भ्रष्टाचारियों पर शिकंजा कसने वाला कानून आ रहा।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
संसद का मानसून सत्र इसी महीने शुरू हो रहा है। पिछले 12 सालों में किसी और सत्र के बारे में शायद ही इतनी चर्चा हुई हो, जितनी इस मानसून सत्र की हो रही है। उसकी वजह है कि सरकार दो तिहाई बहुमत जुटाने के लिए सारे प्रयास कर रही है। पार्टियां टूट रही हैं। अलग-अलग गुटों में बंट रही हैं। वे किसी भी पार्टी में जा रही हों, सब एनडीए का समर्थन कर रही हैं। इससे माना जा रहा है कि सरकार लोकसभा और राज्यसभा दोनों में दो तिहाई बहुमत के करीब पहुंच चुकी है और अब उसे संविधान संशोधन विधेयकों को पास कराने में मुश्किलें पेश नहीं आएंगी।
संसद के पिछले विशेष सत्र में सरकार के पास दो तिहाई बहुमत नहीं था, जिसके कारण महिला आरक्षण संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में गिर गया था। संसद के मानसून सत्र की चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि सरकार चाहती है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का कानून बन जाए। इसके अलावा दूसरा काम डीलिमिटेशन का होना है। पिछली बार महिला आरक्षण संशोधन विधेयक के साथ ही डीलिमिटेशन का भी विधेयक आया था। उस पर भी सहमति नहीं बनी तो सरकार ने उसको पेश ही नहीं किया। उसका सबसे ज्यादा विरोध कांग्रेस और दक्षिण के दलों विशेषकर डीएमके ने किया था। सवाल यह है कि अब डीएमके का रुख क्या होगा? अब सीटों की संख्या बढ़ने जा रही है। 1/3 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होने जा रही हैं तो लोकसभा की लगभग 850 सीटें हो जाएंगी। राज्यों में भी सीटें बढ़ेंगी। पिछले बिल के समय ही सरकार ने दक्षिण के राज्यों को  मौखिक आश्वासन दिया था कि सभी राज्यों की लोकसभा सीटें 50% बढ़ाई जाएंगी, लेकिन दक्षिण के राज्यों खासतौर से डीएमके को एतराज था कि बिल में तो ऐसा कुछ लिखा नहीं है। केवल मौखिक आश्वासन के आधार पर हम इसका समर्थन नहीं कर सकते। अब सरकार जो संशोधित विधेयक लेकर आएगी तो उसमें यह लिखित रूप से होगा। भाजपा डीएमके से बात भी कर रही है। डीएमके और कांग्रेस का नाता टूट चुका है। माना जा रहा है कि अब कांग्रेस जो भी कहेगी डीएमके उसके विरोध में होगी। तो डीएमके का समर्थन भाजपा को मिल सकता है। दो परिस्थितियां हैं। या तो डीएमके इस बिल का सपोर्ट करेगी या कम से कम भाजपा की मदद के लिए अबस्टेन करेगी। तो ऐसे में तृणमूल कांग्रेस का टूटना, उद्धव ठाकरे की पार्टी के सांसदों का टूटना और इस तरह की जो अन्य टूटफूट हो रही है एवं उसके बाद एनडीए की जो संख्या बढ़ रही है उससे इस बात की संभावना बहुत ज्यादा बढ़ गई है कि सारे संविधान संशोधन विधेयक जो भी मानसून सत्र में पेश होंगे, वे पास हो जाएंगे। लेकिन एक संविधान संशोधन विधेयक की चर्चा नहीं हो रही है। वह है 130वां संविधान संशोधन विधेयक। यह विधेयक पहले भी आया था लेकिन फिर इसको जेपीसी को भेज दिया गया था। अब उम्मीद की जा रही है कि 20 जुलाई से पहले जेपीसी इस पर अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप देगी। तो इस बिल में है क्या? वैसे आपको इस बिल के लिए अरविंद केजरीवाल को धन्यवाद देना चाहिए।
संविधान जब बन रहा था तो संविधान निर्माताओं को यह कल्पना भी नहीं थी कि कोई मंत्री,मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री पद पर बैठा व्यक्ति किसी गंभीर आरोप में जेल जाएगा और वह अपने पद से इस्तीफा देने से मना कर देगा। अरविंद केजरीवाल जब शराब घोटाले में जेल गए तो उन्होंने इस्तीफा देने से मना कर दिया। कहा कि मैं जेल से सरकार चलाऊंगा। अब जेल से सरकार चलाने का तो संविधान में कोई प्रावधान है नहीं, लेकिन जेल जाने पर मुख्यमंत्री या मंत्री को इस्तीफा देना पड़ेगा, इसका भी प्रावधान नहीं था। तो सुप्रीम कोर्ट ने हाथ खड़े कर दिए कि हम कुछ नहीं कर सकते। अरविंद केजरीवाल ने जेल से सरकार चलाने की असफल कोशिश भी की। उसके अलावा डीएमके के मंत्री थे सेंथिल बालाजी। वे भी जेल गए। उन्होंने भी इस्तीफा देने से मना कर दिया। बाद में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी आई, उसके बाद उनका इस्तीफा हुआ। तो सरकार के सामने समस्या थी कि अगर कोई मंत्री, मुख्यमंत्री जेल चला जाए तो क्या उसे पद पर बने रहने देना चाहिए? तो सरकार एक विधेयक लेकर आई कि कानून बना देते हैं कि जो भी मंत्री, मुख्यमंत्री और यहां तक कि प्रधानमंत्री भी अगर किसी गंभीर अपराध के आरोप में, जिसमें कम से कम 5 साल की सजा का प्रावधान हो, जेल जाता है और लगातार 30 दिन तक जेल में रहता है तो उसका पद स्वतः रिक्त हो जाएगा। उसको उससे इस्तीफा मांगने या उसको इस्तीफा देने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। ऑटोमेटिकली वह पद रिक्त माना जाएगा। चूंकि केंद्र सरकार ने इस प्रस्तावित कानून में प्रधानमंत्री का पद भी शामिल कर लिया तो विपक्ष के पास बोलने का ज्यादा मौका नहीं था, लेकिन फिर भी विपक्ष ने कहा कि यह प्राकृतिक न्याय के खिलाफ और असंवैधानिक है। तो असंवैधानिक है या नहीं इसका फैसला तो केवल सुप्रीम कोर्ट कर सकता है। जब यह विधेयक कानून बनेगा और इसको सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी तब सुप्रीम कोर्ट बताएगा कि यह संविधान सम्मत है या नहीं। तो वह मामला बाद का है। अभी कानून बनने का मतलब है कि सारे भ्रष्टाचारियों के लिए खतरे की घंटी बज गई है। खासतौर से जो भ्रष्टाचार के आरोपी मंत्री और मुख्यमंत्री हैं। अगर वह लगातार 30 दिन जेल में रहते हैं तो वह जिस पद पर हैं वह पद स्वतः रिक्त मान लिया जाएगा। तो अब कोई नया अरविंद केजरीवाल नया सेंथिल बालाजी पैदा नहीं होगा। जो बात संविधान निर्माताओं ने विवेक पर या नेताओं की नैतिकता पर छोड़ दी थी, उस पर अब कानून बनने जा रहा है और पूरी उम्मीद है कि इस मानसून सत्र में यह पास हो जाएगा। यह भी संविधान संशोधन विधेयक है। इसके लिए भी दो तिहाई बहुमत की जरूरत होगी। अब आप समझ लीजिए कि विपक्षी दल इन भ्रष्टाचारियों को क्यों बचाना चाहते हैं? या तो उन्होंने मान लिया है कि भ्रष्टाचार के आरोप में केवल विपक्षी नेता ही जेल जाएंगे या उन्होंने  मान लिया है कि सदा सर्वदा के लिए भाजपा ही सत्ता में रहेगी। यह दोनों स्थितियां संभव नहीं हैं। कोई भी पार्टी हमेशा सत्ता में नहीं रह सकती। सत्ता में परिवर्तन तो होगा ही। लेकिन वह परिवर्तन कब होगा, यह इस देश की जनता तय करेगी।
तो संसद का मानसून सत्र देश में बहुत बड़े-बड़े परिवर्तनों को सामने लाने वाला है। ये जो तीन मुद्दों की मैंने बात की, इनके कानून बनने के बाद विपक्ष के लिए राजनीतिक मुद्दों का और अकाल होने जा रहा है क्योंकि एक बार डीलिमिटेशन की प्रक्रिया शुरू हो गई और महिलाओं के आरक्षण की व्यवस्था हो गई तो भारतीय जनता पार्टी का पक्ष और मजबूत हो जाएगा। इसी से विपक्ष डरा हुआ है। विपक्ष जानता है कि यह होना है लेकिन वह चाहता है कि जितना टल सके, टाला जाए। कम से कम 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले यह कानून न बनने पाए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)