कोई मुद्दा ऐसा नहीं, जिस पर तीनों साथ आ सकें ।
देश के तीन नेताओं राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल गाड़ी एक ही जगह अटक गई है। इन तीनों में कुछ बातें कॉमन और कुछ परस्पर विरोधी हैं।
अखिलेश यादव तीसरी बार 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन करने जा रहे हैं। पहली बार उन्होंने 2017 के विधानसभा और दूसरी बार 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से गठबंधन किया था। उन्हें पहली बार बड़ा नुकसान और दूसरी बार फायदा हुआ था। अब तीसरी बार देखना है कि क्या होता है। अरविंद केजरीवाल का भी इतिहास ऐसा ही रहा है। उन्होंने 2012 में अपनी पार्टी बनाई। तब उन्होंने अपने बच्चों की कसम खाई थी कि कांग्रेस का न तो समर्थन लेंगे और न देंगे। लेकिन दिल्ली में चार महीने का मुख्यमंत्री बनने के लिए उन्होंने कांग्रेस का समर्थन लिया। उसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने दिल्ली में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया, लेकिन वहां की एक भी सीट नहीं जीत पाए। कांग्रेस को भी दिल्ली में एक भी सीट नहीं मिली। लगातार तीन लोकसभा चुनाव 2014, 2019 और 2024 में दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकीं। दोनों दल अलग-अलग लड़े तब भी नहीं जीते और साथ लड़े तब भी। अब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार नहीं है। पंजाब में है। पंजाब में कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी है। तो वहां दोनों पार्टियां आमने-सामने हैं और समझौते की कोई गुंजाइश नहीं है। लेकिन अखिलेश यादव को लगता है कि यूपी में कांग्रेस के साथ गठबंधन 2027 में जरूर काम आएगा। उसका कारण है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन करके समाजवादी पार्टी को उसके इतिहास की सबसे ज्यादा 37 लोकसभा सीटें मिलीं। उस चुनाव में लगे हाथ कांग्रेस पार्टी ने भी गंगा नहा लिया। उसको भी यूपी से छह सीटें मिल गईं। अब कांग्रेस और सपा को लगता है कि 2024 में जो हुआ, वही 2027 में होगा। लेकिन ये दोनों दल यह भूल जाते हैं कि इस देश का मतदाता इतना समझदार है कि वह एक चुनाव का असर दूसरे चुनाव पर अक्सर नहीं पड़ने देता। वह अलग-अलग जिम्मेदारी के लिए अलग-अलग दलों और नेताओं को चुनता है। जिसको कॉरपोरेशन में जिताया जरूरी नहीं कि उसको विधानसभा जिताए और जिसको विधानसभा चुनाव जिताया जरूरी नहीं कि उसको लोकसभा चुनाव में भी जिताए।
अब राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल की एक समस्या है। किसी मुद्दे पर तीनों एक साथ नहीं आ सकते या नहीं आ पा रहे हैं। जैसे पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस आमने—सामने हैं इसलिए वहां गठबंधन हो नहीं सकता है। उत्तर प्रदेश में जरूर सपा और कांग्रेस साथ हैं, लेकिन दोनों पार्टियों के नेता रोज सुबह उठकर एक—दूसरे के खिलाफ बयान देते हैं। राहुल गांधी उत्तर प्रदेश का चुनाव दिल्ली से लड़ना चाहते हैं। उनको लगता है कि कोई राष्ट्रीय मुद्दा उनके हाथ में आ जाए तो वह सपा के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में भाजपा को हरा सकते हैं, लेकिन कोई मुद्दा हाथ में आ नहीं रहा है। जो मुद्दा है उस पर उनके साथी दलों की सहमति नहीं है। जैसे एसआईआर का मुद्दा सबसे पहले बिहार में राहुल ने जोर शोर से उठाया और वोट चोरी के नाम से यात्रा भी निकाली, लेकिन तेजस्वी यादव ने साथ नहीं दिया। तेजस्वी को समझ में आ गया कि यह मुद्दा नीचे तक जाने वाला नहीं है। वही हाल उत्तर प्रदेश में है। एसआईआर के मुद्दे पर राहुल गांधी जितने उत्साहित और सक्रिय हैं, अखिलेश यादव नहीं हैं। अखिलेश की नजर में यह उत्तर प्रदेश में बड़ा मुद्दा नहीं बनने वाला। तो एक कॉमन थ्रेट खोजने की कोशिश हो रही है। अब आप देखिए कि अरविंद केजरीवाल जिनकी पंजाब सरकार है, वह चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहे हैं। कांग्रेस पार्टी जिसकी अभी-अभी केरल में सरकार बनी है,उस सरकार के गृहमंत्री रमेश चेन्निथला ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया है कि हम इसलिए जीत पाए क्योंकि केरल में एसआईआर हुआ। उन्होंने कहा कि पहले सीपीएम वाले बोगस वोटर जुड़वा लेते थे और जीत जाते थे। इस बार ऐसा नहीं हो पाया। तो राहुल गांधी पहले तय करें कि एसआईआर के मामले पर उनकी पार्टी में मतैक्य हो। राहुल गांधी जो भी मुद्दा उठाते हैं उसके बाद उनको कोई फर्क नहीं पड़ता कि जनता उस पर क्या सोच रही है या उस पर उनकी पार्टी के लोग उनके साथ हैं कि नहीं। राफेल, अडानी, पेगासस के मामले पर उन्होंने यही किया। एसआईआर के मुद्दे को लेकर सबसे ज्यादा विवाद पश्चिम बंगाल में हुआ, लेकिन वहां राहुल गांधी नहीं गए। एसआईआर के मुद्दे पर भी वह सिलेक्टिव हैं कि कहां उठाएंगे और कहां नहीं उठाएंगे। उत्तर प्रदेश में वह एसआईआर का मुद्दा उठाएंगे, लेकिन केरल और तमिलनाडु में नहीं उठाएंगे। मतलब एसआईआर तमिलनाडु और केरल में ठीक हो रही है, लेकिन बिहार और उत्तर प्रदेश में ठीक नहीं हो रही है।
एसआईआर पर उत्तर प्रदेश में तो अजब स्थिति देखने को मिली। यहां लगभग दो करोड़ मतदाताओं के नाम कट गए हैं, लेकिन कांग्रेस की सहयोगी और राज्य की मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने इसका विरोध नहीं किया बल्कि समाजवादी पार्टी तो शुरू में बड़ा खुश थी। अखिलेश यादव तो कह रहे थे कि एसआईआर से बीजेपी के वोट कट गए। अब हमारी जीत पक्की हो गई है। तो इन तीनों नेताओं की समस्या यह है कि इनको एक ऐसा मुद्दा नहीं मिल रहा है, जिस पर तीनों साथ आ सकें और भाजपा को कटघरे में खड़ा करके उसकी छवि को खराब कर सकें। भाजपा के खिलाफ जो मुद्दे हैं जैसे यूजीसी गाइडलाइंस और एससी—एसटी एट्रोसिटीज एक्ट, उन पर बोलने की इनकी हिम्मत नहीं है। आपने इन तीनों नेताओं में से किसी को इन मुद्दों पर बोलते हुए सुना क्या? इन मुद्दों पर भाजपा के अपने ही समर्थक उससे नाराज हैं। इससे अच्छा अवसर किसी विपक्षी पार्टी के लिए क्या हो सकता है कि जब किसी मुद्दे पर उस पार्टी के समर्थक ही उससे नाराज हो जाएं, लेकिन तब भी उस मुद्दे को उठाने की इन लोगों की हिम्मत नहीं हो रही है या इनको मुद्दे की समझ नहीं है। मुझे लगता है शायद दोनों बातें हैं। यह मुद्दा उठाने से उनको डर इसलिए भी लगता होगा कि कहीं उल्टा न पड़ जाए। लेकिन अखिलेश यादव भूल जाते हैं कि एससी—एसटी एट्रोसिटीज एक्ट का सबसे ज्यादा खामियाजा पिछड़ा वर्ग के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। फिर भी वह चुप हैं। एसआईआर का राहुल गांधी और अखिलेश यादव कितना भी विरोध कर लें, अरविंद केजरीवाल चुनाव आयोग के खिलाफ कुछ भी बोल लें,लेकिन लोगों को इस पर विश्वास नहीं होने वाला। यह चुनाव का मुद्दा नहीं बनने वाला है। एक अखबार की अधूरी कहानी को लेकर ये सारे नेता इस तरह से उछलने लगे जैसे इनको बहुत बड़ा हथियार मिल गया हो और मुश्किल से 10 दिन भी नहीं लगे वह हथियार भोथरा साबित हुआ। एसआईआर पर चुनाव आयुक्तों में मतभेद का बात विपक्ष ने खूब उछाली,लेकिन जब तीनों चुनाव आयुक्तों ने साझा बयान दे दिया कि एसआईआर समेत सारे फैसले चुनाव आयोग ने सर्वसम्मति से लिए तो विपक्ष को सांप सूंघ गया है। अब भाजपा आक्रामक है और इनसे जवाब मांग रही है। विपक्ष ने जिस बात को आधार बनाया था वह तीनों चुनाव आयुक्तों की साझा प्रेस कांफ्रेंस के बाद खत्म हो गया। तो इन तीनों पार्टियों की गाड़ी इसी तरह से अटकी रहेगी क्योंकि मुद्दों, विचारों और नैरेटिव को लेकर उनमें कोई क्लैरिटी नहीं है। किसी भी नेता और पार्टी का असली टेस्ट चुनाव में होता है और इन तीनों नेताओं का टेस्ट 2027 में होने जा रहा है। पंजाब में टेस्ट आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों का है। अरविंद केजरीवाल के लिए सरकार बचाने की चुनौती है और राहुल गांधी के सामने सत्ता में वापसी की चुनौती है। उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस को मिलकर यह दिखाना है कि 2024 का नतीजा अपवाद नहीं था, नियम था। लेकिन उसके लिए जमीन पर भी तो कुछ करना पड़ेगा। केवल सोशल मीडिया पर बयान देने से तो कुछ होगा नहीं। अखाड़े में उतरे बिना कोई पहलवान कुश्ती नहीं जीत सकता है, चाहे दुनिया का जितना बड़ा पहलवान हो, लेकिन अखिलेश यादव और राहुल गांधी को यह गलतफहमी है कि वे ऐसा कर सकते हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)












