सवर्ण समाज को विश्वास हो चला भाजपा को उसकी परवाह नहीं।
यूजीसी गाइडलाइंस का मुद्दा जनवरी से चर्चा में है। 13 जनवरी को यह मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और उसने इन पर रोक लगा दी। कहा कि 2012 की गाइडलाइंस ही लागू रहेंगी। तब सरकार ने कहा था कि हम इस पर विचार करेंगे। अब 10 महीने बाद सरकार कह रही है कि हम कमेटी बनाने पर विचार कर रहे हैं। किसी वर्ग के छात्र के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। इससे दो दिन पहले संघ के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि ये असंतुलित गाइडलाइंस हैं। सवाल है कि आपको यह बात समझने में 10 महीने क्यों लग गए? जिस दिन ये गाइडलाइंस जारी हुई थीं, उस दिन क्यों नहीं समझ में आया था? और क्या संघ के लोग जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोलेंगे तब वह संदेश भाजपा तक पहुंचेगा? अभी तक लोगों को सरकार की नीयत पर शक था कि यह अनायास नहीं हुआ है। जानबूझकर किया गया है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से जो कुछ कहा गया उससे यह शक विश्वास में बदल गया है। अब भी सरकार जागने का नाटक कर रही है, जागी नहीं है। वह इन गाइडलाइंस को बदलने की बात नहीं कर रही है। वह कह रही है कि हम गाइडलाइंस लाएंगे। सवाल यह है कि कब लाएंगे? 10 महीने से क्या कर रहे थे?
ये गाइडलाइंस क्यों आईं,लोगों के मन में इसे लेकर बहुत सारे सवाल हैं। अब सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट में जो कुछ कहा है, उससे बड़ा स्पष्ट दिखाई देता है कि यह मामले को लटकाने का प्रयास है। बात यह नहीं है कि चुनाव पर इसका क्या असर पड़ेगा? चुनाव में वोट देते समय लोग केवल इसी बात पर नहीं सोचेंगे। मेरी नजर में यह दीर्घकालिक असर का मामला है। देश के सवर्ण समाज का विश्वास भाजपा और उसकी सरकार से उठ गया है। अब देखिए किस-किस तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि सवर्ण समाज साथ था तो सरकार तो नहीं बन पाई। जिन लोगों को लग रहा है कि 2014 में ओबीसी और एससी—एसटी वर्ग के लोगों ने भाजपा की सरकार बनवा दी, वे भूल जाते हैं कि 1998 और 1999 में भी केंद्र में सरकार बनी थी। ये ठीक है कि तब पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। इसके अलावा बीजेपी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में तो 1991 में पूर्ण बहुमत की सरकार बन गई थी। दूसरा तर्क जो दिया जा रहा है, वह और ज्यादा चिढ़ाने वाला है। कहा जा रहा है कि जो लोग इन यूजीसी गाइडलाइंस का विरोध कर रहे हैं, उन पर जाति हावी हो गई है,वे धर्म भूल गए हैं। सवाल है कि सरकार ने यह क्या सोच कर किया? मैं यह मानने को तैयार नहीं हूं कि कोई सलाह मश्विरा किए बिना अधिकारी स्तर पर यह फैसला ले लिया गया। अगर ऐसा हुआ है तो किसी अधिकारी के खिलाफ 10 महीने में कोई एक्शन हुआ क्या? एक्शन छोड़िए, किसी से पूछताछ भी हुई क्या? अच्छा होगा कि सरकार लीपापोती करने के बजाय स्पष्ट रूप से बताए कि वह ये गाइडलाइंस क्यों लाई? अब बहुत से लोग कह रहे हैं कि सरकार अब जो बात कह रही है वह रोल बैक है। सवाल है कि जो लागू नहीं हुआ, उसको रोल बैक कैसे कर लेंगे? सुप्रीम कोर्ट ने तो 13 जनवरी को ही इन्हें लागू करने पर रोक लगा दी थी। सरकार ने तब भी कहा था कि हम इस पर विचार करेंगे और 10 महीने बाद भी वही भाषा बोल रही है। अब कह रही है कि कमेटी बनाने पर विचार कर रहे हैं। सवाल है कि 10 महीने में कमेटी क्यों नहीं बनाई? सबको मालूम है कि कमेटी का मतलब है मुद्दे को टालना होता है। आपको सीधे घोषणा करनी चाहिए थी कि हमने जो गाइडलाइंस जारी की थीं, उनको वापस ले रहे हैं। ऐसा सरकार नहीं कह रही है। कुछ लोगों का कहना है कि सरकार को डर है कि इनको रद्द करने की बात की तो ओबीसी और एससी—एसटी समाज के लोग नाराज हो जाएंगे। पहली बात तो यह कि जाति के आधार पर कोई भेदभाव होता है तो पहले से एससी—एसटी एक्ट बना हुआ है। तो ये गाइडलाइंस एससी—एसटी वर्ग के लिए तो लाई नहीं गईं क्योंकि उसकी जरूरत ही नहीं थी। इसमें ओबीसी को शामिल किया गया और इस बात का अध्ययन किए बिना कि इसका असर क्या होगा? एससी—एसटी के लोगों की सबसे ज्यादा शिकायत ओबीसी समाज की ही कुछ जातियों के खिलाफ है। आप देश भर के थानों की रिपोर्टों को देख लीजिए। जब ओबीसी वर्ग के छात्रों के खिलाफ एससी—एसटी वर्ग के लोग शिकायत करेंगे तो उसका क्या?
सवर्णों पर यह जो आरोप लग रहा है कि आप धर्म को भूल गए और जाति याद आ गई, यह सरकार ने याद दिलाया है। सरकार तो हिंदू एकता की बात कर रही थी। वह जातीय पहचान की राजनीति को खत्म करने का काम कर रही थी और उसमें उसको सफलता भी मिल रही थी। अचानक उसने यूटर्न ले लिया कि अब हमको जाति की राजनीति करनी है। उसको लगा कि ये सवर्ण जाएंगे कहां? इनके पास कोई विकल्प नहीं है। उसे अंदाजा नहीं है कि यही गलतफहमी कांग्रेस पार्टी को भी थी और आज उसका हाल सबके सामने है। कांग्रेस से सवर्ण गया और फिर एससी—एसटी भी गया। सवर्ण समाज के 90—95% तक लोग भाजपा को वोट देते हैं। भाजपा को बताना ही पड़ेगा कि आखिर क्यों वह ये गाइडलाइंस लाई? यह जो कहा जा रहा है कि संघ ने भाजपा को संदेश दे दिया है, वास्तव में संघ को उसके लोगों ने संदेश दिया है। शाखाओं में लोगों की उपस्थिति घटने लगी थी। संघ के स्वयंसेवक ही इन गाइडलाइंस का विरोध कर रहे हैं। तब संघ को समझ में आया कि यह मुसीबत तो हमारे ऊपर आ रही है। तब उनको याद आया कि यह संतुलित नहीं है। वरना संघ भी उसी मानसिकता में था,जिसमें भाजपा है कि सवर्ण समाज जाएगा कहां? तो सवर्ण समाज को अब विश्वास हो गया है कि भाजपा को हमारी परवाह नहीं है। भाजपा 10 महीने से इंतजार कर रही थी कि शायद यह तूफान अपने आप शांत हो जाएगा। सवर्ण समाज कोई संगठित नहीं है,कितना विरोध कर लेंगे। ये सब बातें बिल्कुल सही हैं, लेकिन जब आदमी का मन खट्टा हो जाता है और उसका आप पर से भरोसा उठ जाता है तो फिर वह किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाता है। आप इस वर्ग को जबरदस्ती दूर धकेल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट अगर न रोकता तो ये गाइडलाइंस आज लागू होतीं। सरकार आज भी नहीं कह रही है कि हमसे गलती हो गई। हम इसमें सुधार करेंगे। इससे आप समझिए कि यह इरादतन किया गया अपराध है। मेरा आकलन है कि इस अपराध की सजा भाजपा को तुरंत नहीं मिलने वाली है, लेकिन सजा मिलेगी जरूर। जाति की राजनीति का खेल बड़ा अजब है। यह दुधारी तलवार दोनों तरफ काटती है। भाजपा अभी तक इससे बच-बच कर चल रही थी, लेकिन 2024 में जो सीटें कम हुईं तो उसे लगा कि जाति की राजनीति पर चले जाना चाहिए। जाति की राजनीति भाजपा का स्ट्रांग पॉइंट कभी नहीं रही है और कभी होगी भी नहीं। इसलिए सरकार अगर अब भी नहीं चेत रही है तो इसका मतलब वह बड़े संकट को न्योता दे रही है। भाजपा के विरोधी भी तो इसी राजनीति पर चल रहे हैं। वह तो भाजपा की किस्मत अच्छी है कि कांग्रेस पार्टी किसी लायक नहीं है और कोई दूसरी राष्ट्रीय पार्टी है नहीं। केवल इसका लाभ भाजपा को मिल रहा है। लेकिन हर चीज की एक सीमा होती है। उसके बाद सारे कंसीडरेशन हवा में उड़ जाते हैं। क्या भाजपा तब तक इंतजार करेगी या अपना रास्ता बदलेगी?
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









