तमिलनाडु की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में भाजपा का सबसे आक्रामक और चर्चित चेहरा रहे के. अन्नामलाई ने आखिरकार पार्टी से दूरी बना ली है। पूर्व IPS अधिकारी से राजनीति में आए अन्नामलाई का भाजपा छोड़ना केवल एक नेता का इस्तीफा नहीं, बल्कि दक्षिण भारत में भाजपा की रणनीति, नेतृत्व संकट और गठबंधन राजनीति पर बड़ा सवाल भी है। सूत्रों के मुताबिक, भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है और अब अन्नामलाई जल्द ही अपने नए राजनीतिक या सामाजिक आंदोलन की घोषणा कर सकते हैं।
तमिलनाडु भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने पार्टी से अलग होकर राज्य की राजनीति में नई दिशा की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। भाजपा अध्यक्ष को इस्तीफा सौंपने के बाद अब अन्नामलाई के अगले कदम पर पूरे दक्षिण भारत की राजनीति की नजर टिक गई है। माना जा रहा है कि वे ‘राष्ट्रवादी-तमिल दर्शन’ आधारित एक नए सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन की शुरुआत कर सकते हैं, जो आगे चलकर राजनीतिक दल का रूप भी ले सकता है।
पूर्व IPS अधिकारी अन्नामलाई ने 2020 में भाजपा जॉइन की थी। बेहद कम समय में उन्होंने तमिलनाडु भाजपा को नई ऊर्जा दी और पार्टी के सबसे बड़े चेहरे बनकर उभरे। 2021 में उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद उन्होंने ‘एन मन्न, एन मक्कल’ पदयात्रा, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान और द्रमुक सरकार के खिलाफ लगातार आक्रामक राजनीति के जरिए खुद को एक जननेता के रूप में स्थापित किया। सोशल मीडिया से लेकर युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता लगातार बढ़ती गई।
लेकिन भाजपा और अन्नामलाई के बीच मतभेद भी धीरे-धीरे सतह पर आने लगे। सबसे बड़ा विवाद अन्नाद्रमुक (AIADMK) के साथ भाजपा के गठबंधन को लेकर था। अन्नामलाई लगातार इस गठबंधन के विरोध में रहे। उनका मानना था कि भाजपा को तमिलनाडु में स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनानी चाहिए। सूत्रों के अनुसार, उन्होंने पार्टी नेतृत्व को आंकड़ों के साथ यह भी बताया कि गठबंधन के कारण भाजपा को अपेक्षित राजनीतिक लाभ नहीं मिला।
दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह, संगठन महासचिव बीएल संतोष और शीर्ष नेतृत्व के साथ उनकी हालिया बैठकों में भविष्य की भूमिका पर चर्चा हुई। भाजपा नेतृत्व उन्हें राष्ट्रीय राजनीति या राज्यसभा के जरिए दिल्ली लाना चाहता था, लेकिन अन्नामलाई तमिलनाडु की राजनीति में सक्रिय भूमिका चाहते थे। बताया जाता है कि उनकी कई राजनीतिक और संगठनात्मक मांगों को भी पार्टी ने स्वीकार नहीं किया। इसके बाद उन्होंने अलग रास्ता चुनने का निर्णय लिया।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अन्नामलाई का जाना भाजपा के लिए कई स्तरों पर चुनौती बन सकता है। पिछले चार-पांच वर्षों में वे तमिलनाडु में भाजपा का सबसे प्रमुख चेहरा बन चुके थे। युवाओं, शहरी मध्यम वर्ग और सोशल मीडिया पर उनकी मजबूत पकड़ थी। ऐसे में उनके बाहर जाने से भाजपा की युवा अपील कमजोर पड़ सकती है। साथ ही, द्रमुक विरोधी राजनीति में भाजपा की आक्रामकता भी प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, भाजपा को होने वाला नुकसान पूरी तरह एकतरफा नहीं माना जा रहा। तमिलनाडु में भाजपा का एक वर्ग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के आधार पर भी पार्टी के साथ जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, अन्नाद्रमुक जैसे सहयोगियों के साथ गठबंधन भाजपा को संगठनात्मक आधार बनाए रखने में मदद कर सकता है।
अन्नामलाई की राजनीतिक यात्रा भी बेहद दिलचस्प रही है। 2011 में कर्नाटक कैडर के IPS अधिकारी बने अन्नामलाई ने अपनी सख्त और ईमानदार छवि से पहचान बनाई। 2019 में उन्होंने पुलिस सेवा से इस्तीफा दिया और 2020 में भाजपा में शामिल हुए। 2021 में तमिलनाडु की अरावकुरिची सीट से विधानसभा चुनाव लड़ा, हालांकि हार गए। इसके बावजूद, उन्होंने संगठन विस्तार और जनसंपर्क अभियान जारी रखा। 2024 में कोयंबटूर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और हार का सामना किया, लेकिन राज्य की राजनीति में उनका प्रभाव लगातार बना रहा।
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 में भाजपा के कमजोर प्रदर्शन और अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके के उभार ने भी राज्य की राजनीति का समीकरण बदल दिया। ऐसे समय में अन्नामलाई का भाजपा से अलग होना दक्षिण भारत में भाजपा की रणनीति के लिए गंभीर चुनौती माना जा रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अन्नामलाई केवल एक सामाजिक आंदोलन तक सीमित रहेंगे या तमिल अस्मिता और राष्ट्रवादी राजनीति के मिश्रण के साथ नया राजनीतिक विकल्प तैयार करेंगे। यदि ऐसा होता है तो तमिलनाडु की राजनीति में आने वाले वर्षों में एक नया ध्रुव उभर सकता है।








