़े गए पिछले पांच चुनाव में से सपा चार में हार चुकी है। पांचवें में जरूर उन्होंने भाजपा से बेहतर किया है। अब उनकी सारी उम्मीद इसी पर टिकी हुई है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने जैसा प्रदर्शन किया, उसे 2027 के विधानसभा चुनाव में दोहरा सकें। जिसके मुझे तो कोई आसार नजर नहीं आते। इसी तरह से पश्चिम बंगाल में बुआ-भतीजे का खेल खत्म हो चुका है। खंड खंड हो रही तृणमूल कांग्रेस बचेगी भी इस बारे में बताना मुश्किल है। तमिलनाडु में भी पिता-पुत्र की जो सनातन विरोधी राजनीति थी उसका क्या हाल हुआ,यह सबने देखा। सनातन धर्म का समूल नाश करने की बात करने वाले उदयनिधि स्टालिन और एमके स्टालिन की द्रविड़ राजनीति का समूल नाश होने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। सनातन विरोध में ममता बनर्जी भी बहुत आगे निकल चुकी थीं। जिस तरह से वह मुस्लिम तुष्टीकरण कर रही थीं। भारतीय लोगों के बजाय उनके लिए बांग्लादेशी ज्यादा प्रिय हो गए थे, उसका नतीजा यह हुआ कि पहले उनकी सत्ता गई और अब उनकी पार्टी जा रही है। 80 में से 60 विधायक और 28 में से 20 सांसद अलग हो चुके हैं। इस सारे घटनाक्रम के बीच दो और वंशवादी पार्टियों के नेता डरे हुए हैं। उद्धव ठाकरे को डर है कि उनके सांसद और विधायक अब फिर से टूट सकते हैं। पार्टी, सिंबल और झंडा पहले ही उनके हाथ से चला गया था। इसी तरह शरद पवार के हाथ से पार्टी और झंडा चला गया, अब जो बचा है उसमें भी टूट की आशंका है। दोनों पार्टियां कब टूट जाएंगी उनको मालूम नहीं है।

ऐसे में हाल ही में हुई इंडी गठबंधन की बैठक में राहुल गांधी ने सभी विपक्षी दलों से कहा कि सबको एक हो जाना चाहिए। हालांकि कोई मिलने को तैयार नहीं है। तृणमूल कांग्रेस और एनसीपी शरद पवार दरअसल ये दोनों कांग्रेस से निकली हुई पार्टियां हैं,बात हो रही है कि इन दोनों का मर्जर कांग्रेस पार्टी में हो जाए। आंध्र प्रदेश में जगमोहन रेड्डी की वाईएसआर कांग्रेस भी कांग्रेस से निकली है। कांग्रेस की नजर उस पर भी है। कांग्रेस का आंध्र प्रदेश में कोई जनाधार बचा नहीं है। जगन मोहन रेड्डी पिछला चुनाव बुरी तरह से हार चुके हैं फिर भी लगता नहीं है कि जगन मोहन कांग्रेस में मर्जर करेंगे। जगन मोहन रेड्डी कैसे भूल जाएंगे कि उनके पिता की मृत्यु के बाद वह एक यात्रा निकालना चाहते थे, लेकिन सोनिया गांधी ने इजाजत नहीं दी थी। इसके बाद जगन मोहन ने कांग्रेस छोड़ दी और अलग पार्टी बनाई। कांग्रेस पार्टी के ही शासन में जगन मोहन रेड्डी के खिलाफ सीबीआई और ईडी का केस हुआ ,जो अभी तक चल रहा है। सवाल यह भी है कि अगर वह कांग्रेस के साथ जाना भी चाहें तो कांग्रेस के पास आंध्र प्रदेश में उनको देने के लिए है क्या? कुछ भी नहीं है। वही स्थिति पश्चिम बंगाल में है। वहां भी कांग्रेस के पास तृणमूल कांग्रेस को देने के लिए कुछ नहीं है। लेकिन ममता बनर्जी को इस समय वोट या जनाधार नहीं चाहिए। उनको अपने लिए राजनीतिक जमीन चाहिए, जहां वह खड़ी हो सकें। जहां से वह अपनी राजनीति को फिर से पुनर्जीवित करने की कोशिश कर सकें या वास्तव में कहें तो अपने को पॉलिटिकली रेलेवेंट बनाए रख सके। ऐसे में ममता बनर्जी को आज कांग्रेस की ज्यादा जरूरत है। कांग्रेस के लिए ममता बनर्जी की कोई बड़ी उपयोगिता नहीं है सिवाय इसके कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का जो बचा खुचा जनाधार है, अगर मर्जर हो जाता है तो कांग्रेस पार्टी का एक जनाधार हो जाएगा। कुल मिलाकर वहां आज हालत यह है कि दो भिखमंगे कह रहे हैं कि मिलकर भीख मांगें तो ज्यादा मिलेगी। तो वंशवादी पार्टियों की एका की जो कोशिश हो रही है,यह दरअसल वंशवाद की राजनीति के ढहते हुए किले को बचाने की कोशिश है। इन वंशवादी नेताओं के सिरमौर राहुल गांधी हैं,जो अभी तक सेंस ऑफ एंटाइटलमेंट से बाहर निकल ही नहीं पाए हैं।

इंडी गठबंधन की बैठक में उन्होंने कहा कि हम 2029 का चुनाव जीत चुके हैं। अब इसे आप क्या कहेंगे? अहंकार का स्तर जब ऐसा हो कि आप एक के बाद एक राज्य हारते जा रहे हैं। ऐसे में यह उम्मीद करना कि हम 2029 का चुनाव जीत जाएंगे, यह बंद कमरे में भी बोलने में किसी समझदार व्यक्ति को शर्म आएगी।
अब नई घोषणा हुई है कि राहुल गांधी छात्रों के समर्थन में आंदोलन करेंगे। इसकी शुरुआत कोटा से होने जा रही है। 19 जून को पहला कार्यक्रम होना है। सवाल यह नहीं है कि राहुल गांधी क्या करेंगे? जो भी विपक्षी दल है,सत्तारूढ़ दल के प्रति जो नाराजगी है उसका लाभ उठाने की कोशिश करता ही है। सवाल इस बात का है कि कांग्रेस के पास कोई जनाधार बचा है जिसको लेकर वह सत्तारूढ़ दल से लड़ सके। उससे बड़ी बात ये सब आंदोलन तब सफल होते हैं, जब आंदोलन चलाने वाले नेता की विश्वसनीयता हो। लोग सड़क पर निकलकर उसका साथ देने के लिए तैयार हों। राहुल गांधी की नेता के रूप में कोई विश्वसनीयता नहीं है। राहुल गांधी के मुद्दों पर उनकी पार्टी और उनके सहयोगी दलों के नेता ही सहमत नहीं होते हैं। जनता उन पर 12 साल बाद भी भरोसा करने के लिए तैयार नहीं है। जो लोग मोदी से नाराज हैं, वे भी विपक्ष और राहुल गांधी पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसे में जब जनता का ही साथ न हो तो आप कौन सा आंदोलन चला सकते हैं? आपने सोशल मीडिया पर बनी कॉकरोच जनता पार्टी का हश्र देख ही लिया। सोशल मीडिया पर उसके सवा दो करोड़ फॉलोअर हैं, लेकिन सवा दो हजार भी उसके समर्थन में सड़क पर आने को तैयार नहीं हुए क्योंकि उसकी कोई विश्वसनीयता नहीं है। यह सब राहुल गांधी क्या पूरे विपक्ष को दिखाई नहीं दे रहा है।
ऐसे में वंशवादियों का एकता का जो सपना है, मुझे लगता नहीं कि वह साकार होने वाला है क्योंकि सबके अपने-अपने वेस्टेड इंटरेस्ट हैं। सबने अपनी जो संपत्तियां खड़ी की हैं, उस पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं है। दूसरी बात किसके पास क्या है, उसका बंटवारा कैसे हो? किसको क्या मिले,यह कैसे तय हो? आज ममता बनर्जी चाहती हैं कि कांग्रेस उनको राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष बना दे। सवाल है कि कांग्रेस क्यों बनाएगी? ममता बनर्जी की अपेक्षा कुछ भी हो, कांग्रेस उसको पूरा करने की स्थिति में नहीं है। कांग्रेस सिर्फ इतना चाहती है कि सभी विपक्षी दल राहुल गांधी को नेता मान लें। सब मिलकर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए मेहनत करें। लेकिन यहां तो प्रधानमंत्री पद के कई दावेदार हैं, वे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री क्यों मान लेंगे? तो कांग्रेस की ये उम्मीद इस परिस्थिति में भी पूरी होती हुई दिखाई नहीं दे रही है। एकता की बातें सिर्फ यह दिखाने के लिए हो रही हैं कि हम ताकतवर हो रहे हैं। यह इसलिए दिखाना पड़ रहा है कि वास्तव में विपक्षी दल बहुत कमजोर हो चुके हैं। अकेले-अकेले लड़कर देख लिया कि जीत नहीं सकते। अब दिमाग में है कि सब मिल जाएं तो शायद हरा दें। वह भी होने वाला नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)










