निराश-हताश विपक्ष और राष्ट्र विरोधी तत्वों की साजिश फिर बेनकाब।
कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन का छात्रों की समस्या से कोई लेना-देना नहीं है। ये पुरानी पटकथा दोहराई जा रही है, जो शाहीन बाग के समय हुई।
कॉकरोच जनता पार्टी ने जंतरमंतर पर आंदोलन शुरू किया था। इसमें सोनम वांगचुक ने अनशन शुरू किया। बाद में अभिजीत दिपके भी बैठे,लेकिन वह दो दिन से ज्यादा नहीं बैठ नहीं पाए। अदालत के आदेश पर शुक्रवार को दिल्ली पुलिस ने सोनम वांगचुक को अनशनस्थल से उठाकर अस्पताल में भर्ती करा दिया। उसके बाद सोमवार को लगभग 10 हजार छात्रों और अन्य लोगों ने संसद की ओर पहुंचने की कोशिश की। बैरिकेड तोड़ दिए। पुलिस पर पथराव किया। कई पुलिस वाले घायल हो गए। स्थिति को नियंत्रण में करने के लिए पुलिस ने लाठी चार्ज किया। इन लोगों ने बच्चियों को आगे किया ताकि पुलिस एक्शन न ले सके। भगदड़ में कुछ लोगों को चोटें भी आईं। ये तो हुई घटना की बात। अब इसके दो पक्ष हैं। एक सरकार और पुलिस की कमजोरी। पुलिस ने इस बात का अनुमान ही नहीं लगाया कि बैरिकेड तोड़कर ये लोग संसद की ओर जा सकते हैं। इनको संसद भवन के इतना नजदीक जाने क्यों दिया गया। पुलिस को स्पष्ट निर्देश थे कि बल प्रयोग नहीं करना है और गोली तो बिल्कुल भी नहीं चलानी है। जब ऐसे निर्देश हों और भीड़ अगर अराजक हो जाए तो कंट्रोल करना बड़ा मुश्किल हो जाता है। ऐसा ही हुआ। इसके बाद कॉकरोच जनता पार्टी का एक प्रतिनिधिमंडल केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा से मिला। अब उसकी भी कहानी सुन लीजिए। इन लोगों ने पुलिस अधिकारियों के जरिए संदेश भिजवाया कि हमसे सरकार का कोई व्यक्ति मिल तो ले। इस पर सरकार की ओर से कहा गया कि आपने सरकार से मिलने का समय कब मांगा? इसके बाद समय मांगा गया तो दिन में 11:30 बजे का समय मिल गया। मिलने गए लोगों से जेपी नड्डा ने पूछा कि आपका मांग पत्र कहां है? इस पर ये लोग बोले- वह तो हम लाए नहीं हैं। शाम को 4 बजे देंगे। अब आप इसी बात से समझ लीजिए कि छात्र समस्याओं के प्रति ये कितने गंभीर हैं।
अन्ना हजारे के आंदोलन से इस आंदोलन की तुलना करें तो आपको पता चलेगा कि जो आंदोलन आर्गेनिक होता है उसे जन समर्थन होता है। स्वत:स्फूर्त उससे लोग जुड़ते हैं। उसमें लोग घरों से निकल कर अपने छोटे बच्चों को साथ लेकर आ रहे थे। वह आंदोलन केंद्र की कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ था। भ्रष्टाचार से लोग ऊब गए थे। उनमें गुस्सा था। उसको प्रकट करने के लिए लोग आ रहे थे। उसके बाद रामलीला मैदान में स्वामी रामदेव अपने समर्थकों के साथ बैठे। उन पर आधी रात के बाद लाठीचार्ज हुआ। शैल बाला नाम की एक महिला को गंभीर चोटें आईं। बाद में उनकी मौत हो गई। 71 लोग अस्पताल में भर्ती हुए। कांग्रेस पार्टी ने उस समय यह काम किया था, जो आज कह रही है कि बच्चे हैं,सरकार को उनसे बात करनी चाहिए थी। अरे वे लोग भी तो भारत के ही नागरिक थे, जिन पर आपने आधी रात को इतनी बर्बरता से बल प्रयोग किया। एक और नमूना है अरविंद केजरीवाल। वह कह रहा है कि सोमवार को हुए लाठीचार्ज ने जलियांवाला बाग कांड को मात दे दी। जिसका दिमागी संतुलन बिगड़ गया हो, वही इस तरह की बात बोल सकता है। आप सत्तारूढ़ दल की आलोचना करें यह बात समझ में आती है। जनतंत्र में आपका अधिकार भी है, लेकिन उसकी कोई सीमा तो होगी। कितना झूठ बोलेंगे और झूठ के किस स्तर तक जाएंगे? कॉकरोच जनता पार्टी और सोनम वांगचुक के इस धरना प्रदर्शन की तुलना सिर्फ और सिर्फ शाहीन बाग से की जा सकती है। शाहीन बाग में भारत विरोधी तत्वों और जिहादी तत्वों का जमावड़ा लगा था। यहां भी आप देखिए कौन आया? विशाल ददलानी, शबाना आजमी, नसीरुद्दीन शाह जैसे लोग आए, जिनका छात्रों की समस्या से कभी कोई लेना देना नहीं रहा। इस आंदोलन की वजह से सोनम वांगचुक जैसे व्यक्ति को जरूर लेजिटिमेसी मिल गई है, जो पूरी तरह से एक्सपोज हो चुका था। दिपके, जिसका कोई राजनीतिक अस्तित्व नहीं है। वह अमेरिका से आता है और उसे लगता है कि आंदोलन करेंगे तो पूरा देश उसके पीछे खड़ा हो जाएगा। वह दो ही दिन अनशन के बाद भाग खड़ा हुआ। झूठी अफवाह फैलाई कि उसे गिरफ्तार कर लिया गया है। उससे भी लोग नहीं आए। शुक्रवार तक जंतरमंतर पर कोई हलचल नहीं थी। लेकिन सोमवार को लेफ्ट इको सिस्टम, कांग्रेस का इको सिस्टम और भारत विरोधी इको सिस्टम सब इकट्ठा हो गए। उनकी सारी कोशिश थी कि इसको अराजकता का रूप देना है। पुलिस को इतना उकसाओ, मजबूर करो और ऐसी परिस्थिति पैदा करो कि गोली चलानी पड़े। पुलिस की सिर्फ एक गोली चली होती और उनका काम बन गया होता। वह हुआ नहीं। इसीलिए मैं बार-बार कह रहा हूं कि इस आंदोलन का छात्रों की समस्या से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है।

देश में इस समय जो राजनीतिक परिस्थिति है, उसमें विपक्षी दलों खासतौर से कांग्रेस में हताशा बढ़ रही है। राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा मंगलवार को अस्पताल में भर्ती घायलों को देखने गए। इतने दिन से सोनम वांगचुक अनशन पर बैठे हुए थे, अगर यही मुद्दा था तो ये लोग जंतरमंतर पर उनसे मिलने गए क्या? अब कहा जा रहा है कि हम अलग आंदोलन कर रहे हैं। इस मुद्दे पर संसद परिसर में जब राहुल गांधी से प्रतिक्रिया देने को कहा गया तो उन्होंने मना कर दिया था। कांग्रेस ने छात्रों की गूंज नाम से दो कार्यक्रमों की घोषणाा की थी जो राहुल गांधी के विदेश में छुट्टी मनाने के कारण रद्द कर दिए गए। इससे आप अंदाजा लगाइए कि कांग्रेसी इस मुद्दे पर कितना गंभीर हैं। दरअसल ये लोग विदेशी ताकतों की साजिश का मोहरा हैं और चाहते हैं कि भारत में अराजकता पैदा हो। वहां नारे भी लग रहे थे कि भारत को नेपाल और बांग्लादेश बना देंगे। इस देश का मतदाता और आम आदमी बड़े-बड़े बुद्धिजीवियों से ज्यादा समझदार है। उसको समझ में आता है कौन किस नीयत से क्या काम कर रहा है। इस कथित आंदोलन में जो लोग आए थे उनमें आधे ऐसे थे जिनको पता नहीं कि वे किस लिए आए हैं। इनका सिर्फ एक मुद्दा था कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा होना चाहिए। अरे नीट का पेपर लीक हुआ। उसमें जो लोग जिम्मेदार थे उनकी गिरफ्तारी हुई। उनके खिलाफ मुकदमा चल रहा है। पेपर फिर से हुआ। उसका रिजल्ट आ गया और अगले एक डेढ़ महीने में छात्रों की पढ़ाई शुरू हो जाएगी। ये लोग अगर मुद्दा ये उठाते कि शिक्षा व्यवस्था में ऐसा परिवर्तन किया जाए कि पेपर लीक न होने पाए, छात्रों को परेशानी न होने पाए तो बात समझ में आती है। लेकिन इनका मुद्दा तो अराजकता फैलाना है। इसीलिए इन लोगों को कोई जनसमर्थन नहीं है। दरअसल इन लोगों को बर्दाश्त नहीं हो रहा है कि यह सरकार कैसे चल रही है और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री कैसे बने हुए हैं। इसीलिए राहुल गांधी भविष्यवाणी करते रहते हैं कि देश में आर्थिक सुनामी आने वाली है और ऐसा है तो भैया आप विदेश में छुट्टी मनाने क्यों चले गए? आपको मालूम था कि आप झूठ बोल रहे हैं? और इस दिपके की क्या हैसियत है? इसका कोई सामाजिक जीवन नहीं। देश के लिए कोई योगदान नहीं। सरकार को इससे बात क्यों करनी चाहिए? मैं तो मानता हूं कि सरकार ने यह गलत किया कि जेपी नड्डा से मिलने के लिए कहा। इसको इसी लेजिटिमेसी की जरूरत थी कि सरकार में मुझसे कोई बात तो करे। सरकार बात करने को तैयार हुई तो इसके पास मांग पत्र तक तैयार नहीं था।
दूसरी ओर सोनम वांगचुक की सबसे बड़ी समस्या है कि एफसीआरए एक्ट में संशोधन हो रहा है। उससे उनका पूरा धंधा बंद होने वाला है। वह एक्सपोज हो चुका है कि किस तरह से विदेशी पैसे की मदद से इस देश में अराजकता पैदा करने की कोशिश कर रहा था। लद्दाख में आग लगाने की कोशिश कर रहा था। ऐसे व्यक्ति को पूरा विपक्ष मिलकर लेजिटिमेसी देने की कोशिश कर रहा है। इसका एक मतलब यह भी है कि विपक्ष ने मान लिया है कि उसमें कोई दम बचा नहीं है। वह इस सरकार के खिलाफ किसी छोटे से आंदोलन के लिए भी दूसरों पर निर्भर है। अगर विपक्ष को लगता है कि छात्रों की समस्या को सरकार गंभीरता से नहीं ले रही है तो सारी राजनीतिक पार्टियों को सड़क पर होना चाहिए था। देशव्यापी आंदोलन की तैयारी होती। ऐसी कोई तैयारी दिख रही है? बस, संसद की कार्यवाही नहीं चलने देंगे। छात्रों की सारी समस्या का हल इसी से हो जाएगा। तो सरकार की कमजोरी से यह घटना इतनी बड़ी बनी है। वरना यह न तो यह कोई जन आंदोलन था, न छात्रों का आंदोलन था और न इसका छात्रों के भविष्य से कोई लेना देना था। आप देखते रहिए कि कुछ दिन में इसका क्या हश्र होता है।
भारतीय राजनीति में जितनी गैर भाजपा पार्टियां हैं खासतौर से जो कांग्रेस के साथ हैं, उनका क्या हश्र होने वाला है जंतरमंतर पर इसकी झलक दिखाई दी है। जो गठबंधन दूसरों के भरोसे 10 हजार से ज्यादा लोगों को जुटा नहीं पाया उससे आप समझ सकते हैं कि उनके साथ कितना जनसमर्थन है। इनको मतलब है कि पुलिस ऐसी कारवाई करें जिससे ये विक्टिम कार्ड खेल सकें। दुनिया में बता सकें कि कितना अत्याचार हो रहा है। लेकिन इसका इनको मौका नहीं मिल रहा है। सोमवार को जो कुछ हुआ उससे विपक्ष ने खुद को और एक्सपोज कर लिया है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









