महिला आरक्षण विधेयक गिराकर यही गलती कर बैठा है विपक्ष।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
मुंशी प्रेमचंद की कहानी कफ़न आपने जरूर पढ़ी होगी। इसमें मुख्य रूप से तीन पात्र हैं। घीसू राम,उसका बेटा माधव और उसकी बहू बुधनी। बुधनी दिन भर मजदूरी करके पैसा कमा कर लाती है, तब पिता-पुत्र खाते हैं। ये दोनों कभी काम नहीं करते। एक दिन बुधनी प्रसव पीड़ा से कराह रही होती है तो पिता-पुत्र उसके इलाज के लिए गांव वालों से पैसा मांग कर लाते हैं और उससे शराब खरीद लेते हैं। दोनों पिता-पुत्र शराब पीते रहते हैं और बुधनी की मौत हो जाती है। उसके बाद दोनों पिता-पुत्र उसके कफ़न के लिए पैसा मांगते हैं और कफ़न बेचकर उससे पूरी सब्जी खाते हैं और परम संतुष्ट हो जाते हैं। उनके जीवन का दर्शन है कि जो दिन भर मेहनत करते हैं,वह भी आधा पेट ही खाते हैं। हम तो कुछ नहीं करते तो कम से कम अपना जांगर (मेहनत) तो बचा लेते हैं। इसी जीवन दर्शन पर भारत का विपक्ष काम कर रहा है।
महिला आरक्षण विधेयक को लेकर 17 अप्रैल को लोकसभा में जो कुछ हुआ वह प्रेमचंद की कहानी के पात्रों पर बिल्कुल सही बैठता है। विपक्ष की हालत वही घीसू राम और माधव वाली है। इस विधेयक का जिन पार्टियों ने विरोध किया उनमें से ज्यादातर वंशवादी पार्टियां हैं। इन पार्टियों के वर्तमान के जो नेता हैं,उनमें से किसी ने मेहनत करके पार्टी को खड़ा नहीं किया। उन्हें राजनीतिक पूंजी विरासत में मिली हुई है। उन्होंने अर्जित नहीं की है। तो उनको संघर्ष करना आता ही नहीं। ये जांगर बचाने वाले संप्रदाय के लोग हैं कि चुनाव में थोड़ी सीटें कम आएंगी तो कोई बात नहीं। ये बिना मेहनत किए तो आ रही हैं। विधेयक को गिराकर इनको लग रहा है कि इन्होंने भाजपा को हरा दिया और ये जीत गए। इनको पता नहीं है कि इन्होंने अपना कितना बड़ा नुकसान किया है। अब यह संघर्ष संसद से निकलकर सड़क पर आ गया है और सड़क पर इनको पता नहीं है कि भाजपा के संगठन की ताकत क्या है। भाजपा का संगठन एक सोया हुआ शेर था। पार्टी के काफी दिन से सत्ता में रहने के कारण वह सो गया था। 2024 के लोकसभा चुनाव में इसका असर दिखा भी। लेकिन ये मेहनत करने वाले लोग हैं। ये मेहनत करके संतुष्ट होते हैं। जबकि इनके विरोधी जांगर बचाने वाले लोग हैं। इसीलिए जैसे ही विधेयक गिरा भाजपा कार्यकर्ता सड़क पर आ गए। सड़क पर इसे लड़ना विपक्ष के बस की बात नहीं है।
इन वंशवादी पार्टियों कांग्रेस,समाजवादी पार्टी,डीएमके और तृणमूल कांग्रेस का जिक्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में भी किया था। हालांकि तृणमूल कांग्रेस को अभी उस तरह से वंशवादी नहीं कहा जा सकता क्योंकि ममता ने अपने दम पर उसे खड़ा किया है,लेकिन अपना वारिस उन्होंने भतीजे अभिषेक बनर्जी को बनाया है,जिन्होंने कोई मेहनत नहीं की है। तो विपक्ष में खाए और अघाए हुए लोग हैं। ये मेहनत करने वाले नहीं हैं। अपने आप कुछ आ जाए, शिकार फंस जाए तो ठीक है। तो कभी सत्ता मिल जाती है। लेकिन 2014 के बाद ऐसी परिस्थितियां बन गई हैं कि सत्ता का सपना देखना भी मुश्किल हो गया है। अब स्थिति यह आ गई है कि अपने विरोधी का नुकसान नहीं कर सकते तो अपना ही नुकसान करके उसकी खुशी मना रहे हैं। शुक्राचार्य ने कहा है कि जब दुश्मन संधि का हाथ बढ़ाए तो उस संधि के पीछे का जो परिणाम है, उसको देखना चाहिए। और याद कीजिए लोकसभा में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इस मुद्दे पर हुई चर्चा का जवाब देते हुए विपक्ष के सामने एक प्रस्ताव रखा कि हम इस संविधान संशोधन विधेयक में एक और संशोधन लेकर आने को तैयार हैं, जिसमें लिखित रूप में यह आश्वासन होगा कि सभी राज्यों की लोकसभा सीटें 50% बढ़ा दी जाएंगी। विपक्ष को समझ में नहीं आया कि यह है क्या? वह एक जाल था। अमित शाह को भी मालूम था कि विपक्ष मानने वाला नहीं है, लेकिन विपक्ष को बाद में पछताना पड़े इसकी व्यवस्था उन्होंने कर दी। सरकार ने जो प्रस्ताव दिया था, इससे बेहतर प्रस्ताव खासकर दक्षिणी राज्यों के लिए हो ही नहीं सकता था। लेकिन विपक्ष रस्सी को सांप समझकर सांप-सांप चिल्लाता रहा कि सरकार महिलाओं को आरक्षण देने के बहाने से डीलिमिटेशन कर रही है।
महिलाओं को आरक्षण देने का फैसला तो 2023 में ही सरकार ने कर लिया था और तभी उसको मालूम था कि यह 2034 से लागू होगा, लेकिन सरकार उसको प्रीपोन करना चाहती थी कि 2029 से लागू हो जाए। विपक्ष को इसमें षड्यंत्र और भाजपा का फायदा नजर आया। भाजपा का फायदा तो 2034 में भी होगा और अब जो विपक्ष ने किया है उसके कारण बिना महिला आरक्षण दिए उसे 2029 में भी फायदा होगा। क्योंकि आप जब किसी को कुछ देते हैं तो उससे आपको जो फायदा मिलता है, उससे ज्यादा फायदा तब मिलता है, जब कोई उस देने की कोशिश को विफल कर दे। विपक्ष ने 2029 से महिलाओं को 33% आरक्षण देने के प्रस्ताव को विफल कर दिया है।
संविधान कहता है कि जिस प्रदेश की आबादी जितनी होगी उसके अनुपात में उसको सीटें मिलेगी। लेकिन 2026 तक के लिए इसे फ्रीज कर दिया गया था। अब यह खत्म हो रहा है यानी अब सरकार संविधान के मुताबिक सीटों की संख्या तय करने के लिए स्वतंत्र है। अभी तक सरकार इसके विपरीत जाकर काम कर रही थी कि आबादी कुछ भी हो लेकिन सीटें सबकी एक बराबर 50% बढ़ेंगी। इतना बड़ा प्रस्ताव विपक्ष ने ठुकरा दिया। साथ ही महिलाओं का अधिकार छीनने का भी पाप अपने सिर पर ले लिया। फिर भी खुश है। उनको मालूम नहीं है कि चीजें मिलती कैसे हैं। उनको लगता है कि खेल में जीतना महत्वपूर्ण नहीं है, खेल बिगाड़ना महत्वपूर्ण है। उनको लगता है बीजेपी का खेल उन्होंने बिगाड़ दिया है। उनको मालूम नहीं है कि बीजेपी हमेशा प्लान बी लेकर चलती है। बीजेपी को पता था कि संसद में किस पार्टी की क्या संख्या है। विपक्ष के सहयोग के बिना यह विधेयक पास नहीं हो पाएगा। लेकिन उसने सोचा कि शायद विपक्ष समझ जाए कि इसको अस्वीकार करने में उसका कितना नुकसान है। दूसरी ओर विपक्ष को लगा कि अगर ये विधेयक गिरा देंगे तो यह पहला विधेयक होगा मोदी सरकार के 12 साल में जो सदन में गिर जाएगा। इससे उनको बड़ा लाभ हो जाएगा। लेकिन हो ठीक उल्टा रहा है। यह विधेयक गिर जरूर गिर गया पर विपक्ष ने अपने को एक्सपोज कर दिया कि वह महिला आरक्षण के पक्ष में है ही नहीं। बात वही है कि जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है। मुझे लगता है कि दिनकर जी की लिखी ये लाइनें विपक्ष ने कभी पढ़ी ही नहीं होंगी। वरना उसने जो काम 17 अप्रैल को किया है, कभी न करते। ये मुंशी प्रेमचंद के घीसू और माधव हैं, जो कफन बेचकर पूरी खाकर खुश हो रहे हैं। उनको लग रहा है कि भाजपा को हरा दिया है। उनको मालूम नहीं है कि कई बार युद्ध जीतने के लिए छोटी लड़ाइयां हारनी पड़ती हैं। बीजेपी ने वही किया है। उसका लक्ष्य 2029, उसके बाद 2034 और उसके बाद तक लोकसभा चुनाव जीतते रहना है। अब उसके पास नैरेटिव गढ़ने की ताकत आ गई है, जो पहले नहीं थी। विपक्ष महिला आरक्षण विरोधी है,यह नैरेटिव वह बड़ी सफलता के साथ लेकर जमीन पर जा रही है। विपक्ष कुछ भी तर्क दे,उससे पूछा जरूर जाएगा कि महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का प्रस्ताव क्यों गिरा दिया? इसका जवाब विपक्ष के पास नहीं है और यह युद्ध अभी आने वाले दिनों में और तेज होने वाला है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)