How to live upto 125 years: Mahatma Gandhi

#santoshtiwariडॉ. संतोष कुमार तिवारी।

उन्नीस सौ के दशक में महात्मा गांधी ने प्राकृतिक चिकित्सा अर्थात नेचुरोपैथी या कुदरती इलाज पर दो प्रसिद्ध जर्मन प्राकृतिक चिकित्सकों Louis Kuhne और Adolf Just की अंग्रेजी पुस्तकें पढ़ीं थीं। लुईस कुह्ने की पुस्तक का नाम था New Science of Healing और एडोल्फ जुस्ट की पुस्तक थी Return to Nature। 

महात्मा गांधी ने अपनी आत्मकथा में तथा अपनी पत्रिकाओं यंग इंडियन (अंग्रेजी), नवजीवन (हिन्दी और गुजराती), हरिजन (अंग्रेजी), हरिजन बन्धु (गुजराती) और हरिजन सेवक (हिन्दी) में समय-समय पर प्राकृतिक चिकित्सा या कुदरती इलाज के बारे में लिखा है। उनका कहना था कि रामनाम से सर्वोत्तम कोई अन्य प्राकृतिक इलाज नहीं है।

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हरिजन सेवक (15 जून 1947) के अंक में ‘आम लोगों के लिए इलाज’ शीर्षक से उन्होंने लिखा:

“आपको यह जानकर खुशी होगी कि 40 बरस से भी पहले मैने (दो जर्मन प्राकृतिक चिकित्सकों) कुह्ने (Louis Kuhne) की ‘न्यू साइन्स ऑफ हीलिंग’ (New Science of Healing) और जुस्ट (Adolf Just) की ‘रिटर्न टु नेचर’ (Return to Nature)  नाम की किताबें पढीं, तभी से मैं कुदरती इलाज (प्राकृतिक चिकित्सा) का पक्का हिमायती हो गया था। लेकिन मुझे यह कबूल करना चाहिए कि मैं ‘रिटर्न टु नेचर’ का पूरा-पूरा मतलब नहीं समझ सका हूँ – इसकी वजह मेरी इच्छा की कमी नहीं, बल्कि मेरे ज्ञान की कमी है। अब मैं कुदरती अिलाज का ऐसा तरीका खोजने की कोशिश कर रहा हूँ, जो हिन्दुस्तान के करोड़ों गरीबों को फायदा पहुंचा सके। मैं सिर्फ ऐसे ही इलाज के प्रचार की कोशिश करता हूं, जो मिट्टी, पानी, धूप, हवा और आकाश के इस्तेमाल से किया जा सके। इस इलाज से मनुष्य को कुदरतन् यह बात समझ में आ जाती है कि दिल से भगवान का नाम लेना ही सारी बीमारियों का सबसे बड़ा इलाज है। इस भगवान को हिन्दुस्तान के कुछ करोड़ मनुष्य राम के नाम से जानते हैं और दूसरे कुछ करोड़ अल्लाह के नाम से पहचानते हैं। दिल से भगवान का नाम लेने वाले मनुष्य का यह फर्ज हो जाता है कि वह कुदरत के उन नियमों को समझे और उनका पालन करे जो भगवान ने मनुष्य के लिए बना दिए हैं। यह दलील हमें इस नतीजे पर पहुंचाती है कि बीमारी का इलाज करने से उसे रोकना बेहतर है। इसलिए मैं लाजिमी तौर पर लोगों को सफाई के नियम समझता हूं, यानी उन्हें मन, शरीर और उनके आसपास के वातावरण की सफाई का उपदेश देता हूं।“

गांधीजी में रामनाम का बीजारोपण कैसे हुआ

अपनी आत्मकथा में महात्मा गांधी ने लिखा:

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हमारे कुटुम्ब में एक पुरानी नौकरानी थी (रम्भा)। उसका प्रेम मुझे आज भी याद आता है। मैं पहले कह चुका हूँ कि मैं भूत-प्रेत आदि से डरा करता था। इस रम्भा ने मुझे बताया कि इसकी दवा रामनाम है।… इसलिए बचपन में मैंने भूत-प्रेतादि से बचने के लिए रामनाम का जप किया। यह सिलसिला यूं बहुत दिन तक जारी न रहा, परन्तु जो बीजारोपण बचपन में हुआ, वह व्यर्थ न गया। रामनाम जो आज मेरे लिये एक अमोध शक्ति हो गया है (अर्थात कभी निष्फल न होने वाली शक्ति  हो गई है), उसका कारण उस रम्भाबाई का बोया हुआ बीज ही है।

परन्तु जिस चीज ने मेरे दिल पर गहरा असर डाला, वह तो थी रामायण का पारायण (अर्थात रामायण का नियमित पाठ)। पिताजीकी बीमारी का बहुतेरा समय पोरबन्दर में गया।

वहां वे रामजी के मन्दिर में रोज रात को रामायण सुनते थे। कथा कहने वाले थे रामचन्द्रजी के परम भक्त बिलेश्वर के लाघा महाराज। उनके सम्बन्ध में यह कहानी प्रसिद्ध थी कि उन्हें कोढ़ हो गया था। उन्होंने कुछ दवा न की – सिर्फ बिलेश्वर महादेव पर चढ़े हुए बेल पत्रों को कोढ़ वाले अंगों पर बांधते रहे, और रामनाम का जप करते रहे। अन्त में  उनका कोढ़ समूल नष्ट हो गया। यह बात चाहे सच हो या झूठ, हम सुनने वालों ने तो सच ही मानी। हाँ, यह जरूर सच है कि लाधा महाराज ने जब कथा आरम्भ की थी, तब उनका शरीर बिलकुल नीरोग था। लाघा महाराज का स्वर मधुर था। वे दोहा-चौपाई गाते और अर्थ समझाते थे। खुद उसके रस में लीन हो जाते  और श्रोताओं को भी लीन कर देते थे। मेरी अवस्था उस समय कोई तेरह साल की होगी, पर मुझे याद है कि उनकी कथा में मेरा बहुत मन लगता था। रामायण पर जो मेरा अत्यन्त प्रेम है,  उसका पाया यही रामायण-श्रवण है। आज मैं तुलसीदास की रामायण को भक्ति मार्ग का सर्वोत्तम ग्रन्थ मानता हूँ।

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प्राकृतिक इलाजों में सर्वोत्तम है रामनाम

हरिजन सेवक (7 अप्रैल 1946) के अंक में महात्मा गांधी ने लिखा:

Facsimile version of Mahatma Gandhi's 'Harijan' to be released | India News – India TV

प्राकृतिक उपचार के इलाजों में सबसे समर्थ इलाज रामनाम है। इसमें अचम्भे की कोई बात नहीं। एक मशहूर वैद्य ने अभी उस दिन मुझसे कहा था ‘मैंने अपनी सारी जिन्दगी मेरे पास आने वाले बीमारों को तरह-तरह की दवा की पुड़िया देने में बिताई है। लेकिन जब आपने शरीर के रोगों को मिटाने के लिए  रामनाम की दवा बताई, तब मुझे याद पड़ा कि चरक और वाग्भट जैसे हमारे पुराने धन्वन्तरियों  के वचनों से भी आपकी बात को  पुष्टि मिलती है।’  आध्यात्मिक रोगों को (आधियों को) मिटाने के लिए  रामनाम के जप का इलाज बहुत पुराने जमाने से हमारे यहाँ होता आया है। लेकिन चूँकि बड़ी चीज में छोटी चीज भी समा जाती है,  इसलिए मेरा यह दावा है कि हमारे शरीर की बीमारियों को दूर करने के लिए भी राम-नाम का जप सब इलाजों का इलाज है। प्राकृतिक उपचारक (अर्थात प्राकृतिक चिकित्सक) अपने बीमार से यह नहीं कहेगा कि ‘तुम मुझे बुलाओ तो मैं तुम्हारी सारी बीमारी दूर कर दूँ।’ वह तो बीमार को सिर्फ यह बताएगा कि प्राणी मात्र में रहने वाला और सब बीमारियों को मिटाने वाला तत्व कौन सा है। किस तरह उस तत्व  को जाग्रत किया जा सकता है, और कैसे असको अपने जीवन की प्रेरक शक्ति बना कर उसकी मदद से अपनी बीमारियों को दूर किया जा सकता है। अगर हिन्दुस्तान इस तत्व की ताकत को समझ जाए, तो हम आजाद तो हो ही जाएं, लेकिन उसके अलावा आज हमारा जो देश बीमारियों और कमजोर तबियत वालों का घर बन बैठा है, वह तन्दुरुस्त और ताकतवर शरीर वाले लोगों का देश बन जाए।

रामनाम कोई जादू-टोना नहीं है

रामनाम की शक्ति की अपनी कुछ मर्यादा है और उसके कारगर होने के लिए कुछ शर्तों का पूरा होना जरूरी है। रामनाम कोई जन्तर-मन्तर या जादू-टोना नहीं है। जो लोग खा-खा कर खूब मोटे हो गए हैं, और जो अपने मुटापे की और उसके साथ बढ़ने वाली बादी की आफत से बच जाने के बाद फिर तरह-तरह के पकवानों का मजा चखने के लिए इलाज की तलाश में रहते हैं, उनके लिए रामनाम किसी काम का नहीं। रामनाम का उपयोग तो अच्छे काम के लिए होता है। बुरे काम के लिए हो सकता होता, तो चोर और डाकू  सबसे बड़े भक्त बन जाते। रामनाम उनके लिए है, जो दिल के साफ हैं और जो दिल की सफ़ाई करके हमेशा साफ-पाक रहना चाहते है। भोग-विलास की शक्ति या सुविधा पाने के लिए रामनाम कभी साधन नहीं बन सकता। बादी का इलाज प्रार्थना नहीं, उपवास है। उपवास का काम पूरा होने पर ही प्रार्थना का काम शुरू होता है, गोकि यह सच है कि प्रार्थना से उपवास का काम आसान और हलका बन जाता है । इसी तरह एक तरफ से आप अपने शरीर में दवा की बोतलें उड़ेला करें और दूसरी तरफ मुंह से रामनाम लिया करें, तो वह बेमतलब मजाक ही होगा। जो डॉक्टर बीमार की बुराइयों को बनाए रखने में या उन्हें सहेजने में अपनी होशियारी का उपयोग करता है, वह खुद गिरता है और अपने बीमार को भी नीचे गिराता है। अपने शरीर को अपने सिरजनहार (सृष्टि निर्माता) की पूजा के लिए मिला हुआ एक साधन समझने के बदले उसी की पूजा करने और उसको किसी भी तरह बनाए रखने के लिए पानी की तरह पैसा बहाने से बढ़ कर बुरी गति और क्या हो सकती है? इसके खिलाफ रामनाम रोग को मिटाने के साथ ही साथ आदमी को भी शुद्ध बनाता है और इस तरह उसको ऊंचा उठाता है। यही रामनाम का उपयोग है, और यही उसकी मर्यादा।

आत्मा के इलाज की जरूरत

महात्मा गांधी ने हिन्दी नवजीवन (6 अक्टूबर 1927) के अंक में लिखा:

हिन्दी नवजीवन | Hindi Book | Hindi Navjeevan - ePustakalay

हमें शरीर के बदले आत्मा के चिकित्सकों की जरूरत है। अस्पतालों और डॉक्टरों की वृद्धि कोई सच्ची सभ्यता की निशानी नहीं है। हम अपने शरीर से जितनी ही कम मोहब्बत करें, उतना ही हमारे और सारी दुनिया के लिए अच्छा है।

कम खाएं और जरूरत के मुताबिक खाएं

हरिजन सेवक (19 मई 1946) के अंक में महात्मा गांधी ने लिखा:

Kumar Classic Book Point ~ rare book zone: Harijan (1940s) & Harijan Sevak (1953–54) :: Gandhiji's rare original weekly newspapers

ईश्वर की स्तुति और सदाचार का प्रचार हर तरह की बीमारी को रोकने का अच्छे से अच्छा और सस्ते से सस्ता इलाज है। मुझे इसमें जरा भी शक नहीं। अफसोस इस बात का है कि वैद्य, हकीम और डॉक्टर इस सस्ते इलाज का उपयोग ही नहीं करते। बल्कि हुआ यह है कि उनकी किताबों में इस इलाज की कोई जगह ही नहीं रही, और कहीं है तो उसने जन्तर-मन्तर की शक्ल अख्तियार करके लोगों को वहम के कुएं में ढकेला है।

ईश्वर की स्तुति या रामनाम का वहम से कोई निस्बत (ताल्लुक) नहीं है। यह कुदरत का सुनहरा कानून है। जो इस पर अमल करता है, वह बीमारी से बचा रहता है। जो अमल नहीं करता, वह बीमारियों से घिरा रहता है। तन्दुरुस्त रहने का जो कानून है, वही बीमार होने के बाद बीमारी से छुटकारा पाने का भी कानून है। सवाल यह होता है कि जो रामनाम जपता है और नेकचलनी से रहता है, उसको बीमारी हो ही क्यों? सवाल ठीक ही है।

आदमी स्वभाव से ही अपूर्ण है। समझदार आदमी पूर्ण बनने की कोशिश करता है। लेकिन पूर्ण वह कभी बन नहीं पाता, इसलिए अनजाने गलतियां करता है। सदाचार में ईश्वर के बनाए सभी कानून समा जाते हैं, लेकिन उसके सब कानूनों को जानने-वाला सम्पूर्ण पुरुष हमारे पास नहीं है। मसलन्,  एक कानून यह है कि हद से ज्यादा काम न किया जाए। लेकिन कौन बतावे कि यह हद कहां खत्म होती है? यह चीज तो बीमार पड़ने पर ही मालूम होती है। मिताहार और युक्ताहार यानी कम और जरूरत के मुताबिक खाना कुदरत का दूसरा कानून है। कौन बतावे कि इसकी हद कब लांघी जाती है? मैं कैसे जानूं कि मेरे लिए युक्ताहार क्या है? ऐसी तो कई बातें सोची जा सकती हैं। इस सबका निचोड़ यही है कि हर आदमी को अपना डॉक्टर खुद बनकर अपने ऊपर लागू होने वाले कानून का पता लगा लेना चाहिए। जो इसका पता लगा सकता है और उस पर अमल कर सकता है, वह 125 बरस जिएगा ही।

श्री वल्लभराम वैद्य पूछते हैं कि मामूली मसाले और पाक वगैरा चीजें कुदरती इलाज में  शुमार की जा सकती है या नहीं? यह एक बड़े काम का सवाल है। डॉक्टर दोस्तों का यह दावा है कि वे पूरी तरह कुदरती इलाज करनेवाले हैं। क्योंकि दवाएं जितनी भी हैं, सब कुदरत ने ही बनाईं हैं। डॉक्टर तो उनकी नई मिलावटें भर करते हैं। इसमें बुरा क्या है?

इस तरह हर चीज पेश की जा सकती है (अर्थात इस तरह का तर्क किया जा सकता है)। मैं तो यही कहूंगा कि राम-नाम के सिवा जो कुछ भी किया जाता है, वह कुदरती इलाज के खिलाफ है। इस मध्य बिन्दु से हम जितने दूर हटते हैं,  उतने ही असल चीज से दूर जा पड़ते हैं। इस तरह सोचते हुए मैं यह कहूंगा कि पांच महाभूतों का असल उपयोग कुदरती इलाज की हद है। इससे आगे बढ़ने  वाला वैद्य अपने इर्द-गिर्द जो दवाएं (जड़ी-बूटी) उगती हों या उगाई जा सकें, उनका इस्तेमाल सिर्फ लोगों के भले के लिए करे, पैसे कमाने के लिए नहीं, तो वह भी कुदरती इलाज करने वाला कहला सकता है।  ऐसे वैद्य आज कहाँ हैं? आज तो वे पैसा कमाने की होड़ा-होड़ी में पड़ें हैं। छानबीन और खोज-ईजाद (अर्थात रिसर्च) कोई करता नहीं। उनके आलस और लोभ की वजह से आयुर्वेद आज कंगाल बन गया है।

(लेखक सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं।)