गलतफहमी और अति महत्वाकांक्षा राजनीतिक कॅरियर पर ग्रहण न लगा दे।
के. अन्नामलाई की भारतीय जनता पार्टी से विदाई हो गई। उन्होंने दो-तीन दिन पहले इस्तीफा दिया था,जिसे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने मंजूर कर लिया। इसके बाद अन्नामलाई ने एक छोटा सा भाषण दिया और उसमें वह वही सब बातें बोले जो नई पार्टी शुरू करने वाला बोलता है। उन्होंने कहा कि हम तमिल कल्चर को बचाते हुए नेशनलिस्ट पॉलिटिक्स करेंगे। अब सवाल यह है कि वह बीजेपी में क्या कर रहे थे?
अन्नामलाई आईपीएस की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए थे। उनको दिखा कि तमिलनाडु में सबसे अच्छा विकल्प भाजपा है, जिसके बढ़ने की बहुत संभावना है तो उसमें शामिल हो गए। लेकिन कुछ लोगों की महत्वाकांक्षा ऐसी होती है कि गलतफहमी पैदा कर देती है। भाजपा ने उनको प्रदेश अध्यक्ष बनाया और फ्री हैंड दिया। 2024 का लोकसभा चुनाव तमिलनाडु में अन्नामलाई के नेतृत्व में लड़ा गया। जो उन्होंने कहा, वह किया गया, लेकिन भाजपा एक भी सीट नहीं जीत पाई। अन्नामलाई खुद अपनी कोयंबटूर की सीट नहीं जीत पाए, जिसके बारे में कहते हैं कि वहां उनकी जड़ें बड़ी गहरी हैं। इसी बीच एक और चीज हुई। अन्नामलाई के कहने पर ही भाजपा ने लोकसभा का चुनाव अकेले दम पर लड़ने का फैसला किया था और राज्य में किसी दल से अलायंस नहीं किया। अन्नामलाई का कहना था कि अपने बल पर पार्टी का संगठन खड़ा करना चाहिए जो कि ठीक बात भी है, किंतु उसके लिए जमीन पर काम करना पड़ता है। लेकिन अन्नामलाई ने क्या किया? वह चुनाव के बीच में मई में एक कार्यक्रम में भाग लेने दिल्ली चले गए। दिल्ली में ब्रिटिश फॉरेन ऑफिस फंडेड लीडरशिप को ग्रो करने का एक प्रोग्राम चलता है। उसमें भारत में जो भविष्य के नेता हो सकते हैं, ब्यूरोक्रेट्स,एनजीओस के हेड और इस तरह के अन्य लोगों की ग्रूमिंग की जाती है। इनको ऑक्सफोर्ड में ट्रेनिंग दी जाती है। लोकसभा चुनाव के बाद अन्नामलाई लंदन चले गए। वह सितंबर में गए और 12 हफ्ते के प्रोग्राम के बाद दिसंबर में लौट कर आए। ब्रिटेन का यह प्रोग्राम चलने का मकसद भारत में अपने लोग तैयार करना है। अंग्रेज भारत से चले गए लेकिन उनका जो कम्युनिकेशन का सिस्टम है उनके जो लोग हैं, उनको तैयार करने का कार्यक्रम अब भी चल रहा है। अब इसमें आप यह मत खोजिए कि अन्नामलाई किसी विदेशी शक्ति के एजेंट हैं, लेकिन इससे उनकी राजनीतिक समझ का पता चलता है। वह दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे। उनको इस बात का जरा भी अफसोस नहीं हुआ कि पार्टी को हमने अलायंस नहीं करने दिया। अकेले लड़ने के लिए मनाया और खुद चुनाव के बीच दिल्ली चले आए। उन्होंने इस बात पर भी अफसोस नहीं जताया कि हम पार्टी को एक भी सीट नहीं जिता पाए।
अब अन्नामलाई के बहुत सारे समर्थक उनके बारे में ऐसी बातें कह रहे हैं जैसे वह कोई सुपरस्टार हों। वह ऊपर से उतर कर तमिलनाडु में बीजेपी का उद्धार करने के लिए आए थे और चले जाएंगे तो बीजेपी डूब जाएगी। तमिलनाडु में वैसे भी बीजेपी का कुछ नहीं था। आज भी बीजेपी वहां फ्रिंज प्लेयर है। तो भाजपा पर उनके जाने से कोई खास असर नहीं पड़ने वाला है। अन्ना मलाई के कुछ समर्थक जो भाजपा में आए होंगे वे हो सकता है कि जरूर चले जाएं। भाजपा एक कैडर बेस्ड पार्टी है। अन्नामलाई को मालूम नहीं है कि भाजपा में कल्ट की पॉलिटिक्स नहीं चलती। जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे बलराज मधोक को पार्टी से निकाल दिया गया था, लेकिन पार्टी पर कोई असर नहीं पड़ा। उत्तर प्रदेश के भाजपा के पहले मुख्यमंत्री और बहुत लोकप्रिय नेता कल्याण सिंह ने पार्टी छोड़ दी लेकिन कोई असर नहीं पड़ा। उत्तर प्रदेश में पार्टी लगातार दूसरी बार सत्ता में है और 27 में तीसरी बार आएगी। मध्य प्रदेश में उमा भारती ने पार्टी छोड़ दी पर पार्टी खत्म नहीं हुई। गुजरात में शंकर सिंह वाघेला और केशु भाई पटेल ने पार्टी छोड़ी पर कोई असर नहीं हुआ। अन्नामलाई का तो वैसे भी तमिलनाडु में या भाजपा में इन नेताओं जैसा कद नहीं था। उनके समर्थक आजकल जोर शोर से एक डाटा कोट कर रहे हैं कि अन्नामलाई ने लोकसभा चुनाव में पहली बार भाजपा का वोट शेयर 11% से ऊपर पहुंचा दिया था, जो विधानसभा चुनाव में घटकर 3% पर आ गया। लेकिन यह एक पक्ष है, यह पूरा सच नहीं है। सवाल यह है कि भाजपा 2024 से पहले कब तमिलनाडु की 39 में से 23 लोकसभा सीटों पर लड़ी थी। पार्टी को 11% वोट 23 लोकसभा सीटों पर लड़कर मिला था। विधानसभा चुनाव में भाजपा एआईएडीएमके से अलायंस करके केवल 27 सीटों पर लड़ी थी। 23 लोकसभा सीटों में के तहत जो विधानसभा सीटें आती हैं उनका संख्या 138 होती है। तो बात ऐसे बताई जा रही है कि जैसे बहुत बड़ा क्रांतिकारी परिवर्तन हो गया।
अब सवाल यह भी उठ रहा है कि अन्नामलाई चाहते क्या थे? पहले खबरें आ रही थीं कि वह सब सेटल करना चाहते थे। वह पार्टी से 7 या 10 साल का फ्री हैंड चाहते थे। मतलब यह कि पार्टी तमिलनाडु की यूनिट उनको आउटसोर्स कर दे और फिर वह जैसे चाहें पार्टी को चलाएं। यह किसी भी पार्टी में नहीं हो सकता और कैडर बेस्ड पार्टी में तो कभी नहीं हो सकता। फिर कहा गया कि वह पार्टी हाईकमान की इजाजत लेकर अपना नया राजनीतिक रास्ता तलाशना चाहते हैं। यह वैसे ही है जैसे कोई व्यक्ति कहे कि मैं अपनी पहली पत्नी के कंसेंट से दूसरी शादी कर रहा हूं। इससे बड़ा फ्रॉड और क्या हो सकता है? अन्नामलाई की कहानी भारतीय जनता पार्टी में 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद ही खत्म हो गई थी। विधानसभा चुनाव में उनको प्रचार के लिए पार्टी ने हेलीकॉप्टर दिया, लेकिन वह प्रचार के लिए गए ही नहीं। उनके ऊपर और बहुत सारे आरोप हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान पार्टी की ओर से कैंडिडेट्स के लिए जो पैसा भेजा गया था, वह पहुंचा ही नहीं। अभी उन्होंने घोषणा की है कि वह एक संस्था चलाएंगे। 2020 में उन्होंने एक सोशल मीडिया प्लेटफार्म बनाया था, उसको रिवाइव कर रहे हैं। उनको राजनीति में आना है, लेकिन वह कह रहे हैं कि 4-6 महीने का समय लगेगा। उसके बाद पॉलिटिकल पार्टी बनाने का फैसला करेंगे। तमिलनाडु जैसे बड़े राज्य में पार्टी का संगठन खड़ा करने और चुनाव लड़ने के लिए कम से कम से कम डेढ़ से दो हजार करोड़ रुपये की जरूरत होती है। अन्नामलाई के पास पैसा कहां से आएगा? इसका मतलब है कि कोई और दे रहा है। लेकिन वह कौन है? अब इसके साथ एक दूसरा फैक्ट जान लीजिए। पिछले चार साल में तमिलनाडु के एनजीओस को 6395 करोड़ रुपये की विदेशी फंडिंग आई है। मैं यह नहीं कह रहा हूं कि यह पैसा अन्नामलाई को मिलने वाला है। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर जो फंडिंग आई है,उसका इस्तेमाल इस देश के विकास के लिए तो नहीं होने वाला है। उसका इस्तेमाल इस देश में सबवर्जन के लिए या कोई ऐसी पॉलिटिकल फोर्स खड़ी करने के लिए हो सकता है, जो भारत विरोधी हो।
अन्ना मलाई को लगता है कि उन्होंने जो स्पेस क्रिएट किया, उसका फायदा जोसेफ विजय ने उठा लिया। उनको यह बात समझ में नहीं आती कि जोसेफ विजय लंबे समय से तमिल फिल्मों में हैं। वह सुपरस्टार हैं। उनके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी। उसके अलावा चर्च की ओर से उनको मदद मिल रही थी। अन्नामलाई दरअसल भाजपा की जो मूल विचारधारा है, उससे सहमत कभी नहीं थे। उनका कहना है कि तमिलनाडु में हिंदुत्व की राजनीति नहीं चलेगी। अभी कुछ साल पहले तक पश्चिम बंगाल के बारे में भी तमाम बड़े-बड़े विशेषज्ञ यही कहते थे। वहां हिंदुत्व की राजनीति ऐसी चली कि 30% मुस्लिम आबादी होने के बावजूद भाजपा को 208 सीटें मिल गईं। कौन सी राजनीति चलेगी यह अन्नामलाई नहीं, तमिलनाडु की जनता तय करेगी। अन्नामलाई पार्टी बना रहे हैं, उनको शुभकामना देनी चाहिए। लेकिन उनको बड़ी गलतफहमी है। वह अपनी महत्वाकांक्षा में फंसे हुए हैं। दरअसल अन्नामलाई के साथ समस्या यह है कि वह किसी खांचे में फिट नहीं होते। वह न तो हिंदुत्ववादी खांचे में फिट होते हैं और न द्रविड़ियन राजनीति के खांचे में फिट होते हैं। वह दोनों का विरोध करते हैं। वह राष्ट्रीयता की राजनीति की बात कर रहे हैं, लेकिन थ्री लैंग्वेज फार्मूला का विरोध करते हैं। आने वाले समय में देखिए वह और किस-किस चीज का विरोध करते हैं। अन्नामलाई को कुछ ही सालों में ऐसा लगने लगा कि वह तमिलनाडु में भाजपा के संगठन से बड़े हो गए हैं। राजनीति का कोई अनुभव न होने के बावजूद भाजपा ने उनको प्रदेश अध्यक्ष बना दिया क्योंकि वह बहुत अच्छे कम्युनिकेटर हैं। उन्होंने जो 200 किलोमीटर की यात्रा की, उसमें बहुत से लोगों को जोड़ा। लग रहा था कि वह एक लोकप्रिय नेता बन सकते हैं। लेकिन अन्नामलाई अगर यही यात्रा भाजपा से अलग होकर करेंगे आप देखिएगा कि कितने लोग जुड़ते हैं। तो संगठन का साथ होना और संगठन के बिना इन दोनों परिस्थितियों में बहुत अंतर होता है। यह अन्नामलाई को अब पता चलेगा। अब अगर वह हेलीकॉप्टर से प्रचार करते हैं तो सवाल पूछे जाएंगे कि हेलीकॉप्टर का किराया कहां से आ रहा है? जब तक भाजपा में थे यह सब सवाल नहीं पूछा जाता क्योंकि पार्टी के पास संसाधनों की कोई कमी नहीं थी। तो तमिलनाडु में बीजेपी आगे बढ़ेगी या नहीं बढ़ेगी, यह अलग प्रश्न है। वैसे मेरा मानना है कि अगले 5 साल में वहां भाजपा की स्थिति पश्चिम बंगाल जैसी होने वाली है। लेकिन सवाल यह है कि अन्नामलाई का क्या होगा? राजनीति में बहुत से लोग बड़े-बड़े सपने लेकर आए और ठोकर खाकर चले गए। मुझे तो उनका भविष्य उसी तरह का दिखाई दे रहा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









