विधेयक पास होने पर पार्टी को केंद्र की सत्ता में कभी न आ पाने का डर ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
केंद्र सरकार ने कांग्रेस को सांसत में डाल रखा है। मामला है परिसीमन विधेयक का। परिसीमन एक संवैधानिक व्यवस्था है,जो हर 10 साल पर होनी चाहिए लेकिन 1976 में सीटों की संख्या बढ़ाने को 25 साल के लिए फ्रीज कर दिया गया था। इसके बाद 2001 में इसे फिर 2026 तक के लिए फ्रीज कर दिया गया। 2026 में अब फिर वह समय आ गया है कि आबादी के अनुसार परिसीमन हो और लोकसभा व विधानसभा सीटों की संख्या बढ़े। दक्षिण के राज्यों का एतराज है कि हमने सरकार के परिवार नियोजन के कार्यक्रम को बेहतर ढंग से लागू करके अपनी आबादी ज्यादा नहीं बढ़ने दी। उत्तर भारत के राज्यों में आबादी ज्यादा बढ़ी। तो अब उनको इसका लाभ मिलेगा और हमें नुकसान होगा। इस पर सरकार ने कहा कि हर राज्य की 50% सीटें बढ़ा देते हैं ताकि किसी को आबादी बढ़ने का फायदा न मिले और किसी को आबादी घटने का नुकसान न हो। सबके साथ न्याय हो जाए। अब ज्यादातर पार्टियां इससे सहमत हैं। डीएमके जब तक सत्ता में थी तब तक इससे असहमत थी, लेकिन सत्ता से बाहर जाने के बाद उसको भी समझ में आ रहा है कि इससे अनुपात नहीं घटेगा। लेकिन कांग्रेस अब भी इसका सबसे ज्यादा विरोध कर रही है और उसके कई कारण हैं।
दूसरी ओर ज्यादातर क्षेत्रीय दल इसका विरोध नहीं कर रहे हैं क्योंकि उनको लग रहा है कि सीटें बढ़ने से लोकसभा और विधानसभा में उन्हें अपने ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधियों को भेजने का मौका मिलेगा। हम अपने ज्यादा कार्यकर्ताओं को उपकृत कर सकेंगे। लेकिन कांग्रेस पार्टी को लग रहा है कि अगर परिसीमन हो गया और सीटों की संख्या बढ़ गई तो उसके बाद केंद्र की सत्ता में आना उसके लिए बेहद मुश्किल हो जाएगा। कहा जा रहा है कि परिसीमन के बाद लोकसभा सीटों की संख्या लगभग 850 हो जाएगी। कांग्रेस पार्टी राज्यों में लगातार घटती जा रही है तो 426 लोकसभा सदस्य जिताकर लाना उसके लिए सपना हो जाएगा। उसको लग रहा है कि परिसीमन केंद्र की सरकार में उसके आने की संभावना को हमेशा के लिए खत्म करने का कदम है। उसे मालूम है कि परिसीमन से जो पार्टी सत्ता में होती है, उसको ज्यादा फायदा होता है क्योंकि वही भौगोलिक सीमा का निर्धारण करती है। दूसरी बात वह इसे भी प्रभावित कर सकती है कि कौन सी सीट आरक्षित होगी और कौन सी अनारक्षित। परिसीमन में आरक्षित और अनारक्षित सीटों की अदला—बदली होती है। कांग्रेस 2008 में जब केंद्र में सत्ता में थी तो उसने परिसीमन किया था। सीटों की संख्या बढ़ाने पर फ्रीज के कारण उसने लोकसभा सीटों की संख्या तो नहीं बढ़ाई, लेकिन कई निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण कर दिया। उसका नतीजा यह हुआ कि जिस कांग्रेस को 2004 में 147 लोकसभा सीटें मिली थीं परिसीमन के बाद 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में उसकी सीटों की संख्या 206 हो गई यानी 59 सीटें बढ़ गईं। इस बीच में कांग्रेस पार्टी ने ऐसा कुछ नहीं किया था कि उसकी लोकसभा की सीटों की संख्या इतनी बढ़ जाए। परिसीमन में उसने विरोधियों की जो मजबूत और अनारक्षित सीटें थीं, उनको आरक्षित कर दिया। जिनको आरक्षित नहीं कर सकते थे, उनका भौगोलिक क्षेत्र बदल दिया तो उसका चरित्र बदल गया। इस सबका लाभ कांग्रेस पार्टी ने उठाया था। इसलिए कांग्रेस पार्टी को बहुत अच्छी तरह मालूम है कि अगर परिसीमन विधेयक पास हो गया तो उसका नतीजा क्या होगा?
संसद का मानसून सत्र तो खत्म हो चुका है, लेकिन सरकार ने उसका सत्रावसान नहीं किया है। इसका मतलब है कि सरकार 24 घंटे के नोटिस पर कभी भी संसद का सत्र फिर बुला सकती है। विपक्ष विशेषकर कांग्रेस इसी से डरी हुई है। उसको अंदाजा नहीं लग पा रहा है कि सरकार के पास नंबर हो गए हैं या नहीं। इस संविधान संशोधन बिल को पारित कराने के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत है। इस बार सरकार महिला आरक्षण संशोधन विधेयक को इससे जोड़कर नहीं देख रही है। उसने दोनों को अलग कर दिया है। सरकार को पता है कि महिला आरक्षण संशोधन विधेयक का कोई विरोध नहीं कर पाएगा। पिछली बार विरोध इसलिए किया था क्योंकि दोनों बिलों को सरकार ने जोड़ दिया था। यानी सरकार सीधे मुकाबले में आ गई है कि आओ मैदान में निपट लेते हैं। सरकार को यह विश्वास हो गया है कि उसके पास दो तिहाई बहुमत का आंकड़ा है। अब है या नहीं, यह तो मतदान होने पर पता चलेगा, लेकिन एक चीज जो दिखाई दे रही है कि जब पिछली बार विशेष सत्र में सरकार यह विधेयक लाई थी तब विपक्ष के लोकसभा और राज्यसभा सदस्यों की जितनी संख्या थी, उसमें अब बहुत बड़ा अंतर आ चुका है। विपक्ष के सांसदों की संख्या लगातार घट रही है और सत्तारूढ़ गठबंधन के समर्थक सदस्यों की संख्या बढ़ रही है। सत्रावसान न करने से भी पता चलता है कि सरकार कॉन्फिडेंट है। तो सरकार संभावना का वह दरवाजा खुला रखना चाहती है। सरकार के लिए जो संभावना का दरवाजा है वह विपक्ष के लिए आशंका का दरवाजा है। अब आप देखिए कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री को जो चिट्ठी लिखी थी उसका जवाब संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजीजू ने दिया है। खरगे ने मांग की थी कि आप इस मुद्दे पर ऑल पार्टी मीटिंग बुलाइए तो उन्हें बताया गया कि इस पर ऑल पार्टी मीटिंग हो चुकी है। इसके अलावा हम व्यक्तिगत रूप से सभी दलों से संपर्क कर चुके हैं। राहुल गांधी से भी कई बार मिले। कांग्रेस ने एक बार भी औपचारिक बातचीत के लिए समय या तारीख नहीं दी। ऐसे में ऑल पार्टी मीटिंग बुलाने का औचित्य क्या है? अब मलिकार्जुन खरगे कह रहे हैं कि मैंने चिट्ठी प्रधानमंत्री को लिखी और जवाब संसदीय कार्य मंत्री ने दिया। इससे मेरा अपमान हो गया। उन्हें शायद मालूम नहीं है कि हमारे यहां जो कैबिनेट सिस्टम है वह सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत पर काम करता है। यानी कोई भी मंत्री किसी भी मंत्रालय विभाग के बारे में सरकार की ओर से बोल सकता है। वैसे भी उनका अपमान तब नहीं हुआ, जब उनसे कांग्रेस के किसी फैसले के बारे में पूछा जाता है और वह कहते हैं कि राहुल जी से पूछिए। वही सब तय करते हैं। सवाल है कि पार्टी अध्यक्ष आप हैं तो राहुल क्यों तय करते हैं? दरअसल कांग्रेस आशंका और डर में जी रही है। उसे लग रहा है कि सरकार पता नहीं कब परिसीमन विधेयक को लेकर सदन की बैठक बुला ले। उसे यह भी पता नहीं चल रहा है कि उसके गठबंधन में कितने अब भी उसके साथ हैं और कितने सरकार से मिल चुके हैं। उसे अपने ऊपर और अपनी संख्या बल पर भरोसा नहीं है इसीलिए वह सरकार पर आरोप लगा रही है।
सरकार अगर विधेयक लाएगी तो यह कोई गैर संवैधानिक काम तो होगा नहीं। सरकार के पास संख्या होगी तो विधेयक पास होगा वरना नहीं होगा। इसमें इतना डरने की क्या बात है? डरने की बात यह है कि 2047 तक विकसित भारत बने या न बने, लेकिन 2047 तक या उसके बाद भी कांग्रेस के केंद्र की सत्ता में आने की कोई संभावना नहीं दिख रही है। उसे लग रहा है कि यह परिसीमन बिल अगर पास हो गया तो इस पर मुहर लग जाएगी। यह तय हो जाएगा कि कांग्रेस अब कभी केंद्र की सत्ता में नहीं आएगी। तो सरकार तलवार उसकी गर्दन पर लटकाए हुए है, कब गिर जाएगी ये पता नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)