#pradepsinghप्रदीप सिंह।
कभी-कभी जरूरत से ज्यादा चालाकी उल्टी पड़ जाती है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ यही हुआ है।
अखिलेश यादव हाल ही में अयोध्या गए थे। अब उनको राम मंदिर तो जाना नहीं था। उनको लगा कि इस बारे में उनसे सवाल जरूर पूछा जाएगा तो उन्होंने इस मुद्दे से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए एक दूसरा मुद्दा उछाल दिया। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चुनौती दे दी कि वे अयोध्या से चुनाव लड़ें। उनको लगा कि मुख्यमंत्री अपना चुनाव क्षेत्र क्यों छोड़ेंगे? मैं नहीं छोड़ता हूं। कोई नेता नहीं छोड़ना चाहता है। उनको लगा कि इस बात को इस रूप में पेश किया जाएगा कि मैंने चुनौती दी और उस चुनौती से मुख्यमंत्री भाग गए। लेकिन अखिलेश की राजनीतिक समझ पर तरस आता है। अखिलेश की चुनौती के अगले ही दिन योगी आदित्यनाथ ने हामी भर दी कि मैं अयोध्या से लड़ने के लिए तैयार हूं। अखिलेश जी आएं और हम दोनों अयोध्या से चुनाव लड़ें। अब अखिलेश यादव को समझ में आया कि ये तो फंस गए। कहां तो अखिलेश यादव को लगा कि यह मुद्दा उनके लिए राजनीतिक रूप से बहुत फायदेमंद होगा। मैं पूरे चुनाव तक घूम—घूम कर कहूंगा कि मैंने मुख्यमंत्री को चुनौती दी और उन्होंने स्वीकार नहीं किया क्योंकि बीजेपी डरी हुई है और मेरी सरकार बनने वाली है। लेकिन उन्होंने जो रेत का महल खड़ा किया था, वह सिर्फ योगी आदित्यनाथ के एक बयान से धराशाई हो गया। अब अखिलेश यादव को जवाब देना है कि क्या वह अयोध्या से चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं? मैं डंके की चोट पर कह रहा हूं कि अखिलेश यादव कभी इसके लिए तैयार नहीं होंगे। उनको मालूम है कि अयोध्या से अगर वह योगी जी के खिलाफ चुनाव लड़ गए तो उनकी शायद जमानत भी न बचे, जीतना तो दूर की बात है। अखिलेश वहीं से चुनाव लड़ेंगे,जो सीट उनके लिए सबसे सुरक्षित होगी और अभी तो यह भी स्पष्ट नहीं है कि वह विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे या नहीं। अखिलेश लोकसभा के सदस्य हैं और उनके सामने विकल्प है कि अगर उनकी सरकार बनने की नौबत आती है तो विधान परिषद के जरिए सदन में जा सकते हैं। हालांकि उसका यह संदेश चला जाता है कि आप चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाए।
एक समय था कि कोई भी नेता अगर मुख्यमंत्री बना है और वह विधानसभा का सदस्य नहीं है तो वह विधान परिषद का रूट नहीं अपनाता था। अपने किसी सहयोगी या पार्टी के सदस्य से विधानसभा की सीट खाली करवाई जाती थी। उससे वह चुनाव लड़ता था। टीएन सिंह जब सम्मित सरकार के मुख्यमंत्री बने तो किसी सदन के सदस्य नहीं थे। उनके लिए महंत अवेद्यनाथ ने सीट खाली की। यह अलग बात है कि उस सीट से टीएन सिंह चुनाव हार गए और उनको मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। वह पहला चुनाव था जब देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किसी विधानसभा उपचुनाव के लिए प्रचार किया था। उसके बाद 1980 में विश्वनाथ प्रताप सिंह मुख्यमंत्री तो वह भी लोकसभा के सदस्य थे। उन्होंने भी विधान परिषद का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने तिंदवारी सीट से उपचुनाव लड़ा और सदन में पहुंचे। अखिलेश यादव क्या करेंगे, यह पता नहीं। मेरा आकलन है कि ऐसी नौबत ही नहीं आएगी क्योंकि उनकी सरकार बनने वाली नहीं है। सरकार बनना तो दूर मुझे लगता है कि उनकी पार्टी का प्रदर्शन 2022 वाला भी नहीं रहेगा। जब से समाजवादी पार्टी बनी है तब से वह सिर्फ एक बार 2012 में बहुमत पा सकी है। वह भी इसलिए क्योंकि उस समय भारतीय जनता पार्टी बहुत कमजोर थी। 2012 की भाजपा और 2027 में जब चुनाव होंगे तब की भाजपा में जमीन आसमान का अंतर है और समाजवादी पार्टी 2012 की तुलना में घटी ही है।
अखिलेश यादव ने योगी को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती यह आकलन किए बिना दे दी कि अगर योगी ने इस चुनौती को स्वीकार कर लिया तो फिर मैं क्या करूंगा? आप उनके प्रवक्ताओं को सुन लीजिए तो आपको समझ में आ जाएगा कि अखिलेश कैसे भागने का रास्ता खोज रहे हैं? तो अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने से पहले ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली है। उन्होंने चुनौती देते समय कुछ सोच विचार नहीं किया था। उनको तात्कालिक फायदा चाहिए था कि मैं राम मंदिर नहीं जा रहा हूं,उसकी चर्चा दब जाए। आप एक मुद्दे को दबाने की कोशिश करते हैं तो 100 मुद्दे उभर कर आते हैं और यहां तो महा मुद्दा आ गया है क्योंकि मुख्यमंत्री हैं योगी जी और अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं। पर्सनालिटी के दृष्टि से देखें तो दो लोगों के बीच में लड़ाई है, दो पार्टियों के बीच में लड़ाई है, दो विचारधाराओं के बीच में लड़ाई है। लेकिन अखिलेश ने विचारधारा की लड़ाई को व्यक्तिगत लड़ाई का मुद्दा बनाना स्वीकार किया और योगी ने चुनौती स्वीकार ली तो अब भागते फिर रहे हैं। अखिलेश इससे पहले भी बिना सोचे—विचारे बयान देते रहे हैं। राज्यसभा के चुनाव में उन्होंने तीसरा उम्मीदवार खड़ा करने की बात कही थी,लेकिन उनकी हिम्मत नहीं हुई। नॉमिनेशन के आखिरी दिन बोले कि तीन नहीं, 403 की बात कही थी। अरे भाई, आपको 100 सीटों के लाले हैं और आप 403 की बात कर रहे हैं। बीते पांच सालों में समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव ने जो किया है, उसके कारण उनकी 2022 की परफॉर्मेंस भी रिपीट नहीं होने वाली है। 2024 को तो भूल ही जाइए। वह 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे के आधार पर सपने देख रहे हैं। उनको लग रहा है कि 2024 में जिन वर्गों का उनको वोट मिला था, उससे ज्यादा 2027 में मिलेगा। सवाल यह है कि 2024 के बाद से आपने अपना सामाजिक जनाधार बढ़ाने के लिए किया क्या है? राज्यसभा चुनाव के समय उनके पास एक मौका यह दिखाने का था कि 2024 में जो वर्ग उनके साथ आया था, उसकी उन्हें चिंता है। कम से कम एक सीट ही दलित समाज के किसी व्यक्ति को दे दी होती। राजनीति में संकेतों का बहुत महत्व होता है। उसका फायदा—नुकसान चुनाव के बाद पता चलता है। याद कीजिए 1995 में भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार किसी दलित मायावती को मुख्यमंत्री बनाया था। तब भाजपा की बड़ी आलोचना हुई, लेकिन लॉन्ग टर्म में फायदा हुआ। 1995 में बीजेपी ने दलितों के लिए जो किया था, उसका फायदा उसे 2014, 2017 और 2019 में हुआ। 2024 में भी उतना नुकसान नहीं हुआ, जितना बताया जाता है। बीजेपी के वोट नहीं घटे। सीटें जरूर घट गई थीं। अखिलेश जो यह मानकर चल रहे हैं कि 2024 में पार्टी की जो स्थिति बनी उससे 2027 में बेहतर होगी,आप देखिएगा कि उनको इतना बड़ा झटका लगने वाला है कि 2027 के बाद उनके लिए उठ खड़े हो पाना मुश्किल हो जाएगा। उनकी पार्टी के अस्तित्व पर संकट आ जाएगा। इस खतरे को अखिलेश यादव समझने को तैयार ही नहीं हैं। उनके सामने सरकार बनाने की चुनौती नहीं है। उनके सामने अपनी पार्टी को बनाए और बचाए रखने की चुनौती है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)