मित्तल को सबक सिखाने के लिए एलपीयू में करा डाला बवाल ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
सत्ता के अहंकार से कौन टकरा सकता है? सिर्फ मतदाता। उसके अलावा जो टकराने की कोशिश करेगा, उसका हश्र वही होगा जो पंजाब में लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (एलपीयू) के मालिक और चांसलर अशोक मित्तल और उनकी यूनिवर्सिटी का हो रहा है।
अशोक मित्तल पहले आम आदमी पार्टी के साथ थे। आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा को राज्यसभा में पार्टी के नेता पद से हटाने के बाद उन्हें ही नेता बनाया था, लेकिन राघव चड्ढा के भाजपा में जाने के अगले ही दिन मित्तल भी आप को छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। यह बात केजरीवाल के अहंकार को बर्दाश्त नहीं हुई। उन्हें लगा कि जिस राज्य में हम सत्ता में है,वहां हमारा बनाया हुआ आदमी हमको छोड़कर चला जा रहा है तो हम उसे सरकार की ताकत दिखाएंगे। उसे बताएंगे कि सरकार से पंगा लेने का मतलब क्या होता है। तो पंजाब में लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी जल रही है। उसके अंदर मॉल को लूट और जला दिया गया। तोड़फोड़ हो रही है। और यह सारा बवाल एक अफवाह के कारण हो रहा है। सोशल मीडिया पर अफवाह चलाई गई कि गर्ल्स हॉस्टल के फलां कमरे में एक युवती के साथ बलात्कार हुआ और उसके बाद उसने आत्महत्या कर ली। जबकि इस खबर में कोई सच्चाई नहीं है। जिस कमरे का हवाला दिया गया, उस कमरे की लड़कियां कह रही हैं कि यहां ऐसा कुछ नहीं हुआ। बार-बार हमको पुलिस और मीडिया के लोग परेशान कर रहे हैं? इस मामले को लेकर हिंसक प्रदर्शन हुआ और पुलिस ने लाठी चार्ज किया। अब सवाल यह है कि अरविंद केजरीवाल अशोक मित्तल को सबक सिखाना चाहते थे, लेकिन इस चक्कर में उन्होंने सबसे ज्यादा नुकसान किया यूनिवर्सिटी के छात्रों और उस राज्य का,जहां उनकी पार्टी सत्ता में है। राजनीतिक फायदे के लिए नेता किस हद तक जा सकता है,यह इसका उदाहरण है। आप याद कीजिए अरविंद केजरीवाल जब दिल्ली के मुख्यमंत्री थे तो विधानसभा में खड़े होकर जोर-जोर से चिल्लाकर उन्होंने कहा था दिल्ली के मालिक हम हैं। अब वह पंजाब विधानसभा में चिल्लाकर तो बोल नहीं सकते कि पंजाब के मालिक हम है,लेकिन इस प्रकरण के जरिए वह यही दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। पंजाब पुलिस ने बजाए यह पता लगाने के कि ऐसी घटना हुई है या नहीं, स्थिति को खराब होने दिया। उसने ऐसे छात्रों के खिलाफ एक्शन लिया जिनका कोई दोष नहीं था। सवाल यह है कि एक झूठी खबर के आधार पर इतना बड़ा मुद्दा बना कैसे? क्या यह पूरे सरकारी तंत्र का फेल्योर नहीं है?
अब इतना बड़ा कांड हो गया,लेकिन इस पर कोई नहीं बोला। कॉकरोच जनता पार्टी वाले अभिजीत दीपके और उसके साथी जहां कुछ नहीं होता है, वहां ठीक करने पहुंच जाते हैं,लेकिन जहां ठीक करने की जरूरत है, वहां चुप्पी साध लेते हैं। यह भी छात्रों का मामला है,लेकिन दीपके का कोई बयान नहीं आया। वह और उसके साथी पंजाब नहीं पहुंचे और पहुंचेंगे भी नहीं क्योंकि वहां आम आदमी पार्टी की सरकार है और अरविंद केजरीवाल उनके आका हैं। वह पंजाब के मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग नहीं करेंगे। कांग्रेस पार्टी मोलतोल कर रही है कि इस बारे में बोलने से फायदा होगा कि नुकसान होगा। पंजाब के प्रभारी बनाए गए सचिन पायलट इस मामले पर एक शब्द नहीं बोले हैं। छोटी सी घटना पर वीडियो बनाने वाले राहुल गांधी इतने बड़े मामले पर मौन साधे हैं क्योंकि यह विश्वविद्यालय है भारतीय जनता पार्टी के सांसद का और राज्य में आम आदमी पार्टी का शासन है। तो इस बात का आकलन हो रहा है कि इस मुद्दे पर बोलने से आम आदमी पार्टी को नुकसान पहुंचाएंगे कि बीजेपी को। उन्हें आम आदमी पार्टी की बजाय बीजेपी को नुकसान पहुंचाना राजनीतिक रूप से ज्यादा फायदेमंद लगता है। सवाल यह है कि भाजपा को नुकसान पहुंचाने की कोशिश में छात्रों के खिलाफ खड़ा होना पड़ेगा। बवाल के बाद विश्वविद्यालय ने 10 दिन की छुट्टी की घोषणा कर दी है। कक्षाएं बंद हो गई हैं। ये नुकसान न तो आम आदमी पार्टी का हो रहा है, न कांग्रेस, अकाली दल या भाजपा का। नुकसान तो छात्रों का हो रहा है। उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? उसकी जवाबदेही किसकी होगी? तो पंजाब में जो कुछ हो रहा है, वह केवल पंजाब नहीं, पूरे देश में जो राजनीतिक परिस्थिति है उसका आकलन प्रस्तुत करता है कि नेता घटना की गंभीरता के आधार पर नहीं, अपने राजनीतिक फायदे—नुकसान को देखकर रिएक्ट करते हैं। सवाल है कि आप अपना राजनीतिक फायदा उठाने के लिए क्या छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ कर सकते हैं? इसका जवाब पंजाब में जितने दल सक्रिय हैं, उन सबको देना चाहिए। अगर घटना सही होती और उस पर इस तरह का विरोध होता तो बात समझ में आती। लेकिन आधारहीन बात पर ऐसा बवंडर खड़ा करना किस तरह से जस्टिफाई हो ठहराया जा सकता है?
एलपीयू में हुए इस बवाल से अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के लोग जरूर खुश होंगे कि देखो हमसे गद्दारी की थी, उसकी सजा तुमको दे दी है। इस पूरी घटना का सीधा सा संदेश है कि आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल के पास अगर सत्ता है तो उनके खिलाफ जाने का इसी तरह का परिणाम होगा। दिल्ली में गनीमत इसलिए रही कि वहां उनके पास पुलिस नहीं थी। वरना ऐसा तांडव करते कि इस देश में किसी ने कभी देखा सुना न होता। लेकिन पंजाब में जैसे ही सरकार आई तो उन्होंने अपने विरोधियों के खिलाफ मुकदमे दर्ज कराना और गिरफ्तारी का सिलसिला शुरू कर दिया। वह तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया नहीं तो पता नहीं कितने लोगों को ये जेल भेज देते। इस पूरी घटना का एक दूसरा पक्ष भी है कि इस विश्वविद्यालय और उसके मालिक की छवि कोई बहुत अच्छी नहीं है। उन पर तरह-तरह के आरोप हैं। जब तक अशोक मित्तल साथ थे आम आदमी पार्टी की सरकार ने उनका बचाव किया। अब इस मुसीबत को बीजेपी ने अपने कंधे पर बिठा लिया है। तो उसका नुकसान बीजेपी को होना है। इस विश्वविद्यालय और इसके मालिक के जो कारनामे हैं, उनकी जांच होनी चाहिए। साथ ही झूठी खबर के आधार पर एलपीयू में जो बवाल हुआ, उसकी भी जांच होनी चाहिए। पता लगाया जाना चाहिए कि यह किसके उकसावे पर हुआ? हिंसा के पीछे कौन था? जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलता तब तक न्याय नहीं मिलेगा। लेकिन इन सवालों का जवाब ढूंढने में फिलहाल किसी की रुचि दिखाई नहीं देती क्योंकि सबको लग रहा है कि स्थिति खराब होने से हमारा राजनीतिक फायदा हो सकता है। आम आदमी पार्टी को लग रहा है कि पूरे प्रदेश में हमने संदेश भेज दिया कि देखो हमारा विरोध करने का क्या नतीजा होता है। कांग्रेस पार्टी को लग रहा है कि कानून व्यवस्था बिगड़ने का नुकसान आम आदमी पार्टी की सरकार को होगा। भाजपा को लग रहा है कि विश्वविद्यालय का मालिक हमारा सांसद है। उसके खिलाफ अगर बातें आती है तो हमारा नुकसान होगा। तो आप देखिए कि इतनी बड़ी घटना के बाद भी राज्य के सारे राजनीतिक दलों में एक तरह का सन्नाटा है। सबके हित कहीं न कहीं जुड़े हुए हैं। सब किसी न किसी मुद्दे पर विरोध में हैं और किसी न किसी मुद्दे पर साथ में हैं। मान लीजिए कि इस समय पंजाब में भारतीय जनता पार्टी की सरकार होती तब इन सब दलों का रवैया बिल्कुल अलग होता। ऐसे ही अगर कांग्रेस की सरकार होती तो भाजपा का रवैया अलग होता। आम आदमी पार्टी की ओर कांग्रेस उम्मीद की नजर से भी देखती है और खतरे की नजर से भी देखती है। ऐसे में सबको इंतजार पंजाब विधानसभा चुनाव के नतीजे का है। उसके बाद पता चलेगा कि पंजाब में राजनीतिक समीकरण किस तरह का होगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)