2021 में भाजपा को झटका हिंदू वोट कम होने से लगा था
प्रदीप सिंह।देश में आजादी के बाद से ही मुस्लिम वोट बैंक का वीटो तैयार किया गया। जो मुसलमान हिंदुओं के साथ रहना नहीं चाहते थे और जिन्होंने अपने लिए अलग देश मांगा और ले लिया, उनको रोका गया कि एक वोट बैंक तैयार होगा। लंबे समय तक यह वोट बैंक पहले कांग्रेस और फिर क्षेत्रीय दलों के लिए काम करता रहा,लेकिन 2014 के बाद से भाजपा ने इस मुस्लिम वोट बैंक के वीटो को तोड़ना शुरू कर दिया।
देश में मुस्लिम बहुल तीन राज्यों में पहले नंबर पर जम्मू-कश्मीर, दूसरे पर असम और तीसरे नंबर पर पश्चिम बंगाल आता है। उत्तर प्रदेश में भी मुस्लिम वोट का वीटो लंबे समय तक चलता रहा। भाजपा ने सबसे पहले 2016 में असम में, जहां 33% आबादी मुस्लिम है, इस वीटो को तोड़ दिया और सरकार बना ली। इसके बाद 2017 में उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट के वीटो को खत्म कर दिया। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कहा जाता था कि जिसके साथ मुसलमान होगा, उसकी ही सत्ता होगी। इसीलिए उसे साथ जोड़ने की सपा, बसपा और कांग्रेस में होड़ रहती थी। अब पश्चिम बंगाल तीसरा राज्य बनने जा रहा है, जहां मुस्लिम वोट का वीटो नहीं चलेगा। वहां अभी चुनाव के नतीजे आए नहीं हैं, लेकिन नतीजों के रुझान दिखाई देने लगे हैं।
पश्चिम बंगाल में 2011 की जनगणना के मुताबिक 27.1% मुसलमान हैं। वहां नैरेटिव खड़ा किया गया कि मुसलमान तय करता है कि कौन जीतेगा,कौन हारेगा। एक संस्था है त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डाटा। उसने एक बड़ा ही इंटरेस्टिंग अध्ययन पेश किया है और कहा है कि 2021 के चुनाव का नतीजा मुस्लिम वोटों के आधार पर तय नहीं हुआ। उनका कहना है कि पश्चिम बंगाल में तीन जिले ऐसे हैं जहां मुस्लिम आबादी 50 फ़ीसदी से ज्यादा है। इनमें पहले नंबर पर है मुर्शिदाबाद, जहां बाबरी मस्जिद बनाई जा रही है। वहां मुसलमानों की आबादी 66.27% है। दूसरा जिला है मालदा,जहां मुसलमानों की आबादी 51.27% है और तीसरा जिला है उत्तर दिनाजपुर,जहां करीब 50% मुसलमान हैं। इन तीन जिलों की मुस्लिम आबादी के आधार पर नैरेटिव खड़ा किया जाता है कि पश्चिम बंगाल की 80 से 120 सीटें मुस्लिम वोटर तय करते हैं। इस मिथक को इस स्टडी ने तोड़ा है। इस स्टडी के अनुसार मालदा में विधानसभा की 12 सीटें हैं। उनमें से चार बीजेपी जीती। यह स्टडी आप पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि 2021 का चुनाव भाजपा मुस्लिम कंसोलिडेशन की वजह से नहीं हारी। वह हिंदू वोट कम होने से हारी। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 57% हिंदू वोट मिले और उसने 18 सीटें जीतीं। लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिला हिंदू वोट 7% घटकर 50% पर आ गया। इसीलिए उसे लोकसभा चुनाव की तुलना में इस चुनाव में कम सफलता मिली।

अब आप देखिए ममता बनर्जी के आने के बाद से कैसे राजनीति बदलना शुरू हुई। 2016 में 49% से ज्यादा वोट लेकर टीएमसी को 211 सीटें मिलीं। कांग्रेस को 12.25% वोट मिले और उसको 44 सीटें मिलीं। सीपीएम को 19.75% वोट के साथ 26 सीटें मिलीं। मुस्लिम वोटों के बंटवारे से भी टीएमसी का नुकसान नहीं हुआ। तो यह जो धारणा है कि मुस्लिम वोट अगर बंट जाए तो बीजेपी को फायदा हो जाएगा, ऐसा होता नहीं। 2016 में बीजेपी को 10.16% वोट मिला और सिर्फ तीन विधानसभा सीटें मिली थीं। 2019 में बीजेपी का वोट शेयर बढ़ गया और उसकी लोकसभा सीटें 18 हो गईं, जो 2014 में सिर्फ दो आई थीं। 2019 में 57% हिंदू वोट भाजपा के पक्ष में कंसोलिडेट हुआ था क्योंकि उसको स्पष्ट था कि केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में फिर से भाजपा की सरकार बनने जा रही है। अब मुसलमानों के सामने एक और समस्या है। उनका एकमुश्त टीएमसी को वोट करना उन्हें नुकसान पहुंचा रहा है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में 2016 में 56 मुस्लिम विधायक थे। उस समय टीएमसी ने 56 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे। बाद में टीएमसी को लगने लगा कि मुसलमानों के पास कोई विकल्प नहीं है तो 2021 में उसने सिर्फ 44 मुस्लिम उम्मीदवारों को ही उतारा। नतीजा यह हुआ कि विधानसभा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व घट गया। यह बात मुसलमानों को दिखाई दे रही है। तो सवाल है कि इसका नतीजा क्या होगा? यह स्टडी कहती है इसका नतीजा मालदा और मुर्शिदाबाद में कांग्रेस का रिवाइवल हो सकता है। इन दो जिलों में कांग्रेस के रिवाइवल का मतलब सीधा-सीधा टीएमसी को नुकसान है।
इसके अलावा एसआईआर में 91 लाख से ज्यादा वोट कट चुके हैं। इनमें सबसे ज्यादा घुसपैठिये,फर्जी वोटर थे। इस एसआईआर के कारण ममता बनर्जी को पिछले 15 साल में सबसे बड़ा झटका लगा है। दूसरा जिन वेलफेयर स्कीम्स के कारण ममता बनर्जी की लोकप्रियता है, वे भी सेचुरेशन पॉइंट पर पहुंच गई हैं। एक सीमा के बाद वेलफेयर स्कीम्स का आपको उस तरह से चुनावी लाभ नहीं मिलता। इसका उदाहरण 2024 के लोकसभा चुनाव में दिख चुका है, जब मोदी सरकार को 2019 की तुलना में बड़ा झटका लगा। जबकि 2019 के बाद आई मुफ्त राशन की स्कीम से 81 करोड़ से ज्यादा लोगों को सरकार मुफ्त राशन दे रही है।
तो यह मिथक कि पश्चिम बंगाल में मुसलमान जिसके साथ होगा सरकार उसकी बनेगी, पहली बार टूटने जा रहा है। असम में तो यह तीसरी बार टूटने जा रहा है। इसी गलत धारणा के कारण ममता बनर्जी ने तुष्टीकरण की सारी हदें पार कर दी हैं। उनका मुस्लिम वोटबैंक एक सैचुरेशन पॉइंट पर पहुंच चुका है। 2021 के चुनाव में लगभग 75% मुस्लिम वोट टीएमसी को मिले थे। मैं आपसे अभी कह रहा हूं कि 2026 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी को 75% मुस्लिम वोट नहीं मिलेगा। दूसरी ओर भाजपा का हिंदू वोट बढ़ेगा। 2021 में उससे छिटका 7% हिंदू वोट तो लौटेगा ही,उसमें और भी बढ़ोतरी होने वाली है। पश्चिम बंगाल में जो लोग रहते नहीं थे और जो लोग जीवित नहीं थे,इनका वोट फर्जी तरीके से टीएमसी डलवाती थी,वह भी इस बार नहीं हो पाएगा। बड़ी संख्या में सेंट्रल फोर्सेस का पहुंचना संकेत दे रहा है कि इस बार चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होने जा रहा है। 4 मई को पश्चिम बंगाल बदलेगा, यह मुझे स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



