पुराणों में छिपी कहानियां ।

पूनम भारद्वाज।

हमारी संस्कृति में गुरु, माता-पिता और श्रेष्ठजनों के सम्मान को जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति कहा गया है। अहंकार और पद का मद मनुष्य की बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है, जिससे उसका वैभव, सम्मान और सुख नष्ट हो सकता है। देवराज इन्द्र जैसे शक्तिशाली देवता को भी गुरु-अवमानना का दुष्परिणाम भुगतना पड़ा। 

हमारे पौराणिक ग्रंथों में यह कहा गया है कि संकट के समय बुद्धिमानी, विनम्रता और सहयोग का मार्ग अपनाना चाहिए। देवताओं और दैत्यों ने आपसी वैर भुलाकर समुद्र-मंथन किया, तभी चौदह रत्न प्राप्त हुए। अर्थात् सामूहिक प्रयास और सद्भाव से ही बड़े कार्य सिद्ध होते हैं। इन्द्र और देवगुरु बृहस्पति की इस कथा का भी यही सार है।

एक समय की बात है। देवराज इन्द्र अपनी सुधर्मा सभा में बैठे थे। सम्पूर्ण लोकपाल और ऋषि भी उस सभा की शोभा बढ़ा रहे थे। उसी समय देवगुरु बृहस्पति अपने शिष्यों के साथ सभा में पधारे। उन्हें आया देखकर देवताओं ने उनके चरणों में मस्तक झुकाया। इन्द्र ने भी देखा, किंतु राजमद से दूषित बुद्धि के कारण उसने गुरु के प्रति न आदरयुक्त वचन कहे और न ही बैठने को आसन दिया। अपना अपमान होते देख देवगुरु बृहस्पति कुपित होकर वहां से अन्तर्धान हो गए।

कुछ समय पश्चात इन्द्र सचेत हुए तो पूछा – “महातपस्वी गुरु कहां चले गए?”

तब नारद जी बोले – “बलसूदन! आपके द्वारा गुरु की अवहेलना हुई है, अतः आप सब प्रकार से प्रयत्न करके गुरु से अपने अपराध के लिए क्षमा-प्रार्थना कीजिए।”

इन्द्र की वह करतूत जब पाताल निवासी राजा बलि ने सुनी, तो वे इन्द्र की नगरी अमरावती पर सेना लेकर चढ़ आए। राजा बलि ने सभी देवताओं को परास्त कर दिया और पाताल लोक को चले गए। इन्द्र के सारे रत्न अपने अधिकार में कर लिए। इन्द्र की राज्यलक्ष्मी नष्ट हो चुकी थी, इसलिए देवताओं ने भी उनका त्याग कर दिया। वहीं, ऐरावत नामक महान गजराज तथा उच्चैःश्रवा अश्व आदि जो बहुत से रत्न थे, वे दैत्यों के अधिकार में न रहकर समुद्र में प्रवेश कर गए, क्योंकि पुण्यात्मा पुरुष ही उनका उपभोग कर सकते थे।

ब्रह्मा जी के समझाने पर इन्द्र भगवान विष्णु के पास गए। साथ में ब्रह्मा जी भी गए और भगवान विष्णु से बोले – “देव जगन्नाथ! गुरु-अवहेलना के कारण इन्द्र इस समय ऋषियों समेत स्वर्ग के राज्य से भ्रष्ट हो चुके हैं, इसलिए इनका उद्धार कीजिए।”

यह सब सुनकर श्रीभगवान बोले – “देव! गुरु की अवहेलना करने से सारा अभ्युदय नष्ट हो जाता है। जो केवल विषयों में ही रचे-पचे रहते हैं और जिनके द्वारा अपने माता-पिता की निंदा होती रहती है, वे निस्संदेह बड़े भाग्यहीन हैं। इस इन्द्र ने जो किया, उसका फल इसे तत्काल प्राप्त हो गया। बुद्धिमान पुरुष अपने सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्धि के लिए अन्य प्राणियों के साथ मैत्री करते हैं। अतः इन्द्र! तुम्हें इस समय अपना काम बनवाने के लिए दैत्यों के साथ मेल-जोल कर लेना चाहिए।”

भगवान की आज्ञा मानकर इन्द्र राजा बलि के पास गए। राजा बलि ने इन्द्र को अपनी शरण में आया हुआ जानकर बड़े सम्मान के साथ उनका स्वागत-सत्कार किया। कुछ दिन बीत जाने पर इन्द्र ने बलि से कहा – “जो नाना प्रकार के रत्न तुम्हें प्राप्त होने योग्य हैं, वे सभी समुद्र में गिरे पड़े हैं। तुम्हारे कार्य की सिद्धि के लिए हमें समुद्र-मंथन करना चाहिए।”

उसी समय आकाशवाणी हुई⁹- “देवताओं और दैत्यों! तुम क्षीरसागर का मंथन करो। इस कार्य से तुम्हारे बल की वृद्धि होगी, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।”

इस प्रकार देवताओं और दैत्यों ने मिलकर समुद्र-मंथन करने की ठान ली। फिर समुद्र-मंथन से लक्ष्मी, ऐरावत सहित 14 रत्न निकले।