राजनीति में विश्वसनीय नेतृत्व और मध्यस्थ वाले गठबंधन ही सफल हुए।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
राजनीतिक गठबंधन सफलतापूर्वक चलें, उसके लिए दो मुख्य तत्वों का होना जरूरी है। पहला किसी ऐसे मध्यस्थ का होना,जिसकी सभी दलों में विश्वसनीयता हो और अपनी कोई महत्वाकांक्षा न हो। दूसरा,गठबंधन का नेतृत्व ऐसे व्यक्ति के पास हो जिसमें वोट दिलाने की क्षमता हो। दुर्भाग्य से इंडी गठबंधन के पास ये दोनों ही नहीं हैं।
एक समय गठबंधन के लिए मध्यस्थ की भूमिका सीपीएम के नेता हरिकिशन सिंह सुरजीत निभाते थे। उन्होंने यह काम कई वर्ष सफलतापूर्वक किया। उनसे पहले जयप्रकाश नारायण ने ऐसी ही भूमिका निभाई। उन्होंने सारे गैर कांग्रेसी दलों को एक किया। जनता पार्टी बनवाई। उनका स्ट्रेचर ऐसा था कि कोई उनकी नीयत पर सवाल नहीं उठा सकता था और साथ ही उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं थी। उनके नेतृत्व पर किसी को कोई संदेह नहीं था और इसलिए सब लोग उनकी बात मानने के लिए विवश थे। सबको पता था कि मतदाता को उन पर बहुत ज्यादा भरोसा है। पहले वह कांग्रेस में थे और सरदार पटेल के निधन के बाद उनको जवाहरलाल नेहरू डिप्टी प्राइम मिनिस्टर बनाना चाहते थे, लेकिन उन्होंने मना कर दिया और बाद में कांग्रेस ही छोड़ दी। इसके अलावा जब एनडीए बना तो उसमें जॉर्ज फर्नांडिस की बड़ी भूमिका थी। वह समाजवादी नेता थे, लेकिन भारतीय जनता पार्टी के साथ दूसरे दलों को उन्होंने सफलतापूर्वक जोड़ा। उन्हीं के सुझाव पर एजेंडा फॉर गवर्नेंस बना। 1999 में जब एक वोट से अटलजी की सरकार गिर गई उसके बाद भी वह गठबंधन बना रहा। उसके बाद अगले पांच साल तक फिर अटल सरकार चलती रही। 2014 कोई मध्यस्थ नहीं था, लेकिन एनडीए और मजबूत हुआ। भाजपा को अकेले दम पर बहुमत दिलाकर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने। 2019 में भाजपा को और बड़ा बहुमत मिला, लेकिन मोदी ने गठबंधन के साथियों को छोड़ा नहीं, सबको अकोमोडेट किया और इसीलिए 2024 में जब भाजपा की सीटें कम हो गईं तब भी उनके गठबंधन के साथी छोड़कर नहीं गए। अब इन सब उदाहरणों में देखिए कि कॉमन चीज क्या है? किसी भी गठबंधन को बनाने और उसको चलाने में मध्यस्थ का होना बड़ी महत्वपूर्ण बात है, लेकिन उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है नेतृत्व। ऐसा नेता, जिसमें वोट दिलाने की क्षमता हो।
1977 में जो गठबंधन बना तो भले ही जेपी सरकार में शामिल नहीं हुए, लेकिन वोट दिलाने की क्षमता उन्हीं की थी। उन्होंने गठबंधन बनाना तो सिखाया किंतु गठबंधन चलाने का हुनर नहीं सिखाया। इसलिए न तो सरकार चली, न पार्टी चली और न गठबंधन चला। ढाई साल में सब बिखर गया क्योंकि वहां जो शीर्ष के नेता थे, उनकी महत्वाकांक्षा काबू में नहीं थी। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री तो बन गए लेकिन वह सर्वमान्य नेता नहीं थे। यही हश्र 1989 में हुआ, जब वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने। सरकार को बाहर से लेफ्ट और भारतीय जनता पार्टी ने समर्थन दिया, लेकिन वह अपनी पार्टी के सर्वमान्य नेता नहीं बन पाए। चंद्रशेखर ने पार्टी तोड़कर कांग्रेस के समर्थन से सरकार बना ली। वही हाल देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल का हुआ। जनता दल का कोई बहुमत नहीं था। उसको समर्थन बाहर से कांग्रेस पार्टी दे रही थी। हमेशा की तरह अपना काम निकलने के बाद उसने समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी। कल्पना कीजिए कि विश्वनाथ प्रताप सिंह, देवगौड़ा या इंद्र कुमार गुजराल वोट दिलाने वाले नेता होते तो क्या ऐसा हो पाता। लेकिन 2004 में परिस्थिति क्यों बदली? इस समय भी मैच मेकर हरकिशन सिंह सुरजीत थे, लेकिन जितने घटक दल थे सबको सोनिया गांधी का नेतृत्व मंजूर था। उनको लग रहा था कि सोनिया गांधी में वोट दिलाने की क्षमता है। यह अलग बात है कि उनकी क्षमता इतनी नहीं थी कि पूर्ण बहुमत दिला सकें। इसीलिए यूपीए 10 साल चल पाया। उससे पहले एनडीए भी इसलिए चला क्योंकि उसमें अटल बिहारी वाजपेयी का नेतृत्व और उनकी वोट दिलाने की क्षमता थी।
2023 में इंडी गठबंधन नाम से एक नया गठबंधन बना। इसके मैच मेकर पहले नीतीश कुमार बन रहे थे। उन्होंने सोनिया गांधी और दूसरे दलों के नेताओं से बात कर सबको एक मंच पर लाने की कोशिश की,लेकिन गठबंधन के साथियों को नीतीश कुमार पर विश्वास नहीं था और उनका नेतृत्व तो बिल्कुल स्वीकार नहीं था। बाद में वह खुद इससे हट गए। उसके बाद से इस गठबंधन का हाल बुरा ही है। इस गठबंधन में कोई किसी को नेता मानने को तैयार नहीं है। इस गठबंधन में शामिल सबसे बड़ी पार्टी है कांग्रेस और उसके नेता हैं राहुल गांधी, लेकिन उनका नेतृत्व किसी और क्षेत्रीय दल को मंजूर नहीं है। सब अपना—अपना घर संभालने में लगे हैं कि हमारा दायरा कैसे बड़ा हो जाए। यूपीए में जिस तरह सोनिया गांधी का नेतृत्व स्वीकार्य हो गया उस तरह से इंडी गठबंधन में राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार्य नहीं हुआ क्योंकि वोट दिलाने की क्षमता वह साबित नहीं कर पाए। हाल ही में हुई इस गठबंधन की बैठक में उद्धव ठाकरे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़े थे। उसमें उन्होंने इस गठबंधन की कमजोर नस पर हाथ रख दिया। उन्होंने कहा कि आप गठबंधन की बात करते हैं और अकेले चलते हैं। उनका आशय महाराष्ट्र में कांग्रेस के प्रदर्शन से था। उसमें गठबंधन के साथियों को शामिल न करने पर वह नाराज थे। उनकी बात का मतलब यही था कि हम आपकी पालकी ढोने के लिए तैयार नहीं है। हमारी भी महत्वाकांक्षा है। हम भी अपना विस्तार करना चाहते हैं और वह कांग्रेस की कीमत पर होता है तो भी हमको कोई परेशानी नहीं है। इस इंडी गठबंधन की असली समस्या यही है। पहली बात कोई मध्यस्थ नहीं है, जिस पर सबका विश्वास हो। राहुल गांधी में यह गुण है ही नहीं कि वह घटक दलों के नेताओं से बातचीत कर सकें और उनकी बात सुन सकें। दूसरा,सोनिया गांधी तो बहुत ही जल्दी में हैं कि किसी तरह से पूरा गैर भाजपा विपक्ष राहुल गांधी को अपना नेता मान ले और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करे। ऐसा 2024 में नहीं हुआ और 2029 में भी नहीं होगा।
2024 में उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस का गठबंधन हुआ, लेकिन आजकल जिस तरह की बयानबाजी हो रही है, उससे लग रहा है कि दोनों में अंदर बड़ी खटपट है। आज डीएमके इंडी गठबंधन के साथ नहीं है। आम आदमी पार्टी पहले ही अलग थी। इसी तरह से ममता बनर्जी जब तक सत्ता में थीं तब तक उनकी इच्छा थी कि उनको गठबंधन का नेता मान लिया जाए,लेकिन कोई तैयार नहीं था। अब जब वह हार गई हैं, उनकी पार्टी टूट गई है, तब उनको गठबंधन की याद आई है। तो यह गठबंधन हारे हुए नेताओं और पार्टियों की शरण स्थली है। वे अपने अस्तित्व की लड़ाई के लिए इस गठबंधन का सहारा लेना चाहते हैं। जब से यह गठबंधन बना उसके बाद से देख लीजिए कि उद्धव ठाकरे, शरद पवार और तेजस्वी यादव का क्या हाल हो गया? ले—देकर अखिलेश यादव बचे हैं। मेरा मानना है कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद उनकी स्थिति भी ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव और उद्धव ठाकरे जैसी होने वाली है। केवल गठबंधन बना लेने से आप अपने विरोधी को चुनौती नहीं दे सकते। और भारतीय जनता पार्टी, जो एक इलेक्शन मशीनरी है और जिसके पास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे 100 साल पुराने संगठन का सपोर्ट है,को तो बिल्कुल नहीं। अगर गठबंधन के दलों की केमिस्ट्री नहीं बनेगी तो उनकी केमिस्ट्री मतदाता से कभी नहीं बन पाएगी। इस गठबंधन के पास कोई विजन, कोई नीति और कार्यक्रम नहीं है। तो यह गठबंधन कैसे चलेगा? दरअसल यह गठबंधन कभी शुरू ही नहीं हो पाया। तो इसके गिरने पर किसी को दुख नहीं होने वाला है। किसी को भरोसा नहीं है कि यह चलेगा। कैसी विडंबना है कि इस गठबंधन की हाल ही में बैठक तो हुई लेकिन उसमें 2027 की शुरुआत में पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई। तो भाई, ये गठबंधन बना किस लिए है? इस गठबंधन की बैठक से बाहर निकलने के बाद कोई नेता इसके बारे में सोचता भी नहीं है। तो मतदाता क्यों सोचेगा?
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)