सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन मामले पर टिप्पणी कई सवाल खड़े कर रही ।
अगर कोई चुनी हुई सरकार रास्ता भटक जाए तो हमारे—आपके पास उसे बदलने के लिए वोट का अधिकार है,लेकिन अगर कोई संवैधानिक संस्था,जो चुनकर नहीं आती पर सबसे ज्यादा ताकतवर है,अपनी लक्ष्मण रेखा भूल जाए तो फिर देश और देश की न्याय प्रणाली का क्या होगा?
एक नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ है। इसका नाम पिछले दिनों बड़ी चर्चा में रहा। यहां डिग्री बांटने के लिए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को बुलाया गया, लेकिन वहां के छात्रों ने विद्रोह कर दिया और कहा कि हम उनसे डिग्री नहीं लेंगे। उसी संस्थान में पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज जस्टिस भुइयां पहुंचे और वहां उन्होंने जो कुछ बोला, वह सवाल उठाता है कि क्या एक सिटिंग जज को इस तरह से बोलने का अधिकार है। जिस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की सीजीआई की अध्यक्षता वाली बेंच सुनवाई कर रही हो,उस पर सुनवाई से एक दिन पूर्व जस्टिस भुइयां ने जो कुछ बोला उसे क्यों न माना जाए कि वह कोर्ट को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे? उसे क्यों नहीं माना जाए कि वह उन तत्वों का साथ दे रहे थे,जो देश की संवैधानिक संस्थाओं का विरोध कर रहे हैं। उस कार्यक्रम में जस्टिस भुइयां ने सिर्फ एसआईआर शब्द का इस्तेमाल नहीं किया, लेकिन जो कुछ कहा सब एसआईआर के खिलाफ था। यह जानते हुए कि सुप्रीम कोर्ट ने जब बिहार में एसआईआर शुरू हुई तभी कहा था कि यह प्रक्रिया संविधान सम्मत है और चुनाव आयोग को इसका अधिकार है। जस्टिस भुइयां ने कहा कि अगर आप लाखों लोगों का नाम काटकर उनको मतदान से वंचित कर देते हैं तो इस बात को कोई भी अदालत कैसे स्वीकार कर सकती है। यानी वह सीजीआई को कह रहे हैं कि आप यह स्वीकार नहीं कर सकते। एक तरह से वह उनको निर्देश दे रहे हैं कि एसआईआर के द्वारा जो किया गया है उसको आप निष्प्रभावी कीजिए। जस्टिस भुइयां का कहना है कि जिन लोगों के नाम काटे गए हैं, उनमें से जो लोग इस दुनिया में नहीं है उनको छोड़ दीजिए, लेकिन बाकी सबको नोटिस देकर सुनवाई का मौका देना चाहिए था। अब यह बात तो बिना तथ्यों के कोई छोटा वकील भी नहीं बोलेगा। और ऐसा नहीं है कि जस्टिस भुइयां को यह तथ्य मालूम न होगा। जानते हुए अगर वह बोल रहे हैं तो इसका मतलब है कि वह एक नैरेटिव को बढ़ावा दे रहे हैं। अब जरा तथ्यों पर गौर कर लीजिए। अभियान यह चलाया जा रहा है कि 13 करोड़ लोगों के नाम मतदाता सूची से काट दिए गए हैं। इनमें से दो करोड़ 80 लाख ऐसे लोगों के नाम कटे हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। तीन करोड़ ऐसे लोग हैं जो जहां रहते थे, वहां पाए नहीं गए और कहां हैं इसके बारे में किसी को जानकारी नहीं है। छह करोड़ 30 लाख लोग ऐसे हैं जो पहले जिस स्थान पर रहते थे, उसको छोड़कर कहीं और बस गए हैं। जाहिर है कि वे वहां वोटर बन गए होंगे। एक करोड़ नाम ऐसे थे जो डुप्लीकेट थे। ऐसे तमाम लोग हैं खासतौर से माइग्रेंट लेबर, वे जहां काम करते हैं वहां भी वोटर बन जाते हैं और जो उनका मूल निवास स्थान है, वहां भी वोटर बने रहते हैं। अब चूंकि सब कंप्यूटराइज्ड है और एक सेंट्रल डाटा सेंटर बन गया है तो चुनाव आयोग को पता होता है कि एक व्यक्ति कहां-कहां वोटर है। वह एक ही जगह वोटर रह सकता है। दूसरी जगह से उसका नाम कट जाएगा। अब जस्टिस भुइयां को बताना चाहिए कि क्या जो बांग्लादेशी नागरिक यहां आकर वोटर बन गए थे, उनको नोटिस देकर उनकी सुनवाई होनी चाहिए थी या जिनके बारे में किसी को पता नहीं है, उनको नोटिस कहां भेजा जाना चाहिए था? साथ ही जो नाम दो जगह हैं, वे एक जगह तो मतदाता बने ही हुए हैं तो उनको नोटिस क्यों भेजा जाना चाहिए था? ये ऐसे बेसिक सवाल हैं जो लॉ का एक स्टूडेंट भी उठा सकता है, लेकिन जस्टिस भुइयां ने यह सवाल नहीं उठाए और यह जानते हुए भी कि सुप्रीम कोर्ट अगले ही दिन इस मुद्दे पर सुनवाई कर रहा है। तो मैं फिर कह रहा हूं कि वह सुप्रीम कोर्ट को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे थे।
जस्टिस भुइयां 2011 में जज बने। 1991 में वह एडवोकेट बने थे। यानी जब से वह वकील के रूप में न्याय प्रणाली से जुड़े तब से देश में पांच एसआईआर हो चुकी हैं और इसी तरह से नाम कटे हैं। आप पहले का उनका एक बयान दिखा दीजिए कि उसके विरोध में बोले हों। फिर अब क्यों बोल रहे हैं? क्योंकि अब एजेंडा तैयार करना है। अब आप देखिए कि जो लोग यह एजेंडा तैयार कर रहे हैं उनका कहना है कि एसआईआर में जो नाम काट दिए गए, इसके जरिए बीजेपी को जिताने की कोशिश हो रही है। ऐसे में पहले तो यह मानना पड़ेगा कि चुनाव आयोग के पास दिव्य दृष्टि है। वह हर एक के बारे में जानता है कि कौन सा मतदाता किस पार्टी को वोट देने वाला है। इसलिए वह चुनकर ऐसे लोगों के नाम काट रहा है, जो बीजेपी को वोट नहीं देने वाले थे। अब कोई समझदार आदमी तो ऐसा दावा कर नहीं सकता।
5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने चीफ जस्टिस से कहा कि आप ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर रोक लगा दीजिए, नहीं तो देश जल उठेगा। अब आप इसका मतलब समझिए कि क्या कोशिश हो रही है। देश को जलाने के लिए अलग-अलग तरह के तत्व सक्रिय हैं। दरअसल यह हमला ज्ञानेश कुमार पर नहीं, चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर है। यही लोग सुप्रीम कोर्ट की लेजिटिमेसी पर सवाल उठा रहे हैं और सरकार की लेजिटिमेसी पर तो पहले से सवाल उठा रहे हैं। दरअसल इस सबका आखिरी मकसद है जनतंत्र की वैधता पर सवाल उठाना कि ये जनतांत्रिक व्यवस्था ही ठीक नहीं है और इसको खत्म कर देना चाहिए। तो इस षड्यंत्र को समझने की जरूरत है। जस्टिस भुइयां में इतनी समझ तो होनी चाहिए थी कि अगले ही दिन उनके वरिष्ठ साथी इस मामले की सुनवाई करने वाले हैं। कम से कम इस मुद्दे पर अपनी बात रखने के लिए थोड़े समय का इंतजार कर लेते। लेकिन वह ऐसा करते तो फिर सुप्रीम कोर्ट की बेंच को प्रभावित करने की कोशिश कैसे होती? तो उन्होंने जो भारत विरोधी तत्व हैं, उनको पहले ही एक आधार दे दिया कि अगर सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के फैसले को सही ठहराता है तो यह गलत है।
सुप्रीम कोर्ट के पास मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्तों को हटाने का अधिकार नहीं है। संविधान यह अधिकार सरकार और राष्ट्रपति को भी नहीं देता है। संविधान ये अधिकार सिर्फ एक स्थिति में संसद को देता है कि महाभियोग प्रस्ताव लाया जाए और बहुमत से उसे पास कराया जाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पास एक ब्रह्मास्त्र है आर्टिकल 142, जिसका इस्तेमाल करने में आजकल वह कोई संकोच नहीं करता। यह आर्टिकल उसे अधिकार देता है कि किसी भी मामले में अगर अगर कानून साथ न दे रहा हो तो कानून के प्रावधानों को नजरअंदाज करके वह कंप्लीट जस्टिस के नाम पर कोई भी फैसला सुना सकता है। लेकिन अगर मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्तों के बारे में सुप्रीम कोर्ट इस आर्टिकल का इस्तेमाल करना चाहता है तो उसके लिए पर्याप्त आधार होना जरूरी है। दूसरी ओर ये जो कॉकरोच हैं,ये जजेस की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं। इससे बेहतर कंटेंप्ट का आधार और क्या हो सकता है? लेकिन सुप्रीम कोर्ट न केवल चुप है बल्कि उसने इन्होंने जो हिंसा की, उसको माफी भी दे दी और इनका हौसला बढ़ा दिया। इनको लग गया है कि सरकार हमारे सामने झुक गई और सुप्रीम कोर्ट बेबस है। सीधी सी बात यह है कि इन कॉकरोचों के मन से कानून का डर निकल गया है। स्टेट की पावर बहुत होती है। अगर वह तय कर ले कि उसे अपनी शक्ति का इस्तेमाल करना है तो बड़े से बड़े अराजक तत्व को अपनी हैसियत मालूम हो जाती है। अफसोस की बात यह है कि राज्य अपनी शक्ति का इस्तेमाल नहीं कर रहा है। हालांकि उसकी सत्ता पर तत्काल कोई खतरा नहीं, लेकिन राज्य पर संवैधानिक संस्थाओं की प्रतिष्ठा बचाने का दायित्व है। उसे यह दायित्व निभाना ही होगा। अब संवैधानिक संस्थाओं पर हमला करने वालों को बताया जाए कि ऐसे लोगों से इस देश का कानून कैसे निपटता है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)












