कोयला घोटाला उजागर करने वालों को प्रताड़ित किया ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
एक बहुत ही गलत तुलना कर रहा हूं। हम लोग बोलते हैं हरि अनंत हरि कथा अनंता। यानि भगवान के बारे में कहते हैं कि उनको जानना, उनको समझना, उनके विराट स्वरूप को समझना कठिन है। लेकिन एक नेगेटिव सेंस में इसकी तुलना अगर की जाए तो कांग्रेस पार्टी के भ्रष्टाचार की कथा भी अनंत है। उसको समझना बड़ा मुश्किल है। जब लगता है कि कांग्रेस पार्टी के भ्रष्टाचार की सारी कथाएं सामने आ गई हैं, तब कुछ नया सामने आ जाता है।
यूपीए की सरकार के प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह अब इस दुनिया में नहीं हैं। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे। उनकी बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी कि अर्थशास्त्र का जैसा ज्ञान उनके पास था और किसी के पास नहीं है। कम से कम राजनेताओं में तो नहीं है। इसीलिए उनको पहले वित्त मंत्री बनाया गया था और उसके बाद सोनिया गांधी ने उनको प्रधानमंत्री बनवाया। पूरे देश में उनकी छवि बनाई गई कि वे बहुत ईमानदार व्यक्ति हैं। हालांकि मनमोहन सिंह के 10 साल के प्रधानमंत्रित्व काल में इस देश में जितना भ्रष्टाचार हुआ, वह अभूतपूर्व है। उतने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार उससे पहले कभी नहीं हुआ था।
हाल ही में एक नई किताब आई है। किताब के लेखक हैं पी शेष कुमार। वे सीएजी में डायरेक्टर जनरल ऑफ ऑडिट थे और उस टीम का हिस्सा रहे जो कोल गेट कोयला घोटाला मामले की ऑडिट कर रही थी। किताब में उन्होंने बताया कि इस घोटाले की जांच में कदम-कदम पर अवरोध पैदा किए गए। ऑडिट टीम को बाथरूम के बगल में एक छोटा सा कमरा दिया गया, जिसमें दिनभर बदबू आती रहती थी। सरकार ऑडिट टीम को फाइलें देने से मना करती रही। कोयला घोटाला 1.86 लाख करोड़ का था। यह कोई छोटा मोटा अमाउंट नहीं था। जिस समय यह घोटाला हुआ, उस समय मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री तो थे ही कोयला मंत्रालय भी उनके पास था। असली घोटाला तब सामने आया जब सरकार की पॉलिसी की फाइल ऑडिटर्स के हाथ लग गई। उसमें लॉ मिनिस्ट्री के साथ ही कोयला सचिव और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भी नोट्स थे। लॉ मिनिस्ट्री ने 2006 में ही कहा था कि कोयला खदानों का आवंटन कॉम्पिटिटिव बिडिंग के जरिए होना चाहिए लेकिन सरकार उसको टालती रही। कोयला खदानों के आवंटन के लिए स्क्रीनिंग कमेटी बनी। उसकी 200 बैठकें हुईं। इन बैठकों की फाइल सीएजी के लोग मांगते रहे लेकिन सरकार ने नहीं दी। बड़ी मुश्किल से सिर्फ दो बैठकों की फाइल सीएजी को मिलीं और उसी में उन्होंने पकड़ लिया कि कितने मनमाने तरीके से खदानों का अलॉटमेंट हुआ। दूसरी बात विंडफॉल प्रॉफिट की बात आती है। शेष कुमार ने कहा कि फाइल में कोयला सचिव का नोट है कि पारदर्शिता को छोड़कर अलॉटमेंट होगा तो कंपनियों को विंड फॉल गेन होगा। विंड फॉल गेन का मतलब है अप्रत्याशित लाभ। शेष कुमार कहते हैं कि जब हमने ऑडिट रिपोर्ट दी तो सरकार को पसंद नहीं आई। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो संसद में इसकी आलोचना भी की जबकि वे खुद रेगुलेटर रह चुके थे। आरबीआई के गवर्नर रह चुके थे। सीएजी एक संवैधानिक संस्था है। सरकारी विभाग जहां भी पैसा खर्च करते हैं, उस खर्च का ये ऑडिट करते हैं। यह मैंडेटरी है। सीएजी ऑडिट के जरिए ही कांग्रेस के बड़े-बड़े घोटाले सामने आए हैं। चाहे वह बोफोर्स का घोटाला हो या 2जी स्कैम। शेष कुमार ने कहा कि ऑडिट के दौरान हमको हर तरह से परेशान करने की कोशिश हुई। ऑडिट रिपोर्ट देने के बाद प्रधानमंत्री ने संसद में तो इसकी आलोचना की ही तमाम मंत्रियों ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इसकी आलोचना की। इसको रोकने की कोशिश हुई। लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और सुप्रीम कोर्ट ने सारे आवंटन रद्द कर दिए।
भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि सरकार के लिए गए पूरे फैसले और अलॉटमेंट को पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट रद्द कर दिया। लेकिन मनमोहन सिंह उसके बारे में कुछ नहीं बोले। उनको मालूम था कि घोटाला हो रहा है, कैसे हो रहा है। वे खुद भी कुछ समय तक कोयला मंत्री थे तो इससे भी नहीं बच सकते कि मुझे पता नहीं था। उनको सब कुछ पता था और सीएजी की रिपोर्ट आने के बाद तो सब कुछ सार्वजनिक हो गया। मनमोहन सिंह अगर ईमानदार थे तो उनको सीएजी के साथ खड़ा होना चाहिए था। सीएजी की रिपोर्ट के पक्ष में बोलना चाहिए था। वे कहते कि जिन लोगों ने घोटाला किया, उनको सजा दिलाएंगे लेकिन उन्होंने ऐसा न कर सीएजी को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की। हालांकि जब सुप्रीम कोर्ट कोर्ट ने फैसला सुनाया तो सरकार के पास कोई जवाब नहीं था।
शेष कुमार कहते हैं कि हमको जो पॉलिसी की फाइल हाथ लगी दरअसल असली विस्फोट उसी से हुआ। इसी से पता चला कि 2006 में लॉ मिनिस्ट्री ने रेकमेंड किया था कि कॉम्पिटिटिव बिडिंग के जरिए अलॉटमेंट होना चाहिए। लेकिन सरकार कह रही थी कि उस समय यानी 2004 से 06 के बीच में कॉम्पिटिटिव बिटिंग का मौका नहीं था। उसका यह तर्क पूरी तरह से फेल हो गया। जिस समय मनमाने तरीके से अलॉटमेंट किए गए उस समय भी कॉम्पिटिटिव बिडिंग हो सकती थी। बहुत से लोग कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने जब सारे अलॉटमेंट रद्द कर दिए तो फिर क्या घोटाला हुआ? घोटाला हुआ। जिन कंपनियों को अलॉटमेंट हुआ, उन कंपनियों को बैंक से लोन मिल सकता था। वह लोन लेने के हकदार हो गए। दूसरा जो असली फायदा उनका हुआ कि जिनको खदान मिली उन कंपनियों के शेयरों के दाम बेतहाशा बढ़ गए। ये जो फायदा हुआ कोई कंपनी उसे लौटाने तो नहीं आई। तो सवाल यह है कि इस घोटाले में किस-किस का हाथ था? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों संसद में एक टिप्पणी की थी जिस पर कांग्रेसी बड़े नाराज हुए और बड़ा हंगामा किया। मनमोहन सिंह के बारे में उन्होंने कहा था कि मनमोहन सिंह रेनकोट पहनकर नहाना जानते हैं। घोटाला होता रहा मनमोहन सिंह ईमानदार बने रहे। इतने बड़े घोटालों का सरताज ईमानदार कैसे हो सकता है? इसके अलावा 1993 में जब वे वित्त मंत्री थे तब जेएमएम घोटाला हुआ। सरकार बचाने के लिए वोट खरीदे गए। उस समय एक तर्क हो सकता है कि वे सिर्फ वित्त मंत्री थे। लेकिन उस फैसले में वे शामिल नहीं थे, इस बात का कोई प्रमाण नहीं है। इसी तरह 2008 में तो वही प्रधानमंत्री थे और उनकी सरकार बचाने के लिए फिर से सांसदों की खरीद फरोख्त हुई। 1993 का जो मामला है, वह सुप्रीम कोर्ट गया। सुप्रीम कोर्ट ने उस समय कहा कि चूंकि यह संसद के अंदर हुआ इसलिए वह इस बारे में कोई सजा नहीं दे सकता। मुकदमा नहीं चलने दे सकता। हालांकि इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने बाद में बदला और कहा कि संसद के अंदर भी अगर इस तरह का कुछ होता है तो सुप्रीम कोर्ट को उस पर फैसला सुनाने का अधिकार है। लेकिन उस समय वो सब लोग बच गए। 2008 का मामला अभी भी अदालत में है। कभी उसका फैसला आएगा इसकी उम्मीद मत करिए। वोट के बदले नोट मामले में संसद में करोड़ों रुपए कैश दिखाए गए थे। लेकिन एक बेईमान जर्नलिस्ट इस घोटाले को उजागर करने वाली सारी रिकॉर्डिंग लेकर भाग गया। इसलिए कुछ साबित नहीं हो पाया। अगर वह वीडियो चला होता तो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी भी जेल जा सकते थे।
मनमोहन सिंह ने भारत की अर्थव्यवस्था को बर्बाद किया। इंदिरा गांधी के समय से भारत की आर्थिक नीति बनाने में उनका बड़ा योगदान रहा और प्रधानमंत्री बन गए तो इतने घोटाले हुए कि दुनिया में कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा। दुनिया में इस बात का तो उदाहरण बिल्कुल ही नहीं मिलेगा कि जिसकी सरकार में इतने घोटाले हुए, उसको ईमानदार बताया जाए। अगर वे ईमानदार हैं तो फिर ईमानदारी की परिभाषा बदलनी होगी। यह किताब बताती है कि किस तरह से कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने घोटाले किए और उन घोटालों को दबाने की कोशिश की। साथ ही जो संस्थाएं उनको उजागर करने की कोशिश कर रही थीं, उनको बदनाम करने, उन पर दबाव डालने और उनको हर तरह से प्रताड़ित करने की कोशिश हुई।
कांग्रेस पार्टी का जो काला इतिहास है, यह लोगों के मन से कभी नहीं मिटने वाला है। कांग्रेस एक भ्रष्ट पार्टी के रूप में लोगों के मन में रच बस गई है। इसलिए भ्रष्टाचार के खिलाफ या ईमानदारी की कांग्रेस की किसी बात पर कोई भरोसा करने को तैयार नहीं है। वह चारा घोटाले में 32 साल की सजा पाए लालू यादव और उनके परिवार के साथ खड़ी है। तेजस्वी यादव और उनके परिवार के दूसरे सदस्य चुनाव के बाद कब जेल चले जाएंगे, किसी को पता नहीं। नौकरी के बदले जमीन का जो घोटाला है, उसमें चार्जशीट फाइल हो चुकी है और कोर्ट उस मामले का कॉग्निजेंस ले चुकी है। लेकिन कांग्रेस ने एक बार नहीं कहा कि इस घोटाले के कारण हम आरजेडी के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे। खुद राहुल गांधी और उनकी मां सोनिया गांधी नेशनल हेरल्ड मामले में जमानत पर हैं। इस मामले में तो राहुल गांधी कब तक बाहर रहेंगे, यह तो आज की सरकार ही तय करेगी। सरकार जिस दिन तय कर ले कि इस मामले को तेजी से चलाना है, उस दिन दोनों मां बेटा जेल जा सकते हैं। कांग्रेस का भ्रष्टाचार तो जवाहरलाल नेहरू के समय से ही शुरू हो गया था। देश का पहला घोटाला जीप घोटाला हुआ। जब फौज के लिए कंडम जीपें खरीदी गईं। सोचिए कितना बड़ा धोखा किया गया देश की फौज के साथ। उसके बाद मुंदरा कांड और तमाम घोटाले हुए। इंदिरा गांधी के समय हुए घोटालों और राजीव गांधी के समय के बोफोर्स घोटाले ने कांग्रेस पर भ्रष्टाचार की ऐसी मुहर लगाई जिससे वह आज तक उभर नहीं पाई है। जो लोग कांग्रेस के ऐसे समर्थक हैं, जिन्होंने आंखें बंद कर रखी हैं उनकी बात छोड़ दीजिए। लेकिन जो भी खुली आंखों से देख रहा है उसे समझ में आ जाएगा कि यह पार्टी भ्रष्टाचार करने में बिल्कुल निपुण है। भ्रष्टाचार करने, उसको छिपाने, भ्रष्टाचारियों को बचाने, भ्रष्टाचार को उजागर करने वालों को प्रताड़ित करने में इस पार्टी का कोई जवाब नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)