बारह साल में दूसरी बार झुके मोदी, भारत में रिजीम चेंज चाहती हैं कई विदेशी ताकतें
आखिरकार शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया। आंदोलन के दबाव में नरेंद्र मोदी की सरकार 12 साल में दूसरी बार झुकी। पहली बार वह तथाकथित किसान आंदोलन के नाम पर झुकी थी।
विडंबना यह है कि जिन दो आंदोलनों के सामने मोदी सरकार झुकी इनमें से कोई स्वत:स्फूर्त या कहें जमीन से उठा हुआ आंदोलन नहीं था। जो कथित किसान आंदोलन था, उसमें किसान नहीं, ज्यादातर ऐसे तत्व थे जो सरकार विरोधी या कहें देश विरोधी थे। वह बिचौलियों और आंदोलनजीवियों का जमावड़ा था। पैसा और संसाधन विदेश से आ रहे थे। नैरेटिव लेफ्ट इको सिस्टम बना रहा था। अंत में सरकार को झुकना पड़ा क्योंकि वह गोली नहीं चलाना चाहती थी। उस आंदोलन को चलाने वाले चाहते थे कि एक गोली चल जाए और कोई एक मौत हो जाए,उसके बाद हम पूरी दुनिया में इसको मुद्दा बना सकते हैं। इसीलिए सरकार ने कोई एक्शन नहीं लिया और तीनों कृषि कानूनों को वापस ले लिया। उसके बाद यह दूसरा मौका है। इस आंदोलन को चलाने वालों का कोई जनाधार नहीं है। इनका नीट या छात्रों के मुद्दे से कोई लेना देना नहीं है। यह आंदोलन दरअसल भारत विरोधी तत्वों के नियंत्रण में चला गया था। इसमें आपको मौलवी दिखे। इसमें आपको पादरी दिखे। इसमें खालिस्तानियों का समर्थन दिखाई दिया। इसमें भगवान राम का अपमान और हिंदू धर्म के विरोध में नारे सुनाई दिए। ऐसे नारों का छात्रों की समस्या से क्या मतलब? मैं बार-बार एक बात कहता हूं कि सरकार का विरोधी होना, भाजपा का विरोधी होना,प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोधी होना, संघ का विरोधी होना, ये सब डेमोक्रेसी के तत्व हैं। जिनसे किसी को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए, लेकिन जब देश विरोध की बात आ जाए तो सबको परेशानी होनी चाहिए। तो धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से इस आंदोलन को सफलता मिल गई है। और प्रधान के इस्तीफे के बाद अभिजीत दिपके का बयान आपने ही सुना होगा कि ये पहला विकेट गिरा है। इसका मतलब आप समझ लीजिए कि यह आंदोलन न तो छात्रों के लिए, न शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन के लिए और न ही धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के लिए था। ये आंदोलन सीधे-सीधे तख्ता पलट के लिए है। ऐसा वे कर पाएंगे या नहीं, ये तो बाद की बात है, लेकिन कोशिश वही है और आगे भी होती रहेगी।
हर संसद के सत्र से पहले कोई न कोई ऐसा मुद्दा उठाया जाता है जिससे राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो। इस बार ऐसा मुद्दा उठाया गया जिससे समाज और देश में अराजकता पैदा हो और अराजकता पैदा करने वाले तत्व इस बार सफल रहे हैं। सरकार नाकाम रही है। उसका बड़ा कारण है। सरकार ओवर कॉन्फिडेंस में रही कि इनके बस का कुछ नहीं है। ये केवल कुछ दिन तमाशा करेंगे, उसके बाद चले जाएंगे। ऐसा हुआ नहीं। जिस दिन सोनम वांगचुक को सरकार ने लिखकर दिया कि धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा भी हमारे कंसीडरेशन में है, उसी दिन सरकार ने संकेत दे दिया था कि वह इस मुद्दे पर पीछे हटने को तैयार है। आप कह सकते हैं कि यह एक तरह की रणनीति का भी हिस्सा हो सकता है कि सरकार ने इस पूरे आंदोलन को धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर केंद्रित होने दिया। वैसे इस इस्तीफे से सरकार सिर्फ झुकी ही नहीं है, पहली बार उसकी छवि को धक्का भी लगा है। सरकार ने अपनी यह जो छवि बनाई थी कि इस सरकार में इस्तीफे नहीं होते वह हो गया। देखिए दो परिस्थितियां होती हैं। एक आप इस्तीफा ले लेते हैं। दूसरा आपको इस्तीफा लेना पड़ता है। तो यहां दूसरी बात हुई है। आपके सामने धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया था। और यह बात जान लीजिए कि धर्मेंद्र प्रधान केवल बहाना हैं, असली निशाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। धर्मेंद्र प्रधान के रहने न रहने से राजनीति पर क्या फर्क पड़ता है? इस आंदोलन को जिन लोगों ने खड़ा किया है, वे ऐसी अंतरराष्ट्रीय शक्तियां हैं जो भारत में रिजीम चेंज चाहती हैं। वे कम से कम पिछले आठ साल से ऐसी कोशिशें कर रही हैं। वे सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर रुकने वाली नहीं हैं। इसीलिए आने वाले दिनों में और उग्र रूप से ये आंदोलन शुरू हो सकता है। अब यहीं से सरकार की अग्नि परीक्षा शुरू होगी कि ऐसी चुनौती से वह किस तरह निपटती है। आजाद भारत के इतिहास में ऐसे दो तीन बड़े उदाहरण हैं। पहला, जेपी मूवमेंट था जिसमें सरकार ने बल प्रयोग किया, नतीजा यह हुआ कि सत्ता परिवर्तन हो गया। इमरजेंसी लगाने के बाद भी सरकार सत्ता नहीं बचा पाई। दूसरा आंदोलन हुआ वीपी सिंह का। उसमें कोई बल प्रयोग नहीं हुआ फिर भी सत्ता परिवर्तन हो गया। तीसरा अयोध्या का हुआ। अयोध्या आंदोलन में अच्छा खासा बल प्रयोग हुआ। वह आंदोलन लंबा चला और नतीजा ये हुआ कि पूरी राजनीति बदल गई। मेरी नजर में चौथा आंदोलन अन्ना हजारे का था। उसमें सरकार ने समझौता किया भी और नहीं भी किया। दो नावों की सवारी की और बीच में सत्ता चली गई। इन आंदोलनों में स्पष्ट था कि उनका राजनीतिक लाभ कौन उठा सकता है। लेकिन ये जो छात्र आंदोलन है, इसके राजनीतिक फल के बारे में आप अभी कुछ प्रेडिक्ट नहीं कर सकते। कांग्रेस या अन्य रीजनल पार्टियों में किसी को इसका फायदा होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है और जो दिपके है, उसकी अभी कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है। लेकिन मुझे लगता है कि आने वाले समय में कॉकरोच जनता पार्टी राजनीतिक दल के रूप में रजिस्टर हो जाएगी। अन्ना हजारे के आंदोलन के बल पर अरविंद केजरीवाल ने राजनीतिक दल बना लिया। लेकिन वह देश के दो प्रदेशों दिल्ली और पंजाब के बाहर नहीं निकल पाए। क्या अभिजीत दिपके अरविंद केजरीवाल के उस रिकॉर्ड को तोड़ेंगे?
इस मुद्दे को इतना बड़ा बनाकर उन्होंने फायदा उठाया। चूंकि इससे बच्चों और उनके अभिभावकों के सेंटीमेंट जुड़े हुए थे इसलिए सरकार दबाव में आई। सरकार ने जोखिम लेने की हिम्मत नहीं दिखाई। सोनम वांगचुक का अनशन टूटने के बाद लग रहा था कि सरकार सफल हो गई और हो भी गई थी। लेकिन उसके बाद की तैयारी सरकार ने नहीं की। मान लीजिए कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा सोनम वांगचुक की मांग पर अगर सरकार ने करा दिया होता तो शनिवार को जंतर मंतर पर जो दृश्य दिखाई दिया वैसा न दिखाई देता। इसका क्रेडिट अगर सोनम वांगचुक को मिल भी जाता तो भाजपा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कोई राजनीतिक चुनौती नहीं होती क्योंकि उनका पूरा राजनीतिक कार्य क्षेत्र लद्दाख तक सीमित है। अब यह जो हुआ है इन आंदोलनकारियों का राजनीतिक क्षेत्र कितना होगा, इसके बारे में किसी को मालूम नहीं है।
कांग्रेस पार्टी के खेमे में मुझे लगता है कि कभी खुशी कभी गम वाला माहौल होगा। खुशी ये कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया। कांग्रेस भी इस्तीफा मांग रही थी तो वह दावा कर सकती है कि हमारी जीत हुई। लेकिन गम इसलिए कि इसका श्रेय दिपके को मिलता हुआ दिख रहा है। इसका श्रेय कोई कांग्रेस पार्टी या राहुल गांधी को देता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। अभी दिपके के पास कोई राजनीतिक दल है नहीं, लेकिन राजनीतिक दल होगा नहीं, यह तो नहीं कह सकते तो यह तैयारी किसी विधानसभा चुनाव की नहीं है। यह 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी है। देखना यह है कि भारतीय जनता पार्टी के जो सहयोगी दल हैं, उन पर इसका क्या असर पड़ता है? इससे तय होगा कि राजनीतिक समीकरण कैसे बनेंगे।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









