#pradepsinghप्रदीप सिंह।
डेढ़ किलोमीटर के क्षेत्र में 14 पार्टियां मिलकर 8000 लोगों को जुटा पाईं, इसको वे देश की जनता की आवाज बता रहे हैं। यह कटाक्ष करके केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने बहुत समय बाद राहुल गांधी और उनके साथियों पर हमला बोला है।
स्थानीय निकाय के चुनाव के नतीजों के बाद अमित शाह गांधीनगर में बोल रहे थे। वह गांधीनगर से सांसद भी हैं। उन्होंने कहा कि यहां 44 सीटें थीं। 38 बीजेपी जीती है जबकि पांच कांग्रेस को मिली हैंं। आम आदमी पार्टी 32 सीटों पर लड़ी थी और सब पर उसकी जमानत जब्त हो गई, यह है विपक्ष का हाल। उन्होंने कहा कि बात इतनी ही नहीं है। त्रिपुरा जैसी कई दूसरी जगहों पर बैलेट से चुनाव हुए हैं। वहां भी कांग्रेस साफ हो गई। गौरतलब है कि विपक्ष लंबे समय से ईवीएम हटाने और मत पत्र के जरिए चुनाव कराने की मांग करता रहा है। अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस एसआईआर की वजह से नहीं हार रही है। वह जब से राहुल गांधी के हाथ में नेतृत्व आया है तब से लगातार हार रही है। बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, गुजरात जैसे दर्जनों राज्य हैं,जहां कांग्रेस दशकों से सत्ता से बाहर है। इसके बाद शाह ने जो दूसरा हमला किया वह तो और ज्यादा घातक है। शाह ने कहा कि अब पूरे देश को यह पता चल गया है कि कांग्रेस और उसके साथी दल बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या को वोटर लिस्ट में बनाए रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं। इसके साथ ही केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल और ललन सिंह ने भी कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि राहुल गांधी का अभियान जनतंत्र को बचाने का नहीं, जनतंत्र को खत्म करने का है। कुल मिलाकर पिछले 12 दिनों में राहुल गांधी और उनके साथियों ने जो कुछ किया उस सब पर भाजपा ने पानी फेर दिया। देखिए, जनतंत्र और संविधान के बचाव की कोई लड़ाई संवैधानिक संस्थाओं पर हमला करके नहीं लड़ी जा सकती और कांग्रेस पार्टी लगातार संवैधानिक संस्थाओं पर हमला कर रही है। उसने किसी संस्था यहां तक कि सेना को भी नहीं छोड़ा है। अब ताजा निशाना सुप्रीम कोर्ट है। सुप्रीम कोर्ट की ओर जिस तरह से मार्च किया गया, मैं फिर कह रहा हूं कि इस मुद्दे की उपेक्षा करके वह बहुत बड़ी गलती कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा गिराने की कोशिश करने वालों के साथ कानून किस तरह से निपटता है,यह सुप्रीम कोर्ट को पूरे देश को बताना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मार्च का अपनी ओर से स्वत: संज्ञान क्यों नहीं लिया, मुझे नहीं मालूम।
यह समझ में आता है कि भारतीय जनता पार्टी राहुल गांधी के खिलाफ कुछ क्यों नहीं कर रही है। क्योंकि राहुल गांधी उसका सबसे बड़ा एसेट हैं। राहुल गांधी को अगर जेल भिजवा दिया तो उन्हें हमदर्दी मिलने लगेगी। राजनीति में लड़ने के लिए राजनीतिक विरोधी ही नहीं, एक दुश्मन की जरूरत होती है। तो जब तक राहुल गांधी हैं तब तक भारतीय जनता पार्टी के लिए लड़ाई बहुत आसान है। इसीलिए कह रहा हूं कि राहुल भाजपा का एसेट हैं। वह कांग्रेस का एसेट नहीं हैं। कांग्रेस के लिए तो राहुल गांधी लायबिलिटी हैं। यह अलग बात है कि कांग्रेस पार्टी लायबिलिटी को गले लगाए हुए है और भाजपा जो अपना एसेट है, उस पर निशानेबाजी की प्रैक्टिस कर रही है। तो राहुल गांधी पर बीच-बीच में वह हमला बोलते रहती है कि देखिए ये हमारा दुश्मन है। कांग्रेस अब पुरानी वोटर लिस्ट को बहाल करने की मांग कर रही है। यानी वह चाहती है कि जो लोग इस दुनिया में नहीं हैं, ऐसे लोग जो स्थाई रूप से स्थानांतरित हो चुके हैं और उसके अलावा बांग्लादेशी घुसपैठिये और रोहिंग्या भारत के वोटर बने रहें। उसी की लड़ाई कांग्रेस पार्टी और उसके साथी दल लड़ रहे हैं। पूरे विपक्ष ने 2 से 12 अक्टूबर तक 10 दिन के कार्यक्रम में अपने को ही एक्सपोज कर लिया। एक बात बहुत स्पष्ट रूप से पूरे देश को दिख गई कि देश की जनता उनके साथ नहीं है। उसके पास वही गिने—चुने लोग हैं। उसके अलावा लेफ्ट के पास हमेशा दो—चार हजार ऐसे लोग होते हैं जो अराजकता और गुंडागर्दी कर सकते हैं। इसलिए आप देखिए कि अपने ही मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को धक्का देकर राहुल गांधी ने किनारे कर दिया और आईसा की नेता नेहा बोरा को साथ लेकर चल रहे थे। उनके एक तरफ नेहा बोरा और दूसरी तरफ प्रियंका वाड्रा थीं। यानी उन्होंने मान लिया कि कांग्रेस का छात्र संगठन एनएसयूआई किसी काम का नहीं है। वरना इन प्रदर्शनों में एनएसयूआई को अपनी ताकत दिखानी चाहिए थी। दिल्ली में अगर एनएसयूआई अपनी ताकत नहीं दिखा सकती है तो कहां दिखाएगी? राहुल गांधी के बारे में उनके साथी जो यह भ्रम बना रहे थे कि पूरे देश में उनकी बात सुनी जाने लगी है, उनके प्रति समर्थन बढ़ रहा है, उसको राहुल गांधी ने ही ध्वस्त कर दिया। इन 10 दिनों में उन्होंने बता दिया कि मेरे साथ कोई नहीं है और मैं तो कोहनी मारने की प्रैक्टिस कर रहा हूं। उनकी बहन ने तो महिला पुलिस वालों को कोहनी मारी है। राहुल गांधी कांग्रेस की हालत वही है, जो बहादुर शाह जफर की आखिरी दिनों में थी। साहिबे आलम दिल्ली से पालम। इनकी सत्ता तो दिल्ली से पालन तक भी नहीं रही। दिल्ली में सत्ता से गए हुए कांग्रेस को 13 साल हो गए और लोग इनको वापस लाने के बारे में सोच भी नहीं रहे हैं। इनको मुख्य विपक्षी दल बनाने को भी तैयार नहीं है। और एक के बाद एक जिस तरह से राज्यों से हमेशा के लिए बाहर हो रहे हैं। आप इंतजार कीजिए 2027 के विधानसभा चुनावों का। पांच राज्यों में फरवरी—मार्च में चुनाव है। उसके बाद दिसंबर में दो राज्यों में चुनाव है। इन सात राज्यों के चुनाव के बाद क्षेत्रीय दल सोचेंगे कि कांग्रेस और राहुल गांधी के साथ रहना है या नहीं। अखिलेश यादव जब बुरी तरह से उत्तर प्रदेश का चुनाव हारेंगे तो उसके बाद वह किसको दोष देंगे? उनके पास बना बनाया बहाना है कांग्रेस और राहुल गांधी। उसके बाद वह राहुल गांधी के साथ क्यों जाएंगे? इसीलिए अमित शाह ने आखिरी धमकी दी और राहुल गांधी एवं उनके साथियों से कहा कि आप 2029 में लगातार चौथी बार लोकसभा चुनाव हारने के लिए तैयार रहिए।
इस समय देश में हालत यह है कि भारतीय जनता पार्टी फरवरी—मार्च में होने वाले पांच राज्यों में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है और कांग्रेस एवं उसके साथी दल चुनाव आयोग से लड़ रहे हैं। अब आप समझ लीजिए कि कौन जनता के बीच में जा रहा है। चुनाव आयोग कोई पॉलिटिकल पार्टी नहीं है कि उसको हरा भी दिया तो आपकी जीत हो जाएगी। चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है। उसके फैसले सही हैं या गलत, यह कोई राजनीतिक दल या सरकार नहीं तय करती। यह सुप्रीम कोर्ट तय करेगा। दो चार सुनवाई के बाद फैसला हो ही जाएगा। अब सुप्रीम कोर्ट के पास सारे डॉक्यूमेंट पहुंच गए हैं। चुनाव आयोग की सारी फाइलें पहुंच गई हैं। तो झूठ का पर्दाफाश बहुत जल्दी होने वाला है। कुछ दिन तक ये झूठ चल गया क्योंकि एक अखबार ने आधा सच छापा। विपक्ष को लगा कि बस यही मौका है। अब जमीन पर आने का मौका आ गया है। इंतजार कीजिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)