फॉर्म–6 को लेकर विपक्ष के विरोध का रहस्य उजागर।
देश में इस समय एक अजीब खेल चल रहा है। विपक्ष और कुछ अन्य तत्व आधे सच को पूरा सच बताने की कोशिश कर रहे हैं ताकि उनका पूरा झूठ छिपा रहे।
बीते दिनों एक अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने एक खबर छापी, जिसका सार था कि कई मुद्दों पर दोनों चुनाव आयुक्तों की राय मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से अलग थी। अब ये किसी भी संस्था में होता है, लेकिन अखबार ने यह सच्चाई छिपा ली कि आखिर में फैसला कैसे हुआ? चुनाव आयोग में फैसला दो ही तरीके से हो सकता है, आम सहमति या बहुमत से। अखबार ने यह बात नहीं बताई कि फैसला बहुमत से हुआ या आम सहमति से हुआ या कोई फैसला नहीं हुआ और मुख्य चुनाव आयुक्त ने मनमानी की तो बाकी दोनों चुनाव आयुक्त क्या कर रहे थे? अब उस अखबार के बारे में भाजपा नेता महेश जेठमलानी ने एक्स पर एक पोस्ट की है, जिसमें कहा है कि पश्चिम बंगाल के चुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी से इंडियन एक्सप्रेस को 81 लाख रुपये मिले थे और उसके वाउचर लगा दिए गए। अखबार ने अभी तक इसका कोई जवाब नहीं दिया है कि ये पैसा किस लिए मिला था? विज्ञापन था या कुछ और था? तो अगर आप सवाल पूछते हैं तो आपसे भी सवाल पूछा जाएगा। अब राहुल गांधी और उनके साथी दलों के नेता इसी खबर को लेकर हंगामा मचा रहे हैं कि इलेक्शन कमीशन में एकतरफा फैसले हो रहे हैं। ज्ञानेश कुमार की मनमानी चल रही है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में गया तो सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा कि फॉर्म सिक्स में किसी भी परिवर्तन की इजाजत हमने नहीं दी है। अब देखिए फिर से आधे सच की बात हो रही है। यह बात बिल्कुल सही है कि सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म सिक्स में किसी परिवर्तन की मंजूरी नहीं दी, लेकिन फॉर्म सिक्स का मामला तो सुप्रीम कोर्ट के सामने कभी गया ही नहीं। तो मंजूरी देने या न देने का प्रश्न ही कहां उठता है? दूसरी बात, उसी सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम इलेक्शन कमीशन के रिकॉर्ड को देखेंगे कि क्या परिवर्तन हुआ है। चुनाव आयोग ने जब एसआईआर शुरू की तो फॉर्म सिक्स के साथ एक डिक्लेरेशन नत्थी करने को कहा था। फॉर्म सिक्स में उसको जोड़ा नहीं। इस डिक्लेरेशन फॉर्म में सिर्फ तीन सवाल पूछे गए। क्या 2003 में जो एसआईआर हुई थी उसकी मतदाता सूची में आपका नाम था, क्या आपके माता-पिता का नाम था और क्या आपके दादा—दादी का नाम था? इन सवालों के जवाब में हां या नहीं पर टिक करना था और फॉर्म सिक्स के साथ नत्थी करके जमा कर देना था। कोई डॉक्यूमेंट या कोई स्टेटमेंट या कोई एफिडेविट नहीं देना था। अगर चुनाव आयोग ने इस डिक्लेरेशन में जो तीन सवाल पूछे गए हैं, उनको फॉर्म सिक्स में शामिल कर दिया होता तब यह होता कि फॉर्म सिक्स में बदलाव कर दिया गया है,लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया।
देश में फॉर्म सिक्स का प्रोविजन 1960 से शुरू हुआ था। कोई भी योग्य मतदाता, यानी जो 18 साल या उससे ऊपर का हो और भारत का नागरिक हो, मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराने के लिए इस फॉर्म को भरकर जमा कर सकता है। फॉर्म सिक्स को लेकर कभी कोई विवाद नहीं हुआ। अब आरोप लगाया जा रहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने फॉर्म सिक्स में बदलाव कर दिया। इसे बदलने का अधिकार न तो सरकार के पास, न इलेक्शन कमीशन के पास और न ही सुप्रीम कोर्ट के पास है। केवल संसद के पास है। इसलिए देखिए फिर आधी बात कही जा रही है कि फॉर्म सिक्स में बदलाव का अधिकार सरकार के पास है, जो कि नहीं है। फॉर्म सिक्स जैसे पहले था, वैसे ही अब भी है। आर्टिकल 324 चुनाव आयोग को मतदाता सूची तैयार करने और उसके पुनरीक्षण का अधिकार देता है। आर्टिकल 325 संसद को मतदाता सूची से संबंधित कानून बनाने का अधिकार देता है। सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई में ये बातें स्पष्ट हो जाएंगी। अब सवाल है कि इस फॉर्म सिक्स को लेकर विपक्ष इतना हल्ला क्यों मचा रहा है, उसे इतनी परेशानी क्यों है? दरअसल विपक्ष की परेशानी फॉर्म सिक्स को लेकर नहीं डिक्लेरेशन को लेकर है। इस डिक्लेरेशन का नतीजा यह हुआ कि 3 करोड़ लोग अनुपस्थित हो गए। वे इस बात से डर से गए कि इस डिक्लेरेशन को भरना पड़ेगा और बताना होगा कि ये कौन थे? दरअसल ये बांग्लादेशी घुसपैठिए और रोहिंग्या थे। चुनाव आयोग किसी की नागरिकता तय नहीं कर सकता। वह केवल नागरिकता के बारे में पूछ सकता है कि आप भारत के नागरिक हैं या नहीं। तो रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को मतदाता सूची से निकालने का चुनाव आयोग ने यह बहुत ही आसान सा रास्ता चुना और उसका नतीजा यह हुआ कि तीन करोड़ तो भाग लिए या भारत छोड़कर बांग्लादेश चले गए। पश्चिम बंगाल में चुनाव से पूर्व आपने बांग्लादेश सीमा पर इसी के कारण लंबी—लंबी लाइनें देखीं थीं। डिक्लेरेशन के डर से उन्होंने मतदाता सूची में अपना नाम फिर से जुड़वाने की कोशिश भी नहीं की क्योंकि उनको मालूम था कि कोशिश की और पकड़े गए तो फिर डिटेन और डिपोर्ट किए जाएंगे। उसके अलावा छह करोड़ से ज्यादा लोग ऐसे हैं जो स्थाई रूप से स्थानांतरित हो चुके हैं। अब इनमें भी कुछ ऐसे हो सकते हैं जो घुसपैठिए थे। ये अलग-अलग राज्यों में घूमते रहते हैं। एक पूरा नेटवर्क है जो इनको अलग-अलग राज्यों में बसाता है।
तो ये बांग्लादेशी घुसपैठिए और म्यांमार से आए हुए रोहिंग्या जिनको—जिनको वोट देते थे, उनकी तकलीफ बहुत ज्यादा है। यह सारा हंगामा इसीलिए हो रहा है। ये जो फॉर्म सिक्स का रहस्य है, वह यही है कि हाय,बांग्लादेशी घुसपैठिए और रोहिंग्या तो मतदाता सूची से बाहर हो गए, अब हमें वोट कौन देगा? अब हम कैसे सत्ता में आएंगे? इसलिए आप देखिए कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक के बाद जो चार्टर जारी किया गया है, उसमें पुरानी मतदाता सूची को रिवाइव करने की मांग की गई है। पुरानी मतदाता सूची को रिवाइव करने का मतलब है कि जो लोग इस दुनिया में नहीं हैं, उनका भी नाम मतदाता सूची में आए। जो इस देश के नागरिक नहीं हैं, उनका भी नाम आए। जो डुप्लीकेट वोटर हैं, उनका भी नाम आए। तो ये वोटर किसको वोट देते थे? इसका फायदा किसको मिलता था? जाहिर है कि जिसको मिलता था, उसी को दर्द हो रहा है। तो विपक्ष का दर्द यह नहीं है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण हो रहा है। उसे दर्द है कि ये जो बांग्लादेशी घुसपैठिये और रोहिंग्या मतदाता सूची से बाहर हो गए। ये लोग भाजपा को वोट देते नहीं थे। कांग्रेस, टीएमसी समेत जिन विपक्षी दलों को ये वोट देते थे उनको लग रहा है कि हमारी दुनिया लुट गई। विपक्ष चाहता है कि फिर से इनको मतदाता सूची में डाला जाए। तो यह फॉर्म सिक्स का विरोध बहाना है। फॉर्म सिक्स में चुनाव आयोग ने कोई परिवर्तन किया ही नहीं है। यह 1960 में जैसा बना था, वैसा ही है। केवल वह डिक्लेरेशन जोड़ने की बात कही गई थी और यह काम लगभग पूरा हो गया है। चुनाव आयोग ने घोषणा कर दी है कि डिक्लेरेशन को हटा रहे हैं। अब विरोध करने का कोई आधार बचा नहीं। चुनाव आयोग पर हमला करके दुनिया की कोई पार्टी चुनाव नहीं जीत सकती। पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी में चुनाव जीतने का एक ही तरीका है— जनता का विश्वास। और वह इस समय विपक्ष के पास नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)










