हर्ष कुमार।
हम लोग यूं ही दिन रात अपनी समस्याओं को रोते रहते हैं। बच्चों को लेकर चिंतित रहते हैं। पता नहीं फालतू की सिरदर्दी से नाहक परेशान होते रहते हैं। लेकिन कभी किसी को मुकम्मल जहान नहीं मिलता। ये बात सच है और हमेशा सबसे बड़ी सच्चाई रहेगी।
अब जरा पूर्व आईएएस राकेश मेहता जी की कहानी सुन लीजिए।
दिल्ली की सड़कों पर दौड़ती लो-फ्लोर बसें हों या 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान देश की राजधानी का कायाकल्प—जिस नौकरशाह के एक इशारे पर सैकड़ों फाइलें दौड़ती थीं और प्रशासनिक अमला हरकत में आ जाता था, उनकी जिंदगी का आखिरी अध्याय बेहद खामोश और अकेला गुजरेगा, यह किसने सोचा था?
1975 बैच के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी राकेश मेहता, जिन्होंने दिल्ली के मुख्य सचिव और एमसीडी कमिश्नर जैसे शीर्ष पदों को संभाला, नोएडा के सेक्टर-82 स्थित अपने किराए के फ्लैट में फंदे से झूलते पाए गए। उम्र के 74वें पड़ाव पर, जब इंसान को अपनों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, वे करीब पांच साल से वहां अकेले रह रहे थे।
हैरान करने वाली बात यह है कि परिवार में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी। पत्नी खुद दिल्ली कैडर की रिटायर्ड आईएएस अधिकारी रही, बेटा देहरादून में है और बेटी लंदन में अपनी खुशहाल जिंदगी बसर कर रही है। रुतबा, शोहरत, और जीवन के सारे भौतिक सुख मौजूद थे, लेकिन इन सबके बीच जो नदारद था, वह था रोजमर्रा के जीवन में अपनों का साथ।
बताइये मेहता जी अकेले नोएडा में रहते थे। पत्नी व बेटा देहरादून में। शनिवार की रात पत्नी से फोन पर आखिरी बात हुई। रविवार की दोपहर जब फोन की घंटियां लगातार बजती रहीं और उस तरफ से कोई आवाज नहीं आई, तब पत्नी ने अनहोनी की आशंका में सोसायटी के सुरक्षा गार्डों को फ्लैट पर भेजा गया। दरवाजा खुला तो सामने सिर्फ सन्नाटा और एक बेजान शरीर था।
पुलिस को मिले एक पन्ने के नोट में उन्होंने किसी पर कोई इल्जाम नहीं लगाया, सिर्फ अपनी बीमारियों– ब्लड प्रेशर, शुगर और हाथ-पैरों में आने वाले कंपन– का जिक्र किया। वह हाथ, जिसने कभी देश की राजधानी के लिए बड़े-बड़े नीतिगत फैसले लिखे, अपनी अंतिम घड़ियों में अपनी ही कांपती उंगलियों और एकाकीपन से जूझ रहा था।
1975 बैच के एजीएमयूटी (AGMUT) कैडर के आईएएस अधिकारी मेहता ने दिसंबर 2007 में दिल्ली के मुख्य सचिव का पदभार संभाला था, जब शीला दीक्षित मुख्यमंत्री थीं, और वे 2010 तक इस पद पर रहे। उनके कार्यकाल में 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियां भी शामिल थीं, जो शहर के सामने सबसे बड़ी प्रशासनिक चुनौतियों में से एक थी।
मेहता इससे पहले एमसीडी कमिश्नर, दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) के सीएमडी और सचिव (बिजली) के रूप में काम कर चुके थे, और मुख्य सचिव नियुक्त होने के समय वे कई महत्वपूर्ण विभागों का कार्यभार संभाल रहे थे। वे शहरी शासन और सार्वजनिक परिवहन पर अपने फोकस के लिए जाने जाते थे। डीटीसी प्रमुख के रूप में, उन्होंने दुर्घटना-प्रवण ‘ब्लू लाइन’ बसों से मुक्ति और लो-फ्लोर बसों की शुरुआत की निगरानी की, जो आगे चलकर दिल्ली की सड़कों की एक पहचान बन गईं।
योजनाओं और परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाने वाले मीडिया-प्रेमी नौकरशाह के रूप में जाने जाने वाले मेहता ने मुख्य सचिव का पदभार संभालते ही 10-सूत्रीय एजेंडा पेश किया था। उन्होंने नागरिक प्रशासन में अधिक पारदर्शिता पर भी जोर दिया, जिसमें नए भवन निर्माण उप-नियम शामिल थे, और सरकारी सेवाओं को लोगों के घर-द्वार तक पहुंचाने के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा दिया।
उन्होंने सेंट स्टीफेंस कॉलेज, जेएनयू और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ाई की थी। उनका अंतिम संस्कार सोमवार को दिल्ली में किया गया। इस तेज-तर्रार और विजनरी अफसर की यह विदाई जीवन की एक गहरी और कड़वी सच्चाई बयान करती है—करियर की बुलंदी, पद का रसूख और दुनिया भर का सम्मान भी बुढ़ापे के अकेलेपन और खालीपन का इलाज नहीं बन सकते।
(लेखक पत्रकार और सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर हैं। एक छोटा सा परिचय यह भी है कि अमिताभ बच्चन X (पूर्व ट्विटर) पर इन्हें फॉलो करते हैं। आलेख फेसबुक वॉल से साभार)