70% मुस्लिम आबादी वाली सीट पर भाजपा की जीत के संकेत ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
पश्चिम बंगाल की रेज़ीनगर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजे ने राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया है। 65 से 70% मुस्लिम आबादी वाली इस सीट पर भाजपा की जीत ने बताया है कि कानून का राज अगर स्थापित हो जाए तो किस तरह से आप डेमोग्राफी को न्यूट्रलाइज कर सकते हैं।
रेज़ीनगर सीट हुमायूं कबीर के इस्तीफे से खाली हुई थी। हुमायूं कबीर ने विधानसभा चुनाव से पहले टीएमसी छोड़कर अपनी पार्टी बना ली थी और दो सीटों से लड़कर दोनों पर जीत हासिल की। बाद में उन्होंने यह सीट छोड़ दी। उपचुनाव में उन्होंने यहां से अपने बेटे गुलाम नबी आजाद को उतारा। रेजीनगर में करीब 70% मुसलमान हैं तो गुलाम नबी की जीत तय मानी जा रही थी। यहां के करीब 30% हिंदू अगर एकमुश्त वोट भी भाजपा को दे देते तो भी उसका उम्मीदवार नहीं जीतना चाहिए था, लेकिन हुआ ठीक उल्टा। भाजपा जीत गई। मुस्लिम बहुल किसी निर्वाचन क्षेत्र में बीजेपी तब जीतती है जब मुस्लिम वोटों का बंटवारा हो। रेज़ीनगर में तो यह भी नहीं हुआ। पिछले चुनाव में यहां से भाजपा के उम्मीदवार को 64,000 के करीब वोट मिले थे और इस बार तो उसकी जीत ही करीब 75,000 वोटों से हुई है। यह कोई सामान्य हार या जीत नहीं है। 2014 से ही हमें लगातार यह देखने को मिल रहा था कि मुस्लिम वोट का वीटो खत्म हो गया है। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में भी यह दिखा। उसके बाद 40% मुस्लिम आबादी वाले असम और 30% मुस्लिम आबादी वाले पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनावों में यह नजर आया और दोनों ही राज्यों में प्रचंड बहुमत से बीजेपी की सरकार बनी। लेकिन रेज़ीनगर का ट्रेंड उससे अलग है। इस ट्रेंड में आप देखिए कि मुस्लिम बहुल इलाके में मुस्लिम वोट का बंटवारा न होने के बाद भी बीजेपी जीत गई।
पिछले चुनाव में रेज़ीनगर में हुमायूं कबीर को 123000 वोट मिले थे और उनकी जीत 58000 वोटों से हुई थी। इस बार पोलिंग 80% हुई और भाजपा के उम्मीदवार को 1 लाख 29000 वोट मिले। अब जहां कुल 75—80 हजार हिंदू वोटर हों, वहां 1 लाख 29000 वोट बीजेपी को मिल जाएं तो जाहिर है कि मुसलमानों का भी वोट मिला। अब मुसलमान बीजेपी को वोट देगा, यह अकल्पनीय है। लेकिन आंकड़ों को झुठलाया नहीं जा सकता। तो क्या मुसलमानों का मन बदल गया? ऐसे मौके पर मुझे बार-बार सरदार पटेल का वह भाषण याद आता है, जब मुसलमानों ने शिकायत करना शुरू किया कि हमारी राष्ट्र के प्रति वफादारी पर शक क्यों किया जा रहा है? तो सरदार पटेल ने कहा था कि अरे भाई,एक रात पहले तक तो आप पाकिस्तान मांग रहे थे। आज ऐसा क्या हो गया कि आपकी वफादारी पर शक न करें? मुसलमानों का मन बदल गया, ये मानना मेरे हिसाब से सबसे बड़ी गलती होगी। फिर सवाल ये है कि क्या किसी डर से ऐसा हुआ? जवाब है कि हां, डर से तो हुआ। डर किसका था? क्या भाजपा सरकार का डर था? क्या डर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का था? उन्होंने उपचुनाव के समय एक बयान भी दिया था कि यह रेज़ीनगर के मुसलमानों के लिए परीक्षा की घड़ी है। उनको साबित करना होगा कि वे सरकार के साथ हैं या सरकार के विरोध में हैं। कुछ लोग कह सकते हैं कि इस बयान के कारण मुसलमान डर गए। कुछ लोग कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह का डर है। मुझे नहीं लगता कि इनमें से कोई डर ऐसा है, जो मुसलमानों का वोट बीजेपी को दिलवा सके। वरना यह डर देश में और जगह पर भी होता। दरअसल भारत की राजनीति में यह एक टेक्टोनिक शिफ्ट है। यह प्रस्थान बिंदु है और यहां से देश की राजनीति में बड़े परिवर्तन आएंगे, ऐसा दिखाई दे रहा है। तो डर किस बात का था? अब इसके बारे में तीन चार बातें कही जा सकती हैं। पहली, मुसलमानों के मन में यह आने लगा है कि मुस्लिम नेता केवल उनका इस्तेमाल करते हैं। उनके लिए कुछ नहीं करते तो उनसे निराशा है। फिर सवाल उठता है कि अभी मई में तो आपने हुमायूं कबीर को वोट दिया था। तब आपको हुमायूं कबीर पर भरोसा था और अक्टूबर आते—आते आपका भरोसा उठ गया। ऐसा पांच महीने में क्या हो गया? हुमायूं कबीर ने तो बाबरी मस्जिद बनवाना भी शुरू कर दिया था। तो ये कारण भी नहीं लगता। दूसरा कारण यह हो सकता है जो असदुद्दीन ओवैसी बताने की कोशिश कर रहे हैं। वह कह रहे हैं कि अपने लोगों को ज्यादा से ज्यादा विधानसभा और लोकसभा में भेजो। लेकिन ऐसा होता तो रेजीनगर में मुस्लिम उम्मीदवार को क्यों हराते?
रेज़ी नगर के लोगों को मालूम था कि इस एक उपचुनाव के नतीजे से सरकार पर कोई असर नहीं पड़ने वाला और सरकार को भी मालूम था कि जिस सीट की डेमोग्राफी ऐसी है कि 65 से 70% मुसलमान हैं, वहां हार भी गए तो ऐसा कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आने वाला। भाजपा अगर यहां हार जाती तो कोई बड़ी खबर नहीं बनती,लेकिन उसका जीतना बड़ी खबर है। जीत भी बहुत बड़े अंतर से हुई है। तो डर असल में दूसरा है। पश्चिम बंगाल के मुसलमानों ने देखा कि बांग्लादेशी घुसपैठिये किस तरह से भागे। किस तरह से जो बांग्लादेशी घुसपैठिये और रोहिंग्या यहां रह भी गए वे अपना वोट बनवाने नहीं गए। बड़े पैमाने पर उनका वोट कट गया। उन्होंने देखा कि सीएए तो ममता बनर्जी की तमाम कोशिशों के बावजूद लागू हो गया। पूरी ताकत लगाकर भी वह सीएए को लागू करने से रोक नहीं पाईं। अब एक और डर एनआरसी का है। अब डर है कि वक्फ बोर्ड की जो अवैध रूप से कब्जा की हुई संपत्तियां हैं, उनसे बेदखल होना पड़ेगा। डर इस बात का है कि जमीन पर अवैध कब्जा करके जो मस्जिदें बनाई गई थीं, उनको गिराया जा रहा है। अब एनआरसी से तय होगा कि आप भारत के असली नागरिक हैं या नहीं। भारत में अभी भी बड़ी संख्या में बांग्लादेश से आए हुए मुसलमान हैं, उनके पास हर तरह की आइडेंटिटी भी है। वोटर लिस्ट में अभी भी लाखों की संख्या में ऐसे लोगों के नाम हैं। उनको डर है कि एनआरसी के बाद उनका भी नाम कट जाएगा। अब उनको डर लग रहा है कि प्रदेश कानून के हिसाब से चलेगा। यह जो कांग्रेस फिर सीपीएम और फिर टीएमसी उन्हें बचाती रहीं, अब उनको बचाने वाला कोई नहीं है। लूट, हत्या, बलात्कार, बमबाजी, कट मनी यह सब करने की छूट खत्म हो गई है। डर इस बात का है जो वैकल्पिक धंधा सरकार के प्रोटेक्शन से चलता था, वह खत्म हो रहा है। ये किसी नेता से, किसी पार्टी से, किसी विचारधारा से डर नहीं है। यह डर इस बात का है कि कानून अगर ईमानदारी से लागू होगा तो जो कानून को तोड़कर यहां के नागरिक बने हैं या दूसरी सुविधाएं ले रहे हैं या फिर जमीनों पर कब्जा किया हुआ है, वह सब खत्म होने वाला है। इसी डर ने रेज़ी नगर में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार को जिताया। यह बहुत बड़ा संदेश है। इसने बताया कि सत्ताधारी पार्टी अगर विल पावर दिखाए तो क्या परिवर्तन हो सकता है?
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)