#santoshtiwariडॉ. संतोष कुमार तिवारी।
ईरान की तेहरान यूनिवर्सिटी में प्राचीन संस्कृति और भाषाओं (Ancient Culture and Languages) का एक विभाग है। इसमें संस्कृत भाषा का भी स्थान है। ऐसा माना जाता है की ईरान की आज की भाषा और इसके पहले वहां रहने वाले पारसियों की भाषा की मूल भाषा संस्कृत से है।

ईरान यूनिवर्सिटी में विदेशी भाषाओं की शिक्षा के लिए Faculty of Foreign Languages and Literature भी है। इसमें इंग्लिश,  फ्रेंच आदि भाषाओं की शिक्षा की व्यवस्था है। संस्कृत को विदेशी भाषा में नहीं रखा गया है।

‘कल्याण’ के सितम्बर 1933 के अंक में ईरान के बन्दर अब्बास स्थित शिव मंदिर का फोटो प्रकाशित हुआ था। इससे भी पता चलता है कि ईरान के भारत के साथ सदियों पुराने संबंध हैं। भारत किसी भी देश द्वारा चलाए जा रहे हैं आतंकवाद का समर्थन नहीं करता, लेकिन ये सदियों पुराने सांस्कृतिक और भाषाई संबंध आसानी से टूटने वाले नहीं हैं।

अयातुल्लाह खामनेई का बाराबंकी कनेक्शन

अयातुल्लाह अली खामनेई (Ayatollah Ali Khamenei) जो कि ईरान के सर्वोच्च शिया नेता थे, उनके पूर्वज लखनऊ के पास के एक जिले बाराबंकी से ईरान आए थे। यह बात अली खामनेई  ने एक बार हमारे केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को बताई थी। नितिन गडकरी तीन-चार बार अली खामनेई  से मिले थे। अली खामनेई की मार्च 2026 में इजराइल और अमेरिका द्वारा की गई टारगेटेड किलिंग में हत्या कर दी गई थी।

नितिन गडकरी का अली खामनेई और ईरान के बारे में एक छोटा सा लगभग 2 मिनट का वक्तव्य कोई भी गूगल सर्च पर Nitin Gadkari with Ayatollah Ali Khamenei टाइप करके यूट्यूब पर देख और सुन सकता है।

ईरान में विशाल शिव मन्दिर

ईरान में पिछली शताब्दी के शुरुआती दौर में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के पास स्थित बंदर अब्बास इलाके में एक विशाल हिन्दू मन्दिर और गुरुद्वारा भी था। होर्मुज जलडमरूमध्य से जो पानी के जहाज गुजरते थे उनसे यह मन्दिर और गुरुद्वारा दिखाई पड़ता था। अब वहां यह मन्दिर एक म्यूजियम स्थल बन गया है और गुरुद्वारा तो गायब ही हो गया है।

इस मन्दिर और गुरुद्वारे के बारे में गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित हिन्दी मासिक पत्रिका के सितम्बर 1933 के  अंक में एक लम्बा लेख उस मन्दिर के फोटो के  साथ छपा था।

‘ईरान में शिव मन्दिर’ शीर्षक से प्रकाशित इस लेख के लेखक थे श्री महेश प्रसादजी मौलवी, आलिम-फाज़िल। अर्थात महेश प्रसाद जी मौलवी भी थे और उनके पास आलिम-फाजिल की डिग्री भी थी। कहने का मतलब यह कि वह इस्लाम धर्म के विद्वान भी थे। वह उस मन्दिर में गए भी थे। और उस इलाके को ठीक से देखा और समझा था।

लेख में उन्होंने लिखा: “ईरान का नाम ही फारस या पर्शिया है। यह वह देश है जहाँ का अधिकारी मुसलमान है और जहाँ की अधिकांश प्रजा भी मुसलमान ही है। केवल थोड़े-से अन्य मतावलम्बी ईसाई, पारसी और यहूदी हैं। अपनी यात्रा के अवसर पर मुझे इन लोगोंके देवालय दिखायी पड़े। पर जिन लोगों के देवालयों ने मेरा ध्यान सबसे अधिक अपनी ओर खींचा, वे उन हिन्दुओं तथा सिक्खों के देवालय थे, जो बहुत ही थोड़ी संख्या में ईरान के अनेक स्थानों में हैं। अस्तु, इस अवसर पर केवल एक हिन्दू-मन्दिर का वर्णन दिया जायगा।”

तेहरान की उस सड़क का फोटो जोकि इस्कॉन के संस्थापक प्रभुपाद जी द्वारा स्थापित शाकाहारी गोविंद रेस्टोरेंट की ओर जाती है।

हालांकि यह बात लेखक ने नहीं लिखी पर उनके कहने का आशय तो यही हुआ कि इस मन्दिर के अतिरिक्त भी उस दौरान ईरान में अन्य मन्दिर और गुरुद्वारे थे।

श्रीमहेश प्रसादजी ने लिखा: “ईरान के दक्षिणी भाग में बन्दर अब्बास नामक एक प्राचीन नगर फारस की खाड़ी के तट पर है। ऐतिहासिक दृष्टि से इस स्थान की कुछ कम महत्ता नहीं है, क्योंकि यहीं (अथवा इसके पास ही) वह स्थान है जहाँ से ईरान के प्राचीन और असल निवासी पारसियों ने सातवीं शताब्दी में अरब के मुसलमानों के आक्रमणों से पीड़ित होकर अपने प्यारे देश को त्यागा और भारत में शरण ली थी। वर्तमान काल में भी इस स्थान की महत्ता बहुत कुछ है। वहाँ ईरानी राज्य के कई बड़े कर्मचारी रहते हैं और इसकी गणना ईरान के प्रधान नगरों में है। इसी स्थान में एक विशाल मन्दिर है।”

“जब मैं जहाज में ही था तो मुझे हिन्दू मिले थे, जो फारस की खाड़ी में दुबई नामक स्थान में मोती के व्यापारार्थ जा रहे थे। उन्होंने ही मुझे सबसे पहले इस मन्दिर की बाबत बतलाया था। उस समय मैंने समझा था कि कोई छोटा-सा मन्दिर नाममात्र के लिये होगा; पर जब मैं उस मन्दिर की ओर जा रहा था तो दूर से ही उसकी विशालता ने मुझ पर अच्छा प्रभाव डाला और जब मैं मन्दिर में पहुँचा तो जो बातें मेरे हृदय में उत्पन्न हुईं, उनके सम्बन्ध में तो कहा ही क्या जाय?”

“यह मन्दिर बस्ती के बीच में है। मन्दिर और साथ में लगे हुए गुरुद्वारे की कुल भूमि लगभग छह बीघे की है।”

“इसके चारों ओर मुसलमानों के ही घर हैं। मन्दिर या गुरुद्वारा में अनेक अवसरों पर ढोल, शंख और झाँझ आदि बजते हैं; पर वहाँ के मुसलमानों की ओर से किसी प्रकार की आपत्ति नहीं होती, यद्यपि मुसलमानों की संख्या बन्दर अब्बास में आठ हजारके लगभग है और हिन्दू केवल साठ-सत्तर के ही लगभग हैं।”

“यह मन्दिर कब बना था? किसने बनवाया था? और क्यों कर इसके बनने की नौबत आयी थी? इस प्रकार की बातों का पता मुझे ठीक-ठीक कुछ नहीं लगा। हाँ, इतना अवश्य सुनने में आया कि वहाँ किसी समय में हिन्दुओं और सिक्खों की पलटनें थीं, उन्हीं की बदौलत मन्दिर और गुरुद्वारा दोनों की स्थापना हुई थी। यह मन्दिर कुछ पुराना अवश्य है और केवल मन्दिर ही लगभग पन्द्रह हजार रुपयों की लागत का जरूर होगा।”

“मन्दिर का जो चित्र मैंने शुक्रवार 17 मई सन् 1929 को खींचा था, वही यहाँ दिया जा रहा है। इससे स्पष्ट है कि इसकी बनावट भारतीय शिवालयों के ढंग की है। भारत से ही गयी हुई इसमें शिवजी की मूर्ति है; पर साथ-ही-साथ कृष्ण-भगवान्, महावीर स्वामी और जोगमायादेवी आदि की मूर्तियाँ भी हैं। पास ही गुरुद्वारे में श्रीगुरुग्रन्थ साहब भी विराजमान हैं। इनमें से जब किसी एक की पूजा होती है, तो सभी की आरती की जाती है। इस प्रकार अनेक उपास्यदेवों का एक होना अच्छा समझा जाय या न समझा जाय; पर वहाँ तो सारे उपास्यदेवों में मानो एकता हो गयी है, परस्पर किसी प्रकार का वैर-विरोध नहीं है।”

यह इलाका हिंदू बाग के नाम से जाना जाता था

श्रीमहेश प्रसादजी ने अपने लेख में लिखा: “मन्दिर और गुरुद्वारा सब-का-सब वहाँ ‘हिन्दू बाग’ के नामसे अधिक प्रसिद्ध है। सारा खर्चा वे हिन्दू चलाते हैं जो वहाँ थोड़ी-सी संख्या में व्यापारार्थ पहुँचे हैं। जिन दिनों मैं वहाँ ठहरा था, वहाँ एक सिन्धी पुजारी थे और एक मुसलमान नौकरानी मन्दिर और गुरुद्वारे के बाहरी भाग की सफाई आदि के लिये थी। हाँ, मैंने अपने कई दिनों के ठहरने के समय में भी देखा कि अनेक हिन्दू वहाँ नित्य प्रति आते थे और बड़ी श्रद्धापूर्वक दर्शन करके चले जाते थे। एक दिन एक सज्जन ने वहाँ ‘कड़ाह-प्रसाद’ कराया था। उसमें बन्दर अब्बास के प्रायः सभी हिन्दू सम्मिलित हुए थे और अनेक लोग जिस श्रद्धा के साथ उसमें शरीक हुए थे, उसको मैं कदापि भूल नहीं सकता।”

‘कल्याण’ में प्रकाशित उपर्युक्त लेख Gita Seva App  (https://gitaseva.org/app) डाउनलोड करके पढ़ जा सकता है। इस ऐप पर कल्याण के पुराने अंक और गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित अनेक पुस्तकें आदि भी उपलब्ध हैं।

आज उस स्थान पर एक मन्दिर म्यूजियम है

यह मन्दिर अब एक मन्दिर-म्यूजियम बन कर रहा गया है। जिसे दूर-दूर से टूरिस्ट लोग देखने आते हैं। इस म्यूजियम के बारे में कोई भी इंटरनेट पर सर्च करके देख सकता है। इंटरनेट पर कहीं भी उस गुरुद्वारा का जिक्र नहीं है जिसकी उपयुक्त लेख में चर्चा की गई है। लगता है वह हमेशा के लिए भस्म कर दिया गया है।

तेहरान में गोविंद रेस्तरां

इस्कॉन (International Society for Krishna Consciousness) के संस्थापक श्रीलप्रभुपादजी (1896-1977) ने मार्च 1975 और अगस्त 1976 में दो बार तेहरान की यात्रा की थी। उस समय उन्होंने वहां पर एक पूर्ण शाकाहारी रेस्तरां की भी स्थापना की थी। पूर्ण शाकाहारी रेस्तरां से मतलब यह है कि वहां अंडा मांस मछली आदि चीज नहीं मिलतीं। तब ईरान में शाह पहलवी (1919-1980) का शासन था। सन् 1982 तक यह  यह रेस्तरां चल रहा था। सन् 1982 में ईरान में अयातुल्लाह खुमैनी (1900-1989) का शासन था, वह शाह पहलवी को अपदस्त करके सत्ता में आए थे। परंतु अब यह शाकाहारी रेस्तरां तेहरान में है या नहीं यह ठीक से पता नहीं चल पा रहा है। Google सर्च पर यह टाइप करने से ‘Govinda’s Restaurant in Tehran – Back to Gohead’ उसके बारे में कुछ जानकारी मिलती है।

अब ये देश आतंकवाद के एक्सपोर्टर

चाहे ईरान हो या पाकिस्तान, जहां से हिंदुओं को भगाया गया, उनको जबरन कन्वर्ट कराया गया,  उनके मन्दिर तोड़े गए, अब दुनिया में इन देशों की प्रमुख पहचान आतंकवाद के एक्सपोर्टर अर्थात निर्यातक के रूप में है।

(लेखक सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं)