एक ही जनाधार पर दावा करने वाले दो दल साथ नहीं बढ़ सकते।
उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव तीन दलों समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस के लिए अस्तित्व की लड़ाई का सवाल बन गया है।
इस चुनाव में यह तय लग रहा है कि कांग्रेस और सपा गठबंधन करके लड़ेंगे। समाजवादी पार्टी के पास दो सामाजिक समूहों मुसलमान और यादव का कोर वोट है, लेकिन कांग्रेस पार्टी के पास उत्तर प्रदेश में क्या है? वह राष्ट्रीय स्तर पर उसे जो मुसलमानों का समर्थन है,उसके आधार पर यूपी में मुस्लिम वोट पर दावा करती है। समाजवादी पार्टी जब से बनी है यूपी में तभी से लगातार मुस्लिम वोट उसे मिलता रहा है। केवल 2009 का लोकसभा चुनाव ऐसा था जिसमें सपा का मुस्लिम वोट कुछ कम हुआ था और उसका नुकसान भी उसे हुआ था जबकि उसका फायदा कांग्रेस पार्टी ने उठाया था। ये एक उदाहरण है कि अगर मुसलमान सपा से टूटेगा तो वह कांग्रेस की ओर जाएगा। 2009 में मुसलमान यूपी में बसपा के मजबूत होने के बावजूद कांग्रेस की ओर गया। 2009 में कई दलों ने मायावती को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश करके चुनाव लड़ा था तब भी यूपी में मुसलमान वोट बसपा के साथ नहीं गया। यह अखिलेश यादव के लिए एक तरह से चेतावनी है। देखिए, जब दो पार्टियां एक ही सामाजिक समूह के जनाधार के लिए लड़ती हैं तो उसमें से कोई एक ही सर्वाइव करेगी। कांग्रेस दावा कर रही है कि इस समय देश का मुसलमान उसकी ओर देख रहा है। इसलिए यूपी में भी कांग्रेस को मुसलमानों का वोट मिलेगा, जो कि सही भी है। लेकिन सवाल यह है कि अगर कांग्रेस अलग लड़ेगी तो कितना मुसलमान उसके साथ जाएगा। समाजवादी पार्टी की दृष्टि से देखें तो थोड़ा भी जाएगा तो उसे उसका नुकसान होगा। इसीलिए वह कांग्रेस से गठबंधन चाहती है, लेकिन यह राजनीति लंबी नहीं चल सकती क्योंकि सपा और कांग्रेस के बीच में अब एक दूसरी लड़ाई का मोर्चा भी खुल गया है। दोनों की नजर दलित वोटों पर है। 2024 के लोकसभा चुनाव में दलित वोट सभी दलों के बीच बंटा था। यूपी में वह भाजपा, बसपा, सपा और कांग्रेस सभी को भी मिला था। उस चुनाव में समाजवादी पार्टी को पहली बार लगा कि हमको दलित वोट भी मिल सकता है और कांग्रेस पार्टी को लगा कि उसका पुराना दलित जनाधार उसके पास लौट सकता है। तो दोनों को लग रहा है कि दलित वोट हमारी ओर आ सकता है,लेकिन समाजवादी पार्टी का दावा इसलिए ज्यादा मजबूत लगता है क्योंकि उसके पास मुस्लिम और यादव का जो कोर वोट है उसमें अगर दलित जुड़ता है तो तीनों का फायदा है। दूसरी ओर कांग्रेस के पास कोई कोर वोट है नहीं तो केवल दलित के जुड़ने से कुछ मिलने वाला नहीं है।
कांग्रेस यूपी में अपना जनाधार फिर से बनाना चाहती है। उसके टारगेट पर दो सामाजिक वर्ग मुसलमान और दलित हैं। उसे लगता है कि मुसलमान और दलित अगर आ जाएंगे तो ब्राह्मण भी साथ आ ही जाएगा। इसी गणित पर वह काम कर रही है। अब सवाल यह है कि अगर कांग्रेस और सपा दोनों ही मुस्लिम और दलित वोट के लिए लड़ रहे हैं तो किसी एक को ही इसका फायदा मिलेगा। जिसको मिलेगा वह आगे बढ़ेगा और जिसको नहीं मिलेगा वह घाटे में रहेगा। यूपी में कांग्रेस के पास घाटे में जाने के लिए कुछ बचा नहीं है। उसे लग रहा है कि जो कुछ भी मिलेगा, वह फायदा ही फायदा है। लेकिन समाजवादी पार्टी को लग रहा है कि अगर इसका फायदा हमें मिलेगा तो यूपी की सत्ता भी मिल सकती है। इसलिए उनका स्टेक बड़ा है। आपने एक शब्द सुना होगा विषकन्या। राजे रजवाड़ों के समय राजनीति में उसका बड़ा इस्तेमाल होता था। तो क्या राहुल गांधी समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के लिए विष पुरुष बनेंगे? क्योंकि अगर वह मुस्लिम और दलित वोट लेते हैं तो उसका घाटा शुद्ध रूप से अखिलेश यादव को होगा। अगर दलित और मुस्लिम वोट बड़ी संख्या में कांग्रेस के साथ जाता है तो सबसे पहले कांग्रेस समाजवादी पार्टी को चुनौती देगी क्योंकि एक ही जनाधार पर दावा करने वाली दो पार्टियां एक साथ नहीं बढ़ सकतीं। दोनों में से कोई एक ही बढ़ेगा। भाजपा जो उत्तर प्रदेश में नंबर एक की पार्टी है, उससे मुकाबला उसके बाद होगा। जब कांग्रेस और सपा आपस में तय कर लेंगे कि इन दोनों में बड़ा कौन है? फिलहाल तो अखिलेश यादव नजर आते हैं क्योंकि उनकी पार्टी यूपी में नंबर दो की पार्टी है। लेकिन क्या 2027 के चुनाव नतीजे के बाद भी रह पाएगी? और अगर रह पाएगी तो फिर कांग्रेस को क्या मिलेगा? कांग्रेस का उद्धार तभी होगा जब समाजवादी पार्टी का पतन हो और समाजवादी पार्टी के लिए सत्ता के नजदीक पहुंचना तभी संभव होगा जब कांग्रेस का सफाया हो।
अब विडंबना देखिए कि जो दो पार्टियां एक दूसरे को खत्म होते देखना चाहती हैं उन्हीं का गठबंधन हो रहा है। दलित जो कभी कांग्रेस का कोर वोट था वह उससे पहली बार तब छिटका जब 1977 में बाबू जगजीवन राम ने कांग्रेस छोड़ी। हालांकि 1980 और 1989 में वह फिर कांग्रेस के पास लौट कर आया, लेकिन कांशीराम ने जब बहुजन समाज पार्टी बनाई तो दलित वोट पूरी तरह उसके साथ चला गया।
2014 में फिर परिस्थिति बदली। दलितों का एक बड़ा वर्ग भाजपा के साथ आ गया। भाजपा ने सवर्ण, दलित और अति पिछड़ा का जो समीकरण बनाया उसने उसे 2014, 2017, 2019, 2022 के चुनाव में बड़े बहुमत से जिताया। 2024 में भाजपा को झटका लगा क्योंकि यह दलित वोट उससे टूटकर चार हिस्सों में बंट गया। इसका एक हिस्सा सपा को मिल जाने से उसे बड़ा फायदा हुआ और उसके 37 सांसद जीत गए। लेकिन मैं 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे को अपवाद मानता हूं। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को अगर लगता है कि 2024 का नतीजा 2027 में रिपीट होगा तो वे बहुत बड़े झटके के लिए तैयार रहें। 2024 के नतीजे से सपा और कांग्रेस दोनों को लग रहा है कि वे बड़े पहलवान हो गए हैं। तो असली पहलवान से लड़ने से पहले उनको लगता है कि आपस में तय कर लें कि हम में बड़ा कौन है। कांग्रेस को लग रहा है कि उसके पास आगे बढ़ने का यही मौका है। समाजवादी पार्टी को लग रहा है कि सत्ता में वापसी का यही मौका है। सत्ता तभी मिलेगी जब आपके ज्यादा से ज्यादा विधायक जीत कर आएंगे और वह तब होगा जब आप ज्यादा से ज्यादा सीटें लड़ेंगे। अखिलेश यादव को यूपी का मुख्यमंत्री और राहुल गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनना है। दोनों ने अपने स्टेक बढ़ा लिए हैं। राहुल को अगर प्रधानमंत्री बनना है तो उनको उत्तर प्रदेश और बिहार में समाजवादी पार्टी और आरजेडी को खत्म करना पड़ेगा या हाशिए पर धकेलना होगा। राहुल ने बिहार में तो आरजेडी को हाशिए पर धकेल दिया, लेकिन उनकी पार्टी खड़ी नहीं हो पाई। क्या उत्तर प्रदेश में भी बिहार रिपीट होने जा रहा है? इसकी संभावना बढ़ती जा रही है। चुनाव नजदीक आते ही कांग्रेस और सपा में तालमेल बढ़ने के बजाय खटपट ज्यादा हो रही है। अखिलेश यादव इंडी गठबंधन की बैठक में नहीं आ रहे। सीटों के लिए दबाव दोनों तरफ से बन रहा है। कांग्रेस 150 से ज्यादा सीटें चाहती है। सवाल है कि क्या 250 सीटों पर लड़कर अखिलेश यादव 200 से ज्यादा सीटें जीत सकते हैं? मान लीजिए कि कांग्रेस ज्यादा सीटें लड़कर ज्यादा सीटें जीत गई तो सत्ता मिलने पर अखिलेश की सरकार कांग्रेस पर निर्भर होगी। क्या अखिलेश यादव ऐसा चाहेंगे? इन सारे सवालों का जवाब अखिलेश यादव को चुनाव की अधिसूचना जारी होने से पहले खोजना पड़ेगा और ये आसान नहीं लग रहा है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)












